









घर सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढाँचा नहीं होता, वह हमारी भावनाओं, सपनों और ऊर्जा का केंद्र होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, जिस तरह शरीर की स्थिरता रीढ़ की हड्डी पर टिकी होती है, उसी तरह भवन की समृद्धि, शांति और उन्नति उसकी नींव पर निर्भर करती है। नींव ही वह पहला संकल्प है जो धरती माता से जुड़कर पूरे घर को पंचतत्वों का संतुलन प्रदान करता है। यदि नींव वास्तु सम्मत शुभ मुहूर्त, सही दिशा और विधि से रखी जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है और वास्तु दोषों की संभावना स्वतः ही कम हो जाती है। इसके विपरीत, नींव में हुई एक छोटी सी चूक भी पीढ़ियों तक आर्थिक, मानसिक और शारीरिक कष्टों का कारण बन सकती है। इसलिए कहा जाता है “नींव संभली तो जीवन संभला”।
अधिकांश लोग घर की सुंदरता को उसके रंग, इंटीरियर या डिजाइन से जोड़ते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन का वास्तविक आधार उसकी नींव होती है। नींव केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट का ढांचा नहीं है बल्कि यह उस ऊर्जा का आधार है जिस पर पूरे भवन का जीवन टिका होता है। यदि नींव मजबूत और संतुलित है तो भवन वर्षों तक सुरक्षित रहता है। इसी प्रकार यदि नींव वास्तु सम्मत है तो भवन सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। वास्तु शास्त्र में प्रत्येक भूखंड पर वास्तु पुरुष की कल्पना की गई है। माना जाता है कि वास्तु पुरुष भूमि पर विशिष्ट स्थिति में विद्यमान रहता है और उसके शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न दिशाओं में स्थित होते हैं।
ज्योतिश्शास्त्रानुसारेण सुदिने शुभवासरे।
सुलग्ने सुमुहूर्ते च सुस्नातः प्राङ्मुखो गृही ॥
पूजयेद् गणनाथञ्च ग्रहांश्च कलशे स्थितान्।
परीक्षिते च भूभागे गोमयेनानुलिप्य च ॥
तत्र सम्पूजयेद् विप्रान् दैवज्ञञ्च तथैव च।
यावत्प्रमाणा भूर्याह्या गृहार्थं तावता गृही ॥
पञ्चगव्यौषधैः जलैस्तथा पञ्चामृतेन च।
सेचयेच्छुद्धिकामेन भूसंस्कारांश्च कारयेत् ॥
गृहस्वामी को ज्योतिशास्त्र के अनुसार, शुभ दिन, शुभ वार, शुभ लग्न, शुभ मुहूर्त में स्नान करके जिस भूमि पर घर बनाना हो वहाँ जाकर श्रीगणेशजी महाराज नवग्रह आदि की कलश पर पूजा करे, फिर जितनी भूमि पर भवन बनाना हो नापकर उतनी भूमि को (दिक्शुद्धि के साथ) ग्रहण करे। सर्वप्रथम पूजास्थल को गोबर से लीपकर फिर उस पर अष्टदलकमल बनाकर कलश का स्थापन करे, ज्योतिषी तथा ब्राह्मणों की दक्षिणा-द्रव्यादि से पूजाकर उन्हें सन्तुष्ट करें। पंचगव्य (गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र, गोमय), सर्वोषधि के जल तथा पंचामृत (गोदुग्ध, गोदधि, गोष्घृत, शर्करा तथा मधु) इनको मिलाकर उस भूमि पर छिड़कना चाहिये तथा भूमि के अन्य संस्कार (सफाई; झाड़झंखाड़ काटना तथा समतलीकरण) भी पूर्व में ही कर लेना चाहिये। सर्वप्रथम एक छिद्ररहित कलश में स्वर्णधातु डालकर उसमें जल भर दें। उसी में सर्वधान्य, सर्वगन्ध, सर्वोषधि, पुष्प