हमारा घर सिर्फ ईंट, सीमेंट और रंग का ढेर नहीं है। ये वो जगह है जहाँ हमारी पहली साँस चलती है, आखिरी थकान उतरती है, और हर खुशी-गम की गवाह बनती है। फिर भी आज हमने घर को “प्रॉपर्टी” बना दिया और वास्तु को “अंधविश्वास”। सच ये है कि वास्तु शास्त्र कोई 20 साल पुराना टीवी शो नहीं है। ये उतना ही पुराना है जितनी हमारी संस्कृति। आयुर्वेद हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है। योग हमारे मन को शांति देता है। वास्तु उस जगह को स्वस्थ बनाता है जहाँ हमारा शरीर, मन और समय… तीनों एक साथ रहते हैं।”वास्तु” शब्द खुद में पूरी कहानी कहता है। ये बना है संस्कृत की “वस्” धातु से, जिसका अर्थ है – बसना। जहाँ मनुष्य बसे, देवता बसे, पशु-पक्षी बसे… वही वास्तु है। हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले समझ लिया था कि इंसान प्रकृति से कटकर नहीं जी सकता। सूरज की दिशा, हवा का रुख, पानी का बहाव, धरती का गुरुत्व… इन सबका असर सीधे हमारे भाग्य और स्वास्थ्य पर पड़ता है। दुनिया की सबसे पुरानी किताब ऋग्वेद में “घर” के लिए अलग से देवता की प्रार्थना है – “वास्तोष्पति”। ऋषि कहते हैं: _”हे घर के स्वामी, हमारे दो पैर वाले और चार पैर वाले सबको सुख दो। हमें रोग से बचाओ। हमारे घर को अन्न से भर दो।” उल्लेखनीय है कि तीन हजार साल पहले भी हमारे पूर्वज घर को जीवित मानते थे। उसके लिए प्रार्थना करते थे।
आज क्या हुआ? हमने वास्तु को तीन चीजों तक सीमित कर दिया उत्तर में पानी, दक्षिण में भारी सामान, और दरवाजे पर लटका हुआ घोड़ा। जबकि असली वास्तु कहता है – घर में उजाला हो, हवा आए, जगह साफ हो, और पंचमहाभूतों का संतुलन बना रहे। वास्तु शास्त्र सामंजस्य का विज्ञान है। प्रकृति, विज्ञान और अध्यात्म को एक साथ जोड़ने की कला है। आइए, आज इसी प्राचीन धरोहर को समझते हैं। जानते हैं कि हमारे वेद और पुराण वास्तु के बारे में क्या कहते हैं… और क्यों आज भी एक संतुलित घर ही सुखी जीवन की पहली सीढ़ी है।
वेदों में वास्तुशास्त्र – संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में गृह को वेश्म कहा गया है। गृह की प्राप्ति पुण्यों के फलस्वरूप होती है यह बात भी कही गयी है। इसी प्रकार वास्तोष्पति का भी उल्लेख किया गया है – ‘भोजस्येदं पुष्करिणीव वेश्म परिष्कृतं देवमानेव चित्रम् ॥’ – ऋग्वेद १०।१०७।१०
इसी प्रकार वास्तोष्पति से स्वास्थ्यप्रद गृह तथा उन्नतिशील गृहहेतु प्रार्थना की गयी है- ‘वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवे भवा नः। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ वास्तोष्पते प्रतरणो न एधि गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो। अजरासस्ते सख्ये स्याम पितेव पुत्रान् प्रति नो जुषस्व ॥ वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या। पाहि क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥’ ‘अमीवहा वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन् । – ऋग्वेद ७।५४।१-३
सखा सुशेव एधि नः ॥’ (ऋ०७।५५।१)
ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल में ‘क्षेत्रपति’ नामक देवता से प्रार्थना करते हुए गृह को अन्न भण्डार से युक्त बनाने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है- क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि। गामश्चं पोषयित्वा नो स मृळातीदृशे ॥ क्षेत्रस्य पते मधुमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व । मधुश्चतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥ मधुमतीरोषधीर्धाव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम् । क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान् नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम ॥ – ऋग्वेद ४।५७।१-३
