







अजमल घर अवतार बाबा श्री रामदेव जी राजस्थान के प्रमुख लोक देवताओं में से एक हैं। राजस्थान के साथ-साथ गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और देश के अन्य हिस्सों में भी उनके प्रति गहरी आस्था है। उनके भक्त उन्हें प्रेम और श्रद्धा से रामसा पीर, बाबा रामदेव पीर और रूणीचा धणी के नाम से भी पुकारते हैं। बाबा रामदेवजी का मेला उनके जन्म तिथि भाद्र पद शुक्ल द्वितिया से शुरू होकर भाद्रपद शुक्ल की दसवी तिथि तक रहता है व इस मेले का समापन अगले दिन यानी ग्यारस तिथि को होता है।
लोक-परंपराओं के अनुसार] बाबा रामदेव जी का जन्म चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के आसपास राजस्थान के पोकरण क्षेत्र के रूणिचा (वर्तमान रामदेवरा) में हुआ था। उनके पिता का नाम अजमाल जी तंवर और माता का नाम मैणादेवी है। बाबा रामदेव जी के दो सगी बहिने थी। एक का नाम सुगना बाई व दूसरी का नाम लाक्षा बाई तथा डाली बाई उनकी धर्म की बहिन थी। उनके बड़े भाई को बलराम का अवतार माना जाता है। रामदेव जी का विवाह अमरकोट के सोढा राजपूत दल्ले सिंह की पुत्री नेतलदे के साथ हुआ था। रामदेव जी प्रमुख भक्तो मे रत्ना राइका, लकी बंजारा व हरजी भाटी थे। बाबा रामदेव जी ने अपना पूरा जीवन समाज के कमजोर, वंचित और जरूरतमंद लोगों की सेवा तथा सामाजिक समरसता के संदेश को समर्पित कियाा
बाबा रामदेव जी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में जाति-पाति और ऊंच-नीच के भेदभाव का विरोध तथा समानता का संदेश प्रमुख माना जाता है। उनकी लोकगाथाओं और भजनों में यह भावना दिखाई देती है कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं न कोई ऊंचा है न कोई नीचा है। इसी कारण अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोग उन्हें अपना आराध्य मानते हैं। उनकी शिक्षाओं से जुड़ी लोकपरंपरा में मानव सेवा, भाईचारा, सत्य, सदाचार और परोपकार को विशेष महत्व दिया जाता है। बाबा रामदेव जी को हिंदू भक्त बाबा रामदेव या रामदेव जी महाराज के रूप में पूजते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय के अनेक श्रद्धालु उन्हें रामसा पीर के नाम से सम्मान देते हैं। यह उनकी लोक-आस्था की उस व्यापक परंपरा को दर्शाता है जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग एक ही संत-लोकदेवता के प्रति श्रद्धा रखते हैं।
बाबा रामदेव जी से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथाओं में पाँच पीरों का उल्लेख मिलता है। लोकविश्वास के अनुसार दूर-दूर से पाँच पीर बाबा रामदेव जी की आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा लेने आए थे। बाबा रामदेव जी ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उनकी इच्छा पूरी की। इस घटना के बाद पाँचों पीरों ने उनकी महानता स्वीकार की। यह कथा मुख्यतः लोकविश्वास और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है; इसके विवरण अलग-अलग लोकगाथाओं में अलग रूप में मिलते हैं। बाबा रामदेव जी की मुख्य समाधि रामदेवरा, जैसलमेर जिले में स्थित है। इसे श्रद्धालु अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल मानते हैं।
