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घर बनवाने से पहले जान लें कोने-कोने में छुपे इन पंचतत्वों का क्या राज…

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आपका घर लाखों-करोड़ों का हो सकता है, लेकिन क्या उसमें सुकून है? वास्तु शास्त्र कहता है कि हर घर 5 चीजों से चलता है – मिट्टी, पानी, आग, हवा और आकाश। इन्हें ही पंचतत्व कहते हैं। हमारा शरीर भी इन्हीं से बना है। जब घर में ये पांचों तत्व अपनी सही दिशा में संतुलित रहते हैं, तो परिवार में शांति, पैसा और सेहत अपने आप आती है। लेकिन अगर पानी की जगह पर आग रख दी, या हवा को रोक दिया, तो जीवन में बिना वजह की परेशानी शुरू हो जाती है। आइए समझते हैं कि आपके घर के कोने-कोने में छुपे इन पंचतत्वों का क्या राज है।

1. पृथ्वी तत्व 

स्थिरता और आधार का प्रतीक। पृथ्वी तत्व स्थिरता, धैर्य और सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है। भवन का दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) क्षेत्र पृथ्वी तत्व से संबंधित माना जाता है। पृथ्वी तत्व के संतुलन से परिवार में स्थिरता आती है।निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

असंतुलन के प्रभाव

यदि नैऋत्य दिशा में कटाव हो, गड्ढा हो या यह भाग हल्का हो, तो व्यक्ति जीवन में अस्थिरता अनुभव कर सकता है। बार-बार नौकरी बदलना, आर्थिक उतार-चढ़ाव और मानसिक असुरक्षा जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। पृथ्वी तत्व को मजबूत करने के उपाय के तहत दक्षिण-पश्चिम भाग को भारी रखें। इस दिशा में मास्टर बेडरूम बनाना शुभ माना जाता है।मिट्टी के बर्तन या प्राकृतिक पत्थरों का प्रयोग करें।इस क्षेत्र को हमेशा साफ और व्यवस्थित रखें।

2. जल तत्व का महत्त्व

जल जीवन का आधार है। यह भावनाओं, धन, अवसरों और मानसिक शांति का प्रतीक माना जाता है। वास्तु में उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) जल तत्व का क्षेत्र माना गया है। अप्स्व९न्तरमृतमप्सुभेषजमपामुतप्रशस्तये । देवाभवतवाजिनः ॥ जल में अमृत है, जल में औषधि है । हे ऋत्विज्जनो, ऐसे श्रेष्ठ जल की प्रशंसा अर्थात् स्तुति करने में शीघ्रता बरतें। जल तत्व के संतुलन से मानसिक शांति प्राप्त होती है।आध्यात्मिक विकास होता है। धन और अवसरों में वृद्धि होती है। परिवार में सौहार्द बना रहता है।

असंतुलन के प्रभाव

यदि ईशान कोण में भारी निर्माण, शौचालय या कूड़ा-कचरा हो, तो मानसिक तनाव, आर्थिक बाधाएँ और निर्णय लेने में भ्रम जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। जल तत्व को संतुलित करने के लिए उत्तर-पूर्व को हल्का और खुला रखें। जल स्रोत, फव्वारा या जल पात्र इस दिशा में रखें। पूजा स्थल का निर्माण भी इस दिशा में शुभ माना जाता है। इस क्षेत्र में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें।

3. अग्नि तत्व

अग्नि तत्व ऊर्जा, उत्साह, स्वास्थ्य और परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है। वास्तु में दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) अग्नि तत्व का क्षेत्र माना गया है। इसका स्वामित्व शुक्र ग्रह को प्राप्त है। ॐ अग्निना रयिमश्नवत् पोषमेव दिवेदिवे। यशसं वीरवत्तमम्॥मनुष्य अग्निदेव की कृपा से प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होने वाला धन, यश और वीर पुत्र-पौत्रादि (पराक्रमी संतति) प्राप्त करते हैं। ॐ स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव। सचस्वा नः स्वस्तये॥ हे अग्निदेव! जैसे पिता अपने पुत्र के लिए सुलभ होता है, वैसे ही आप हमारे लिए सुखदायक और सुगम हो जाइए तथा हमारे कल्याण (स्वस्ति) के लिए हमारे साथ रहिए। अग्नि तत्व के संतुलन से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता बढ़ती है। कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