डालकर रक्तवर्ण के वस्त्र से कलश को वेष्टित कर दें। फिर मन्त्रोंसहित नवग्रहों, वरुणादि देवताओं का उस कलश पर आवाहन करें। उसी पर पर्वतों, वनों, नदियों, नदी तथा कर्णिका सहित पृथ्वी का आवाहन करें। सागर से वेष्टित पृथ्वी देवी की पूजा तथा प्रार्थना करें, दश दिक्पालों, कुलदेवी, कुलदेवता, यक्ष तथा नागों का पूजन करे तथा उन्हें बलि देकर विधिपूर्वक ‘जलाय०’ मंत्रों, षड्ऋचाओं तथा रुद्रसूक्त का जाप करें। फिर अन्त में उस कलश पर वास्तुदेवता की पूजा तथा प्रार्थना करें।
ॐ नमो भगवते वास्तुपुरुषाय कपिलाय च।
पृथ्वीधराय देवाय प्रधानपुरुषाय च सकलगृहप्रासादपुष्करोद्यानकर्मणि च।।
गृहारम्भप्रथमकाले सर्वसिद्धिप्रदायक ।
सिद्धदेवमनुष्यैश्च पूज्यमानो दिवानिशम् ॥
गृहस्थाने प्रजापतिक्षेत्रेऽस्मिंस्तिष्ठ साम्प्रतम् ।
इहागच्छ इमां पूजां गृहाण वरदो भव।।
वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूमिशय्यारत प्रभो।
मद् गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा ॥ ९८ ॥
हे कपिलवर्ण के वास्तुपुरुष! पृथ्वी को धारण करनेवाले प्रधान पुरुष! आपको नमस्कार है। आप सभी प्रकार के भवन, प्रासाद, उद्यानादि- निर्माण के कार्यों में तथा गृहारम्भ के प्रथम काल में सम्पूर्ण सफलता को देनेवाले हैं। आपकी सिद्ध, देवतागण तथा मनुष्य रात-दिन पूजा किया करते हैं। आप यहाँ इस गृह निर्माण हेतु भूमि पर प्रजापति के क्षेत्र में इस समय (इस अवसर पर) आकर विराजमान हों तथा यहाँ आकर इस पूजा एवं बलि आदि को स्वीकार करने की कृपा करें ॥
भवन की नींव के लिए खुदाई करने के लिये सर्वप्रथम आठों दिशाओं की शुद्धि का विचार आवश्यक रूप से कर लेना चाहिये। वर्गाकार या आयताकार भूखण्ड में दिशाओं का निश्चय सुविधाजनक होता है। वास्तव में भूखण्ड या गृह भूखण्ड भूमि का वह भाग होता है, जिस पर गृह का निर्माण कार्य किया जा सके। जब भी किसी भवन के निर्माण की बात होती है, तो सबसे पहले जिस तत्व का ध्यान आता है वह है उसकी नींव (Foundation)। सामान्य इंजीनियरिंग की दृष्टि से नींव भवन को मजबूती प्रदान करती है, लेकिन वास्तु शास्त्र में नींव का महत्त्व केवल संरचनात्मक नहीं बल्कि आध्यात्मिक, ऊर्जात्मक और सांस्कृतिक भी माना गया है।
प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र में कहा गया है कि जिस प्रकार किसी वृक्ष की शक्ति उसकी जड़ों में निहित होती है, उसी प्रकार किसी भवन की स्थिरता, समृद्धि और शुभता उसकी नींव पर निर्भर करती है। यदि नींव उचित विधि, शुभ समय और वास्तु सिद्धांतों के अनुसार बनाई जाए तो भवन में रहने वाले लोगों को दीर्घकाल तक सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। अधिकांश लोग घर की सुंदरता को उसके रंग, इंटीरियर या डिजाइन से जोड़ते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन का वास्तविक आधार उसकी नींव होती है। नींव केवल ईंट, पत्थर और सीमेंट का ढांचा नहीं है बल्कि यह उस ऊर्जा का आधार है जिस पर पूरे भवन का जीवन टिका होता है। यदि नींव मजबूत और संतुलित है तो भवन वर्षों तक सुरक्षित रहता है। इसी प्रकार यदि नींव वास्तु सम्मत है तो भवन सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। वास्तु शास्त्र में प्रत्येक भूखंड पर वास्तु पुरुष की कल्पना की गई है। माना जाता है कि वास्तु पुरुष भूमि पर विशिष्ट स्थिति में विद्यमान रहता है और उसके शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न दिशाओं में स्थित होते हैं।