हर वर्ष भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की 10 वी तिथि को यहां विशाल रामदेवरा मेला आयोजित होता है। देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु पैदल यात्राएं करते हुए रामदेवरा पहुंचते हैं। श्रद्धालु बाबा की समाधि पर धोक लगाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और लोकभजन तथा जम्मा गाते हैं। पहले जब संसाधनों की कमी थी तो भक्तगण पैदल व अपने अपने साधनों से रामदेवरा जाते थे उस समय कोई खाने पीने के सेवार्थ कैम्प नहीं लगते थे ।लेकिन अब पूरे रास्ते मे जगह जगह सुविधाजनक कैम्प लगते है । उस समय पैदल जाने वाले भक्तगण अपने अपने हिसाब से खाने पीने का सामान साथ रखते थे वे पानी के लिए ऊंटों पर पखाल या लोहे की टंकी बांधकर ले जाते थे।रात्रि में जहां भी पड़ाव रखते तो अपने साथ वालों की रातभर जागकर रखवाली करते थे। ताकि संघ को कोई नुकसान न पहुंचाए। लेकिन अब तो पूरे रास्ते किसी का भी डर भय नही है जिसके मन मे आया अकेला ही चल पड़ते है। न खाने पीने के समान की चिंता व न ही सोने की चिंता।
राजस्थान की लोक संस्कृति में बाबा रामदेव जी के भजनों का विशेष स्थान है। गांवों में रात्रि जागरण, भजन-संध्या और धार्मिक आयोजनों में उनके गीत गाए जाते हैं। उनकी भक्ति में केवल पूजा-पाठ ही नहीं, बल्कि सेवा, सद्भाव और मानवता को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। बाबा रामदेव जी की भक्ति से जुड़ी राजस्थान की प्रसिद्ध लोकपरंपराओं में तेरहताली नृत्य का विशेष महत्व है। कामड़ समुदाय के कलाकार इस परंपरा को प्रस्तुत करते हैं। कलाकार शरीर पर मंजीरे बांधकर ताल के साथ भक्ति-गीत प्रस्तुत करते हैं। यह परंपरा राजस्थान की लोककला और बाबा रामदेव जी की भक्ति- दोनों की महत्वपूर्ण पहचान बन चुकी है।
लोकपरंपरा में बाबा रामदेव जी को नीले घोड़े से भी जोड़ा जाता है। कई धार्मिक चित्रों और लोककलाओं में उन्हें घोड़े पर सवार दिखाया गया है। उनके भक्तों के लिए यह उनकी लोकछवि का महत्वपूर्ण प्रतीक है। लोकमान्यता के अनुसार, बाबा रामदेव जी ने रामदेवरा में जीवित समाधि ली थी। उनके समाधि स्थल पर आज प्रमुख मंदिर स्थित है और देशभर से लाखों श्रद्धालु पूरे भाव से दर्शन के लिए यहां आते है। रामदेवरा का मेला राजस्थान के प्रमुख धार्मिक मेलों में गिना जाता है। यह सामान्यतः भाद्रपद माह शुक्ल पक्ष की 10वीं तिथि को आयोजित किया जाता है। इस दौरान रामदेवरा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मेले में धार्मिक आयोजन, भजन, लोकगीत, लोकनृत्य और विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं की भागीदारी देखने को मिलती है। राजस्थान की लोक संस्कृति में इसका विशेष महत्व है।
बाबा रामदेव जी की लोकपरंपरा से मुख्य रूप से ये संदेश जुड़े हुए हैं-
मानव मात्र में समानता
जातिगत भेदभाव से ऊपर उठना
गरीब और जरूरतमंद की सेवा
सत्य और सदाचार का पालन
भाईचारे और सामाजिक एकता को बढ़ावा देना
ईश्वर के प्रति श्रद्धा और मानवता के प्रति सम्मान
अहंकार और भेदभाव का त्याग
राजस्थान के लिए महत्व
बाबा रामदेव जी केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे राजस्थान की लोक संस्कृति, लोक साहित्य, लोक संगीत और सामाजिक समरसता के भी महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। उनकी गाथाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोकगायकों और भक्तों द्वारा सुनाई और गाई जाती रही हैं। संक्षेप में, बाबा रामदेव जी की लोकदेवता के रूप में लोकप्रियता का आधार उनकी लोकपरंपरा में निहित मानव सेवा, समानता, भाईचारे और सामाजिक समरसता के संदेश में देखा जाता है। रामदेवरा स्थित उनकी समाधि आज भी राजस्थान और देश के अनेक हिस्सों के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र है। बाबा रामदेव जी को कोटि कोटि हार्दिक नमन व धोक।
रूणिचा रा धणीयां अजमाल जी रा कुँवरा
म्हारो हेल्लो सुणो जी रामा पीर।
बाबा रामदेव जी की जय हो। घणी घणी खम्मा।

-चौरू लाल सुथार, सामाजिक कार्यकर्ता, सोनगिरि वेल, नया शहर, बीकानेर मो. 9414080753







