






आपने कभी सोचा है- दो घर एक ही साइज के, एक ही बजट में बने होते हैं, फिर भी एक में घुसते ही घुटन लगती है और दूसरे में सुकून? फर्क ईंट-सीमेंट का नहीं है। फर्क है इंटीरियर का। और इंटीरियर का फर्क है वास्तु का। आजकल हम घर बनाते समय तो वास्तु पंडित को बुला लेते हैं, पर जैसे ही पेंट, फर्नीचर, लाइट और फॉल्स सीलिंग की बारी आती है, वास्तु को दरवाजे के बाहर छोड़ देते हैं। हम भूल जाते हैं कि वास्तु दोष सिर्फ गलत नक्शे से नहीं, गलत इंटीरियर से भी बनता है। एक परफेक्ट वास्तु वाले घर में भी अगर आपने खिड़की के सामने 7 फीट की अलमारी ठोक दी, हवा-रोशनी का रास्ता बंद कर दिया, पूरे घर को भारी फर्नीचर से भर दिया तो वो घर वास्तु सम्मत कहां रहा? वास्तु कोई ताबीज नहीं है। यह स्पेस मैनेजमेंट का सबसे प्राचीन भारतीय विज्ञान है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता, विश्वकर्मप्रकाश, मयमतम, समरांगणसूत्रधार, अपराजितपृच्छा जैसे ग्रंथों में वास्तु को सिर्फ दिशा नहीं, बल्कि भूमि, माप, अनुपात, प्रकाश, वायु और भवन के हर अंग के संतुलन के रूप में देखा गया है। तो आधुनिक फ्लैट में वास्तु का क्या काम? यही सबसे बड़ा झूठ है कि फ्लैट पर वास्तु लागू नहीं होता।
वास्तु का पहला सूत्र है स्पेस मैनेजमेंट महानगरों के 2BHK, 3BHK में जगह कम है, सामान ज्यादा। यहीं पर वास्तु और इंटीरियर डिजाइनर का संगम जरूरी हो जाता है। सवाल ये नहीं है कि “मूर्ति किस दिशा में रखें?”, सवाल ये है कौन सा हिस्सा खुला छोड़ें और कौन सा भारी रखें? प्राकृतिक प्रकाश को कैसे घर में रोका नहीं, बुलाया जाए? हवा का रास्ता कहां से बनेगा? चलने-फिरने की जगह कहां बचेगी? ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) – हल्का और पवित्र रखें। इसे भारी पैनलिंग और स्टोरेज से मत भरिए। ये घर का सबसे हल्का, सबसे खुला कोना होना चाहिए। पूजा, ध्यान, पढ़ने-लिखने के लिए सबसे उत्तम।
नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) स्थिरता का कोना। यहां भारीपन अच्छा लगता है। मास्टर बेडरूम, भारी अलमारी, बड़ा स्टोरेज यहां प्लान करें। इससे घर में बैलेंस बनता है और प्रैक्टिकली भी फर्नीचर का भार एक तरफ व्यवस्थित हो जाता है। रसोई सिर्फ दिशा नहीं, वेंटिलेशन है। आग्नेय कोण को अग्नि का स्थान माना गया है, पर मॉडर्न किचन में सिर्फ दिशा से काम नहीं चलेगा। कुकिंग प्लेटफॉर्म, सिंक, चिमनी, इलेक्ट्रिक पॉइंट्स का सही तालमेल ही असली वास्तु है। अगर किचन की जगह बदली नहीं जा सकती, तो उसके अंदर की प्लानिंग को तो वास्तु-सम्मत बनाइए।
प्रकाश और वायु – वास्तु की आत्मा
पूर्व की सुबह की धूप और क्रॉस वेंटिलेशन – ये दो चीजें किसी भी महंगे झूमर से ज्यादा कीमती हैं। इंटीरियर करते समय कभी भी खिड़कियों के सामने ऊंचे यूनिट्स मत लगाइए। रोशनी को रोकना सबसे बड़ा वास्तु दोष है। फर्नीचर – सजावट नहीं, स्पेस का मालिक है। सोफा, बेड, डाइनिंग, वार्डरोब ऐसे रखें कि दरवाजे पूरे खुलें, खिड़की तक पहुंच बनी रहे और घर में कंजेशन न लगे। दक्षिण-पश्चिम में भारी और उत्तर-पूर्व में हल्का – यही सबसे प्रैक्टिकल फॉर्मूला है।
बेडरूम – सुकून की जगह। बेड की पोजीशन, लाइटिंग, पर्दों का रंग और सबसे जरूरी दर्पण। सोते समय दर्पण में आपका प्रतिबिंब नहीं पड़ना चाहिए। यह बेचैनी बढ़ाता है। दक्षिण-पश्चिम में मास्टर बेडरूम उत्तम, पर जगह न हो तो एक्सपर्ट से लेआउट के हिसाब से दूसरा विकल्प लें। घर को म्यूजियम मत बनाइए। आज डरावनी पेंटिंग्स, दहाड़ते शेर-बाघ की तस्वीरें लगाना स्टेटस सिंबल बन गया है। यूनिक बनने के चक्कर में घर को डरावना मत बनाइए। याद रखिए – सुंदर घर वो नहीं जहां महंगा फर्नीचर है। सुंदर घर वो है जहां घुसते ही सांस खुलकर आए, रोशनी हो, हवा हो और हर चीज अपनी जगह पर हो। वास्तु यही सिखाता है सजावट नहीं, सलीका। घर को महंगे सामान से नहीं, बल्कि प्रकाश, हवा और सलीकेदार स्पेस मैनेजमेंट से सुंदर और शांत बनाया जाता है। -सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431