ज्योतिश्शास्त्रानुसारेण सुदिने शुभवासरे।
सुलग्ने सुमुहूर्ते च सुस्नातः प्राङ्मुखो गृही ॥
पूजयेद् गणनाथञ्च ग्रहांश्च कलशे स्थितान्।
परीक्षिते च भूभागे गोमयेनानुलिप्य च ॥
तत्र सम्पूजयेद् विप्रान् दैवज्ञञ्च तथैव च।
यावत्प्रमाणा भूर्याह्या गृहार्थं तावता गृही ॥
पञ्चगव्यौषधैः जलैस्तथा पञ्चामृतेन च।
सेचयेच्छुद्धिकामेन भूसंस्कारांश्च कारयेत् ॥
गृहस्वामी को ज्योतिशास्त्र के अनुसार, शुभ दिन, शुभ वार, शुभ लग्न, शुभ मुहूर्त में स्नान करके जिस भूमि पर घर बनाना हो वहाँ जाकर श्रीगणेशजी महाराज नवग्रह आदि की कलश पर पूजा करे, फिर जितनी भूमि पर भवन बनाना हो नापकर उतनी भूमि को (दिक्शुद्धि के साथ) ग्रहण करें। सर्वप्रथम पूजास्थल को गोबर से लीपकर फिर उस पर अष्टदलकमल बनाकर कलश का स्थापन करे, ज्योतिषी तथा ब्राह्मणों की दक्षिणा-द्रव्यादि से पूजाकर उन्हें सन्तुष्ट करे। पंचगव्य (गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोमूत्र, गोमय), सर्वोषधि के जल तथा पंचामृत (गोदुग्ध, गोदधि, गोष्घृत, शर्करा तथा मधु) इनको मिलाकर उस भूमि पर छिड़कना चाहिये तथा भूमि के अन्य संस्कार (सफाई; झाड़झंखाड़ काटना तथा समतलीकरण) भी पूर्व में ही कर लेना चाहिये। सर्वप्रथम एक छिद्ररहित कलश में स्वर्णधातु डालकर उसमें जल भर दें। उसी में सर्वधान्य, सर्वगन्ध, सर्वोषधि, पुष्प डालकर रक्तवर्ण के वस्त्र से कलश को वेष्टित कर दें। फिर मन्त्रोंसहित नवग्रहों, वरुणादि देवताओं का उस कलश पर आवाहन करें। उसी पर पर्वतों, वनों, नदियों, नदी तथा कर्णिका सहित पृथ्वी का आवाहन करें। सागर से वेष्टित पृथ्वी देवी की पूजा तथा प्रार्थना करें, दश दिक्पालों, कुलदेवी, कुलदेवता, यक्ष तथा नागों का पूजन करे तथा उन्हें बलि देकर विधिपूर्वक ‘जलाय०’ मंत्रों, षड्ऋचाओं तथा रुद्रसूक्त का जाप करें। फिर अन्त में उस कलश पर वास्तुदेवता की पूजा तथा प्रार्थना करें॥
ॐ नमो भगवते वास्तुपुरुषाय कपिलाय च।
पृथ्वीधराय देवाय प्रधानपुरुषाय च सकलगृहप्रासादपुष्करोद्यानकर्मणि च।।
गृहारम्भप्रथमकाले सर्वसिद्धिप्रदायक ।
सिद्धदेवमनुष्यैश्च पूज्यमानो दिवानिशम् ॥
गृहस्थाने प्रजापतिक्षेत्रेऽस्मिंस्तिष्ठ साम्प्रतम् ।
इहागच्छ इमां पूजां गृहाण वरदो भव।।
वास्तुपुरुष नमस्तेऽस्तु भूमिशय्यारत प्रभो।
मद् गृहं धनधान्यादिसमृद्धं कुरु सर्वदा ॥ ९८ ॥
हे कपिलवर्ण के वास्तुपुरुष! पृथ्वी को धारण करनेवाले प्रधान पुरुष! आपको नमस्कार है। आप सभी प्रकार के भवन, प्रासाद, उद्यानादि- निर्माण के कार्यों में तथा गृहारम्भ के प्रथम काल में सम्पूर्ण सफलता को देनेवाले हैं। आपकी सिद्ध, देवतागण तथा मनुष्य रात-दिन पूजा किया करते हैं। आप यहाँ इस गृह निर्माण हेतु भूमि पर प्रजापति के क्षेत्र में इस समय (इस अवसर पर) आकर विराजमान हों तथा यहाँ आकर इस पूजा एवं बलि आदि को स्वीकार करने की कृपा करें ॥
