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बीकानेर की सड़कों और सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण का बोलबाला, सख्ती की दरकार, आमजन परेशान

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बीकानेर Abhayindia.com रेतीले धोरों की नगरी बीकानेर अपनी ऐतिहासिक विरासत और साफ-सुथरे शहर के लिए जानी जाती है। लेकिन, पिछले कुछ सालों में शहर की पहचान पर अतिक्रमण का ग्रहण लगता जा रहा है। शहर के मुख्य बाजारों से लेकर कॉलोनियों, सरकारी जमीनों और सार्वजनिक स्थानों तक अतिक्रमण का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। नतीजा ये है कि सड़कें संकरी हो गई हैं, यातायात जाम आम बात हो गई है और पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ नाम की कोई चीज बची ही नहीं।

शहर के कोटगेट, जूनागढ़, घंटाघर, स्टेशन रोड, पब्लिक पार्क, रानी बाजार और जस्सूसर गेट जैसे व्यस्त इलाकों में दुकानदारों ने अपनी दुकानों के आगे 5 से 10 फीट तक सामान फैला रखा है। कई जगह स्थाई छज्जे, सीढ़ियां और टीन शेड बना दिए गए हैं। सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे करके मकान और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स तक खड़े कर दिए गए हैं। नई कॉलोनियों में पार्क की जमीन पर कब्जे, नालों के ऊपर निर्माण और सड़क किनारे ठेलों की भरमार से आमजन को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। स्कूलों और अस्पतालों के सामने लगे ठेले और गाड़ियों के कारण एंबुलेंस और बच्चों को निकलने में दिक्कत आती है।

अतिक्रमण की वजह से बीकानेर की सड़कें पहले से ही तंग हैं। ऊपर से मानसून में गड्ढे और जलभराव की समस्या अलग। संकरी सड़कों पर दो गाड़ियां आमने-सामने से नहीं निकल पातीं। घंटों जाम लगता है। आपातकाल में फायर ब्रिगेड और एंबुलेंस को भी रास्ता नहीं मिल पाता। व्यापारियों का एक वर्ग कहता है कि जगह कम है इसलिए मजबूरी में सामान बाहर रखना पड़ता है। लेकिन आम नागरिक का कहना है कि कुछ लोगों की लापरवाही की सजा पूरे शहर को भुगतनी पड़ रही है। बुजुर्ग और महिलाएं सड़क पर चलने को मजबूर हैं क्योंकि फुटपाथ पर दुकानों का कब्जा है।

अतिक्रमण को लेकर जिला प्रशासन और नगर निगम समय-समय पर अभियान चलाता रहा है। एसपी और कलेक्टर के निर्देश पर पुलिस, निगम और राजस्व विभाग की संयुक्त टीमों ने कई बार जेसीबी चलाकर अवैध निर्माण तोड़े हैं। लाखों रुपये का सामान भी जब्त किया गया है। लेकिन, आरोप ये भी लगते हैं कि कार्रवाई सिर्फ खानापूर्ति होती है। कुछ दिन बाद फिर से वही स्थिति हो जाती है। राजनीतिक दबाव, कोर्ट स्टे और स्थानीय विरोध के कारण कई जगह कार्रवाई अधूरी रह जाती है। निगम अधिकारियों का कहना है कि स्टाफ और संसाधनों की कमी के कारण पूरे शहर में एक साथ अभियान चलाना मुश्किल है।

समाधान क्या है?

विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ तोड़फोड़ से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए तीन स्तर पर काम जरूरी है:

1. कठोर और नियमित कार्रवाई : बिना भेदभाव के हर महीने अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाया जाए और दोबारा कब्जा करने पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
2. वैकल्पिक व्यवस्था : ठेले-खोमचे वालों के लिए वेंडिंग जोन बनाए जाएं। बाजारों में पार्किंग की समुचित व्यवस्था हो।
3. जनजागरूकता : स्कूल, कॉलेज और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर लोगों को ये समझाया जाए कि सार्वजनिक जगह सबकी है। एक व्यक्ति का कब्जा सैकड़ों लोगों की परेशानी बनता है।

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