सौभाग्य कल्पवृृक्ष के तपस्वियों की शोभायात्रा, भगवान पाश्र्वनाथ का चैत्यवंदन

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बीकानेर Abhayindia.com जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साध्वीश्री मृृगावतीश्रीजी मसा, साध्वीश्री सुरप्रियाश्री व नित्योदायाश्रीजी म.सा.के सान्निध्य में शुक्रवार को रांगड़ी चैक के सुगनजी महाराज के उपासरे से सौभाग्य कल्पवृृृक्ष तपस्वियों की शोभायात्रा निकली।

भुजिया बाजार के चिंतामणि जैन मंदिर होते हुए शोभायात्रा नाहटा चौक के भगवान आदिनाथ मंदिर पहुंचकर वापिस गंतव्य स्थल तक पहुंची। भगवान आदिनाथ मंदिर में भगवान पाश्र्वनाथ, दादा गुरुदेव व अन्य देवालयों में भगवान पाश्र्वनाथ के निर्वाण दिवस पर लड््डू चढाया गया। साध्वीवृंद के नेतृृत्व में श्रावक-श्राविकाओं ने भजन व स्तुतियों की प्रस्तुति दी। शोभायात्रा में शामिल श्रावक-श्राविकाएं जैन धर्म, भगवान पाश्र्वनाथ व आदिनाथ आदि देवों के जयकारे लगा रहे थे वहीं तपस्वी कनिका बोथरा पत्नी धर्मनिष्ठ श्रावक स्वर्गीय केशरीचंद बोथरा चांदी के कल्पवृृक्ष को सिर पर लेकर मंत्र जाप करते हुए चल रहीं थीं। मंदिर में नवंकार महामंत्र सहित विभिन्न मंत्रों का जाप किया गया।

साध्वीश्री मृगावतीश्रीजी ने सुगनजी महाराज के उपासरे में जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ के आदर्शों का स्मरण दिलाया। उन्होंने कहा कि भगवान पाश्र्वनाथ का जन्म लगभग 2 हजार 900 साल पूर्व वाराणसी में हुआ। वाराणसी में अश्वसेन नाम के इक्ष्वाकुवंशीय राजा की रानी वामा ने पौषकृृष्ण एकादशी के दिन महातेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिनके शरीर पर सर्प का चिन्ह था, इसलिए इनका नाम पाश्र्व रखा गया। राजकुमार के रूप में भगवान पाश्र्वनाथ ने पूजा के लिए जलाएं जा रहे अलाव में एक सर्प के जोड़े को जलते देखकर कहा ’’दयाहीन धर्म किसी काम का नहीं है। उन्होंने तीस वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की तथा 83 दिन काशी में कठोर तपस्या के बाद 84 वें दिन केवल ज्ञान प्राप्त किया।

साध्वीजी ने बताया कि भगवान पाश्र्वनाथ का निवाण श्रावण शुक्ला सप्तमी को पारसनाथ की पहाड़ी, झारखंड (श्री सम्मेद शिखजी तीर्थं) में हुआ। भगवान आदिनाथ, भगवान महावीर, के बाद जैन धर्म में सर्वाधिक लोकप्रिय, वंदनीय भगवान पाश्र्वनाथ के जैन के साथ अजैनों मे बौद्धधर्म के बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पूजन व वंदन किया। उन्होंने कहा कि भगवान पाश्र्वनाथजी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, क्रिया, जप, तप, साधना, आराधना व भक्ति के समय अहिंसा व जीवदया को सर्वोपरि रखें। धार्मिक व आध्यात्मिक साधना, आराधना व भक्ति में किसी भी जीवों कष्ट नहीं पहुंचे। प्रेषक- शिवकुमार सोनी वरिष्ठ सांस्कृतिक पत्रकार