Hometrendingबाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस : एक बाल रोग विशेषज्ञ की...

बाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस : एक बाल रोग विशेषज्ञ की नज़र से…

AdAdAdAdAdAd

आज 12 जून 2026 को पूरी दुनिया *बाल श्रम के विरुद्ध विश्व दिवस* मना रही है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ ने साल 2002 में इस दिन की शुरुआत की थी। मकसद साफ है – दुनिया को याद दिलाना कि बच्चे का काम पढ़ना, खेलना और बढ़ना है, कमाना नहीं। पर एक बाल रोग विशेषज्ञ के लिए ये सिर्फ एक तारीख नहीं है। ये वो दिन है जब मेरी ओपीडी में आने वाला हर कमजोर, दुबला-पतला, डरा-सहमा बच्चा मुझे सवाल करता है – _”डॉक्टर अंकल, मेरा बचपन कहाँ गया?”

आँकड़े जो हमारे क्लीनिक
में रोज़ ज़िंदा होते हैं

आईएलओ और यूनिसेफ की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में दुनिया भर में 13.8 करोड़ बच्चे बाल श्रम में लगे थे। इनमें से 5.4 करोड़ बच्चे ‘खतरनाक काम’ कर रहे थे। खतरनाक मतलब – पत्थर की खदान, पटाखा फैक्ट्री, केमिकल वाली फैक्ट्री, खेतों में कीटनाशक छिड़कना। बच्चे का शरीर ‘छोटा वयस्क’ नहीं होता। उसके फेफड़े, दिमाग, हड्डियाँ अभी बन रहे हैं। धूल, धुआँ, केमिकल, 12-12 घंटे की शिफ्ट – ये सब उसके अंगों पर जहर की तरह काम करते हैं।

मेरे पास जो बच्चा आता है...

1. सिलिकोसिस लेकर : क्योंकि 10 साल की उम्र में पत्थर घिस रहा था।
2. हाथ जला हुआ लेकर : क्योंकि पटाखा बनाते वक्त आग लग गई।
3. रीढ़ की हड्डी टेढ़ी लेकर : क्योंकि ईंटें ढो रहा था।
4. खून की कमी, हाइट कम, वजन कम* लेकर : क्योंकि स्कूल की मिड-डे मील की जगह उसे चाय की दुकान पर 14 घंटे खड़ा रहना पड़ा।

कानून है, पर बचपन कहाँ है?

भारत का संविधान 14 साल से कम उम्र के बच्चों को खदान, फैक्ट्री या खतरनाक कामों में लगाने से रोकता है। आईएलओ कहता है 18 साल से कम उम्र के बच्चे को खतरनाक काम नहीं देना चाहिए। इस साल 2026 में, ‘बाल श्रम के निकृष्टतम रूपों’ पर कन्वेंशन को अपनाए 27 साल हो गए हैं।* कागज़ पर कानून है, पर ज़मीन पर गरीबी, पलायन, और स्कूल से दूरी बच्चों को काम पर धकेल रही है।

एक डॉक्टर का पर्चा : 'प्रयास 
तेज़ करें' का मतलब क्या है?

1. ओपीडी में पूछें : हर बच्चे से पूछो : “स्कूल जाते हो? काम करते हो?”_ बाल श्रम अब ‘वाइटल साइन’ है। बीपी-शुगर की तरह इसे भी नोट करो।

2. इलाज + रिपोर्ट : खाँसी की दवा दो, पर चाइल्डलाइन 1098 पर कॉल भी करो। बाल श्रम कानून के तहत डॉक्टर का फर्ज है कि वो रिपोर्ट करे।

3. आंगनवाड़ी और स्कूल से जुड़ें : कुपोषण + स्कूल से गैरहाज़िरी = खतरे की घंटी। जल्दी पकड़ोगे तो बचपन बचेगा।

4. परिवार का इलाज करो : घर में टीबी का मरीज़ पिता या बीमार माँ अक्सर बच्चों को काम पर भेजने की वजह बनते हैं। परिवार स्वस्थ, तो बच्चा स्कूल में।

5. ‘कैश + केयर’ की वकालत* : मिड-डे मील, मुफ्त किताबें, और पास में हेल्थ सेंटर – ये तीन चीज़ें बच्चों को लेबर से निकालकर क्लासरूम में लाती हैं।

आखिरी बात : बचपन रिचार्ज नहीं होता

हम डॉक्टर शपथ लेते हैं – “पहले, कोई नुकसान मत पहुँचाओ।” बाल श्रम पर चुप रहना ‘नुकसान’ है। 138 करोड़ के देश में 13.8 करोड़ बच्चे अभी भी काम कर रहे हैं। प्रगति हुई है- 2020 के बाद 2.2 करोड़ बच्चे कम हुए हैं। पर जिस बच्चे की हड्डी आज टूट रही है, उसे ‘आँकड़ों की कमी’ से राहत नहीं मिलेगी। बच्चे का काम है गिरना, घुटना छिलवाना, और माँ की गोद में रोकर चुप हो जाना। उसका काम ईंट उठाना, बीड़ी बनाना, या ढाबे पर कप धोना नहीं है।

आज 12 जून 2026 है। *’प्रयास तेज़ करें’- क्योंकि बचपन का अलार्म एक बार बजकर बंद हो जाए, तो फिर स्नूज़ बटन नहीं होता। अगर आपको लगता है कि कोई बच्चा बाल श्रम कर रहा है, तो तुरंत चाइल्डलाइन 1098 पर कॉल करें। आपका एक कॉल किसी का पूरा बचपन लौटा सकता है। -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल रोग विशेषज्ञ बीकानेर

AdAdAdAd
- Advertisment -

Most Popular