यदि अग्नि तत्व गलत दिशा में हो या आग्नेय कोण में जल तत्व का प्रभाव अधिक हो, तो विवाद, स्वास्थ्य समस्याएँ और आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। अग्नि तत्व को संतुलित करने के लिए रसोईघर दक्षिण-पूर्व में बनाएं। गैस चूल्हे की दिशा वास्तु अनुसार रखें। लाल, नारंगी और गुलाबी रंगों का सीमित उपयोग करें। विद्युत उपकरणों को आग्नेय क्षेत्र में रखना लाभकारी माना जाता है।

4. वायु तत्व

वायु तत्व जीवन शक्ति, संचार और गतिशीलता का प्रतीक है। वास्तु में उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) वायु तत्व से संबंधित माना जाता है। इसका स्वामित्व चंद्रमा को प्राप्त है। वायु तत्व के संतुलन से सामाजिक संबंध बेहतर होते हैं। नए अवसर प्राप्त होते हैं। जीवन में गतिशीलता बनी रहती है। मानसिक ताजगी का अनुभव होता है। वहीं, वायु तत्व के असंतुलित होने पर व्यक्ति बेचैनी, अनिश्चितता और तनाव महसूस कर सकता है। परिवार में मतभेद और अस्थिरता भी बढ़ सकती है। वायु तत्व को संतुलित करने के लिए पर्याप्त खिड़कियाँ और वेंटिलेशन रखें। उत्तर-पश्चिम दिशा को खुला रखें।ताजी हवा के आवागमन का ध्यान रखें। सुगंधित पौधों का उपयोग करें।

5. आकाश तत्व

आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म और शक्तिशाली तत्व माना जाता है। यह चेतना, ज्ञान, आध्यात्मिकता और अनंत संभावनाओं का प्रतीक है। आकाश तत्व के संतुलन से मानसिक स्पष्टता बढ़ती है। आध्यात्मिक विकास होता है। रचनात्मकता में वृद्धि होती है। सकारात्मक विचारों का प्रवाह बना रहता है। वहीं, यदि भवन का मध्य भाग अत्यधिक भरा हुआ हो, तो ऊर्जा का प्रवाह बाधित हो सकता है। इससे मानसिक तनाव, भ्रम और निर्णय क्षमता में कमी आ सकती है। आजकल भवन निर्माण में इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता कि सूर्य की किरणें आँगन में आनी चाहिए। आकाश तत्व को संतुलित करने के लिए भवन के केंद्र (ब्रह्मस्थान) को यथासंभव खुला रखें। अनावश्यक सामान न रखें। पर्याप्त प्राकृतिक प्रकाश आने दें। सकारात्मक और स्वच्छ वातावरण बनाए रखें।

क्या हर पंचतत्व दोष के लिए
तोड़फोड़ आवश्यक है?

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि हर वास्तु दोष को दूर करने के लिए निर्माण में बदलाव करना ही पड़ेगा। कई दोष व्यवहारिक परिवर्तनों से संतुलित किए जा सकते हैं। कुछ मामलों में वस्तुओं के पुनर्स्थापन से सुधार संभव होता है।रंग, प्रकाश, धातु, पौधे और आध्यात्मिक उपाय भी सहायक हो सकते हैं। वास्तुशास्त्र का वास्तविक उद्देश्य केवल भवन को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि उसे प्रकृति की शक्तियों के साथ सामंजस्यपूर्ण बनाना है। पंचतत्वों का संतुलन किसी भी घर, कार्यालय या व्यापारिक प्रतिष्ठान की ऊर्जा का आधार है।

पृथ्वी घर को मजबूती देती है, जल पैसा और शांति लाता है, अग्नि हिम्मत देती है, हवा काम में रफ्तार भरती है और आकाश सोच को बड़ा करता है। जब ये पांचों सही जगह हों, तभी जिंदगी पटरी पर आती है। अगर चाहते हो कि घर में बरकत हो, ऑफिस में तरक्की मिले, तो पहले ये देखो कि कहीं तुमने पानी की दिशा में आग तो नहीं रख दी? वास्तु का असली फंडा ईंट-सीमेंट में नहीं है, वो तो प्रकृति के इन 5 तत्वों की सेटिंग में छुपा है। इसलिए कुछ भी तोड़ने-फोड़ने से पहले किसी समझदार वास्तुविद से पूछ लो, वरना फायदे की जगह नुकसान हो जाएगा। लेखक – सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431

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