पुराणों में वास्तुशास्त्र – अग्निपुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण आदि में भवन- निर्माण की विद्या बड़ी सूक्ष्मता तथा स्पष्टता के साथ वर्णित है।इनको पढ़कर वास्तु के बारें में आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं। प्रासाद- निर्माण के विषय में बताते हुए कहा गया है कि सर्वप्रथम प्रसाद-निर्माण के लिये पृथ्वी की परीक्षा करनी चाहिये। जहाँ की मिट्टी का रंग श्वेत हो और घी की सुगन्ध आती हो, वह भूमि ब्राह्मण के लिये उत्तम होती है। इसी प्रकार क्रमशः क्षत्रिय के लिये लाल तथा रक्त जैसी गन्धवाली मिट्टी, वैश्य के लिये नीली और सुगन्धयुक्त मिट्टीवाली तथा शूद्र के लिये काली एवं मदिरा-जैसी गन्धवाली मिट्टी से युक्त भूमि उत्तम कही गयी है। पूर्व, ईशान, उत्तर अथवा सब ओर नीची और मध्य में ऊँची भूमि प्रशस्त मानी गयी है। एक हाथ गहराई तक खोदकर निकाली हुई मिट्टी यदि फिर उस गड्ढे में डाली जाने पर अधिक हो जाय तो वहाँ की भूमि को उत्तम समझना चाहिये। अथवा जल आदि से उसकी परीक्षा करें। हड्डी और कोयले आदि से दूषित भूमि का शोधन खोदकर, गायों को ठहराकर या बार-बार जोतकर करना चाहिये-
यदाधारादिभेदेन प्रासादेष्वपि पञ्चधा।
परीक्षामथ मेदिन्याः कुर्यात्प्रासादकाम्यया ॥
शुक्लाज्यगन्धा रक्ता च रक्तगन्धा सुगन्धिनी।
पीता कृष्णा सुरागन्धा विप्रादीनां महीक्रमात् ॥
पूर्वेशोत्तरसर्वत्र पूर्वा चैषां विशिष्यते ।
आखाते हास्तिके यस्याः पूर्णे मृदधिका भवेत् ॥
उत्तमां तां महीं विद्यात्तोयाद्यैर्वा समुक्षिताम् । अस्थ्यङ्गारादिभिर्दुष्टामत्यन्तं शोधयेद् गुरुः ॥
(अग्निपुराण ९२।६-१०)
मत्स्यपुराण में वास्तुशास्त्र के अठारह आचार्यों का नामोल्लेख करते हुए वास्तुपुरुष की उत्पत्ति का विवरण भी दिया गया है-
‘भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा।
नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥
ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्र बृहस्पतिः ॥
अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः ।
संक्षेपेण उपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा ॥’ – मत्स्यपुराण अध्याय २५२।२-४
अर्थात् १. भृगु, २. अत्रि, ३. वसिष्ठ, ४. विश्वकर्मा, ५. मय, ६. नारद, ७. नग्नजित्, ८. विशालाक्ष, ९. इन्द्र, १०. ब्रह्मा, ११. कुमार (कार्तिकेय), १२. नन्दीश्वर, १३. शौनक, १४. गर्न, १५. वासुदेव, १६. अनिरुद्ध, १७. शुक्राचार्य, तथा १८. बृहस्पति – ये अठारह वास्तुशास्त्र के उपदेशक विख्यात हैं। इन अठारह आचार्यों में से मनु (वैवस्वत) को प्रलयकाल में संक्षेप में मत्स्यरूपधारी भगवान् ने वास्तुशास्त्र का उपदेश दिया था। जिसमें कुछ विद्वानों का वर्णन इस प्रकार है-
1. विश्वकर्मा – ये शुक्राचार्य के पुत्र थे, इन्हीं को त्वष्टा भी कहा जाता है। इन्हें वास्तुशास्त्र के साथ ज्योतिष का ज्ञान अपने पिता से प्राप्त हुआ था तथा कुछ ज्ञान इन्होंने बृहद्रथ से प्राप्त किया था। इनका वध इन्द्र द्वारा किया गया था। इनकी माता का नाम ‘गौ’ था, जो कि सोमप नामक पितृगणों की पुत्री थीं। त्वष्टा के तीन भाई और थे जिनके नाम वरुत्री, शण्ड तथा मर्क थे।