भवन की नींव हेतु खुदाई करने के लिये सर्वप्रथम आठों दिशाओं की शुद्धि का विचार आवश्यक रूप से कर लेना चाहिये। वर्गाकार या आयताकार भूखण्ड में दिशाओं का निश्चय सुविधाजनक होता है। वास्तव में भूखण्ड या गृह भूखण्ड भूमि का वह भाग होता है, जिस पर गृह का निर्माण कार्य किया जाता है। भवन को वास्तु के अनुसार बनाने के लिए भवन का नक्शा तो वास्तु-सम्मत बनाने का प्रयास किया जाता है क्योंकि इसमें तो आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी तथाकथित रूप से सहायता कर देता है परंतु नींव की भी खुदाई में वास्तु का उपयोग होता है इसका भी ध्यान रखना आवश्यक है।
घर बनाने के लिये नींव की खुदाई, किस दिशा से आरम्भ की जाय इसके निश्चय के लिये राहु के मुख, पीठ एवं पूँछ की स्थिति उस भूखण्ड में किस विदिशा में एवं दिशा में है- यह जानना बहुत जरूरी है। राहु सर्प के आकार में प्रत्येक भूखण्ड में अपने शरीर को शिर से पैर तक प्रसारित कर लेटा रहता है। उसकी स्थिति सूर्य की तीन-तीन राशियों के भोग के उपरान्त बदलती रहती है। यह सौर राशियों की गणना स्थिर राशियों से प्रारम्भ की जाती है। अतः वास्तुशास्त्र हमें इस बात के लिये सावधान करता है कि खनन प्रारम्भ करते समय उस सर्पाकार राहु के किसी अंश पर प्रहार न हो जाय। ऐसा होने पर गृहस्वामी का अनिष्ट होता है। अतः खुदाई उस स्थल से आरम्भ हो, जहाँ पर राहु के शरीर का कोई अंग पीड़ित न हो।यह राहु गृह-निर्माण हेतु सिंहादि तीन राशि के क्रम से ईशानादि कोणों से उलटा चलता है। जिस विदिशा (कोण) में राहु का मुख होता है, उससे पिछली दो विदिशाओं में क्रमशः पीठ तथा पूँछ होती है। जैसे कि सिंह, कन्या, तुला राशियों के निरयण सूर्य में राहु का मुख ईशान कोण में होता है तब उसकी पीठ वायव्य में तथा पूँछ नैऋत्य कोण में होती है। यह दिशाएँ भूखण्ड के मध्य से देखनी चाहिये।
गौरतलब है कि भूखण्ड में नींव खोदने का प्रारम्भ सदैव मुख्य दिशाओं (पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर) से न होकर ईशानादि विदिशाओं (कोणों) से होता है। बस, नींव की खुदाई का आरम्भ राहु के मुख-पूँछ तथा पृष्ठवाली दिशा से आरम्भ न कर खाली विदिशा (उपदिशा या कोण) से आरम्भ करना चाहिए। वास्तु शास्त्र में नींव को केवल भवन का आधार नहीं बल्कि उसकी ऊर्जा, स्थिरता और शुभता का केंद्र माना गया है। यह पृथ्वी तत्व से जुड़ाव, वास्तु पुरुष का सम्मान, सकारात्मक ऊर्जा का संचय और परिवार के भविष्य की सुरक्षा का प्रतीक है। जब नींव उचित दिशा, शुभ मुहूर्त, भूमि पूजन और वास्तु सिद्धांतों के अनुसार बनाई जाती है, तब भवन केवल रहने का स्थान नहीं रहता बल्कि सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र बन जाता है। लेखक -सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431



