








खैरथल-तिजारा Abhayindia.com राजस्थान के खैरथल-तिजारा ज़िले की तिजारा तहसील के लाड़िया गांव में मुर्गों की अवैध लड़ाई की सूचना मिलने पर, पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स, इंडिया (PETA इंडिया) ने तुरंत कार्रवाई करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को सतर्क किया। पुलिस की चेतावनी के बावजूद, आयोजकों ने यह अवैध कार्यक्रम आयोजित किया। जब पुलिस को यह जानकारी मिली कि मुर्गा लड़ाई शुरू हो चुकी है, तो उन्होंने तुरंत मौके पर पहुंचकर कार्यक्रम को बीच में ही रुकवा दिया। टापूकड़ा पुलिस थाने ने इस अवैध आयोजन के आयोजकों, प्रतिभागियों और पशु मालिकों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 325 और 112(2), तथा राजस्थान पब्लिक गैंबलिंग ऑर्डिनेंस, 1949 की धारा 13 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। इसके साथ ही, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (PCA Act), 1960 की धाराएं 3, 11(1)(a), 11(1)(m)(ii), और 11(1)(n) भी FIR में शामिल की गई हैं, जो पशुओं को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाने, उन्हें लड़ाने के लिए उकसाने, और इस प्रकार की लड़ाई के लिए जगह देने या संचालित करने पर रोक लगाती हैं। यह FIR 28 सितंबर को पुलिस द्वारा दर्ज की गई थी, जिसमें 17 व्यक्तियों को इस अवैध आयोजन को आयोजित करने और उसमें भाग लेने का आरोपी बनाया गया है। कार्रवाई के दौरान सात मुर्गों और दो मुर्गियों को बचाया गया और स्थायी पुनर्वास के लिए एक प्रतिष्ठित पशु आश्रय में भेजा गया है।
PETA इंडिया की आपातकालीन प्रतिक्रिया समन्वयक, दिव्या चव्हाण, कहती हैं- “मुर्गा लड़ाई अपने आप में एक क्रूर खेल और खतरनाक खेल है जो समाज में जुए और हिंसा को बढ़ावा देते हैं, मुर्गों को जबरन लड़वाना भारतीय कानूनों के तहत दंडनीय अपराध है। हम खैरथल-तिजारा पुलिस का, विशेष रूप से प्रशांत किरण, आईपीएस, पुलिस अधीक्षक, खैरथल-तिजारा, शिवराज सिंह, उप पुलिस अधीक्षक और टापूकड़ा पुलिस थाने का धन्यवाद करते हैं कि उन्होंने इस आयोजन के खिलाफ तत्काल कार्यवाही करके यह सख्त संदेश दिया है कि पशुओं के प्रति क्रूरता किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
मुर्गा लड़ाई में जबरन लड़ाए जाने वाले मुर्गों को फेफड़ों में छेद, हड्डियों के टूटने और आंखों में गंभीर चोट जैसी भयावह तकलीफ़ें झेलनी पड़ती हैं। उनकी टांगों पर अक्सर तेज़ धार वाले स्टील के ब्लेड बांध दिए जाते हैं, जो न सिर्फ़ मुर्गों को, बल्कि कई बार मुर्गा लड़ाई में शामिल व्यक्तियों और दर्शकों को भी घायल या मौत के घाट उतार चुके हैं। अवैध मुर्गा लड़ाई के कार्यक्रम जुए और शराब सेवन जैसी गतिविधियों से जुड़े होते हैं और समाज के लिए कई तरीकों से खतरा बन चुके हैं। इसके अलावा, ऐसे आयोजनों के लिए मुर्गों का परिवहन और देखभाल के दौरान उनके साथ किया जाने वाला दुर्व्यवहार, बर्ड फ्लू जैसी जानलेवा बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा पैदा करता है, जो जनस्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत पशुओं को लड़ाने के लिए उकसाना प्रतिबंधित है। वर्ष 2014 में एक ऐतिहासिक निर्णय में, भारत के माननीय सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं, PETA इंडिया और सरकारी सलाहकार संस्था भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, के पक्ष में फैसला सुनाया। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया कि बैलगाड़ी दौड़, कुत्तों की लड़ाई और किसी भी तरह के पशुओं के बीच दिखावटी लड़ाइयों को मनोरंजन के उद्देश्य से आयोजित करना अवैध है और इन्हें बंद किया जाना चाहिए।
PETA इंडिया, जो इस सिद्धांत के तहत काम करता है कि “पशु हमारे मनोरंजन के लिए नहीं हैं”, प्रजातिवाद (speciesism) का विरोध करता है, यह मनुष्य की स्वयं को सर्वोपरि मानने और अन्य प्रजातियों का शोषण करने वाली सोच है।
By- Anish Saxena


