





आज 10 जून है यानि विश्व नेत्रदान दिवस। ये वो दिन है जब पूरी दुनिया एक साथ कहती है- “मरने के बाद भी मेरी आँखें जी सकती हैं।”
नेत्रदान क्यों ज़रूरी है?
दुनिया में 1.2 करोड़ से ज़्यादा लोग कॉर्निया खराब होने की वजह से देख नहीं पाते। अकेले भारत में 12 लाख से ज़्यादा लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से जूझ रहे हैं। दुख की बात ये है कि हर 70 में से सिर्फ़ 1 मरीज़ को ही कॉर्निया मिल पाता है। बाकी 69 लोग सिर्फ़ इंतज़ार करते रह जाते हैं।
एक दान, दो ज़िंदगियाँ
एक व्यक्ति के मरने के बाद दान की गई दो आँखों से दो अलग-अलग लोगों की रोशनी लौट सकती है। सोचिए, आपके जाने के बाद भी आपकी आँखें किसी बच्चे को स्कूल जाते हुए देखेंगी, किसी माँ को अपना बच्चा पहली बार देखते हुए देखेंगी।
"गोल्डन पीरियड" का रखें ध्यान : 6 से 8 घंटे
नेत्रदान के लिए सबसे ज़रूरी बात है समय। व्यक्ति की मृत्यु के 6 से 8 घंटे के अंदर ही डॉक्टर को आँखें निकालनी होती हैं। इसलिए परिवार का तुरंत अस्पताल या आई बैंक को फोन करना बहुत ज़रूरी है। देर हुई तो दान संभव नहीं हो पाएगा।
कौन कर सकता है नेत्रदान?
यह सबसे बड़ी गलतफहमी है कि “चश्मा लगता है तो दान नहीं कर सकते”। सच्चाई ये है : हर कोई नेत्रदान कर सकता है।
गलतफहमी/सच्चाई...
- चश्मा लगा है, दान नहीं होगा / चश्मे का नंबर कुछ भी हो, कॉर्निया दान हो सकता है
- मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ है / फिर भी दान संभव है
- डायबिटीज़ या BP है / फिर भी आँखें दान कर सकते हैं
- उम्र ज़्यादा है / 2 साल से 100 साल तक कोई भी दान कर सकता है
अगर किसी कारण से कॉर्निया ट्रांसप्लांट के लायक न हो, तो भी उस आँख को मेडिकल रिसर्च और डॉक्टरों की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यानी आपका दान बेकार नहीं जाएगा।
नेत्रदान कैसे करें?
1. संकल्प लें : अपने नज़दीकी आई बैंक या अस्पताल में जाकर नेत्रदान का फॉर्म भरें। परिवार को बता दें।
2. परिवार को बताना ज़रूरी : मृत्यु के बाद अंतिम फैसला परिवार का होता है। अगर उन्हें पहले से पता होगा तो वो तुरंत हाँ कर देंगे।
3. मृत्यु के बाद तुरंत फोन करें : 6 घंटे के अंदर नज़दीकी आई बैंक को सूचना दें। टीम घर आकर सिर्फ़ 15-20 मिनट में प्रक्रिया पूरी कर देती है। चेहरा खराब नहीं होता।
बीकानेर में कहाँ संपर्क करें...
पीबीएम अस्पताल आई बैंक : 0151-220XXXX
राष्ट्रीय हेल्पलाइन: 1919
एक डॉक्टर की अपील...
मैं रोज़ OPD में ऐसे बच्चों को देखता हूँ जो जन्म से देख नहीं सकते। सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्हें एक कॉर्निया नहीं मिला। 5 साल का बच्चा पूछता है- “डॉक्टर अंकल, आसमान नीला कैसा होता है?”
आपका एक फॉर्म भरना, एक फोन करना, किसी बच्चे को आसमान का रंग दिखा सकता है। मरने के बाद हमारी आँखें मिट्टी हो जाएंगी। पर दान कर दें तो वो किसी की ज़िंदगी बन जाएंगी। आज संकल्प लें। अपने परिवार से बात करें। क्योंकि अंधेरे को हराने के लिए दिया जलाना पड़ता है और इस बार दिया आपकी आँखें बन सकती हैं। -डॉ. श्याम अग्रवाल, शिशु रोग विशेषज्ञ, बीकानेर
[यह लेख जनहित में जारी। अधिक जानकारी के लिए अपने नेत्र रोग विशेषज्ञ से मिलें।