2. नारद – देवर्षि नारद पूर्वजन्म में परमेष्ठी प्रजापति के पुत्र थे। पुनः वे दक्ष के पुत्र होकर जन्मे। उन्हें कश्यप का पुत्र भी माना जाता है। अतः नारद दक्षपुत्रों के भ्राता थे। जिस प्रकार नारद का जन्म एक पहेली है, उसी प्रकार उनकी दीर्घायु तथा बहुमुखी प्रतिभा भी एक पहेली है। इनके भानजे पर्वत नामक ऋषि थे। ये ज्योतिष सामुद्रिक, वास्तु, संगीत, दर्शनशास्त्र इत्यादि अनेक विषयों एवं विद्याओं के ज्ञाता थे। नारदजी के ज्ञानोपदेश से बाद में ये परिव्राजक बन गये थे –
‘यं कश्यपं सुतवरं परमेष्ठी व्यजीजनत् ।
दक्षस्य दुहितरिदक्षशापभयान्मुनिः ।।’
(हरिवंशपुराण १।३।९)
‘विनाशसंशसी कंसस्य नारदो मथुरा ययौ।’
(हरिवंशपुराण २।१।१)
‘नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वतः ।’
(महाभारत १२। ३०।६)
3. वासुदेव – ये श्रीकृष्ण वासुदेव थे, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण के नाम से हम सब जानते हैं। ये वसुदेव के पुत्र होने से वासुदेव कहे जाते थे। इन्होंने सान्दीपनि गुरु के आश्रम में सम्पूर्ण विद्याओं का अध्ययन किया था। वास्तुशास्त्र के विशेष रहस्यों को इन्होंने विश्वकर्मा (त्वष्टा) के पुत्र मय से जान लिया था। इस बात का उल्लेख ‘विश्वकर्मप्रकाश’ (प्रस्तुत ग्रंथ) के अन्त में भी किया गया है। इन्होंने इसी विद्या के आधार पर समुद्र में शत्रुओं के सुरक्षित द्वारकापुरी का निर्माण कराया था, जो कि राजधानी थी। ये आज से ५२०० वर्ष पूर्व विद्यमान थे।
4. बृहस्पति – इनको बृहस्पति अंगिरस कहते हैं। ये देवताओं के पुरोहित थे। इन्होंने वेदाध्ययन ब्रह्मा कश्यप से किया था तथा पुराणों का अध्ययन शुक्राचार्य से; परंतु शुक्राचार्य की तामसी वृत्ति से इनका मतभेद हो गया था। अतः दोनों में संघर्ष चलता रहा। विवस्वान् तथा इन्द्र इन्हीं के शिष्य थे। राजा उपरिचरवस भी बहस्पति का यजमान तथा शिष्य था। ये चौथे वेदव्यास कहे जाते हैं, जिन्होंने वेदमन्त्रों के साथ व्याकरण, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण तथा वास्तुशास्त्र की रचना की थी।
क्या वास्तु केवल धार्मिक विश्वास है?
वास्तु शास्त्र का धार्मिक और पौराणिक पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके अनेक सिद्धांत व्यावहारिक भी हैं। जैसे—
* सूर्य के प्रकाश का उचित उपयोग।
* प्राकृतिक वायु का समुचित प्रवाह।
* जल निकासी की सही व्यवस्था।
* भूमि की गुणवत्ता का परीक्षण।
* संतुलित और सुरक्षित निर्माण योजना।
वास्तु शास्त्र भारतीय सभ्यता की एक अमूल्य धरोहर है। इसकी पौराणिकता केवल कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वेदों, पुराणों, शिल्पशास्त्रों और प्राचीन स्थापत्य-ग्रंथों में इसकी गहरी उपस्थिति दिखाई देती है। ब्रह्मा द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति, वास्तुपुरुष की कथा, विश्वकर्मा और मयदानव की परंपरा तथा विभिन्न ग्रंथों में वर्णित निर्माण-विधियाँ यह दर्शाती हैं कि वास्तु का भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। 21वीं सदी में वास्तु को अंधविश्वास कहकर नकारना आसान है, पर समझना जरूरी है। वास्तु केवल धर्म नहीं है। ये भारतीय स्थापत्य का विज्ञान है, सांस्कृतिक इतिहास की धरोहर है, और हमारे पूर्वजों का ज्ञान-विज्ञान है। अगर हम इसे तर्क, संदर्भ और आज की जरूरतों के साथ अपनाएं, तो समझ आएगा कि वास्तु हमें ये नहीं बताता कि “क्या तोड़ना है”… बल्कि ये बताता है कि “कैसे जीना है” – प्रकृति के साथ, संतुलन में, और शांति से। वास्तु शास्त्र अंत में एक ही बात कहता है: घर बनाओ तो ऐसा बनाओ, कि उसमें इंसान भी खुश रहे और प्रकृति भी। लेखक – सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431













