








बीकानेर Abhayindia.com करणी माता की तपोभूमि देशनोक में जन्में यशस्वी भामाशाह सुंदरलाल दुग्गड़ अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी प्रेरणादायी स्मृति सदैव अमिट रहेगी। पीडि़तजन की सेवा के साथ शिक्षा और समाज के उत्थान में सदैव अग्रणीय रहे। धर्म परायण एवं परोपकारी सुंदरलाल दुग्गड़ ने अपने सद्कर्मो से मरूधरा में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि, उनकी कर्मस्थली कोलकाता थी, लेकिन मरुधरा के साथ उनका आत्मीय लगाव जीवन के अंतिम पलों तक रहा।
देशनोक का गौरव कहे जाने वाले सज्जन-शिरोमणि, सौम्यता और उदारता के अप्रतिम प्रतीक दुग्गड़ का जीवन समाजसेवा, दान और संघनिष्ठा का सजीव साक्षात्कार था। सेवाभावी जगत से जुड़े महानुभवी लोगों ने बताया कि वे शालीनता और उदारता की प्रतिमूर्ति थे। जीवन का उत्कर्ष नहीं, बल्कि स पूर्ण मानवता के लिए अमर संदेश है। अपनी देहादान के संकल्प से उन्होने चरितार्थ कर दिखाया कि मृत्यु भी सेवा का अंत नहीं, अपितु एक नई प्रेरणा का प्रारंभ है।
दुग्गड़ ने अपने सद्कार्यो से अपने पूर्वजों की याति में चार चांद लगाते हुए संपूर्ण भारत की अनेक संस्थाओं से जुड़ कर समाजसेवा की मिसाल कायम की, जो अपने आप में अद्वितीय है। उनका सहज सादगीपूर्ण जीवन सभी के लिए प्रेरक रहा। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक, चिकित्सकीय आदि क्षेत्रों में पहचान बनाने वाले दुग्गड़ सेवाभावी व्यक्तित्व के धनी थे। अपने जीवन में उन्होंने कई उतार देखे लेकिन, कभी विचलित नहीं हुए बल्कि सबके समभाव बनाये रखा। उनका आदर्श व्यक्तित्व समाज की नई पीढ़ी के लिये प्रेरणास्त्रोत है। उनका निधन परिवार ही नहीं संघ, समाज और राष्ट्र के लिये अपूरणीय क्षति है।


