





प्रिय अभिभावक एवं शिक्षकगण,
26 जून को संयुक्त राष्ट्रद्वारा *“अंतर्राष्ट्रीय नशा दुरुपयोग एवं अवैध तस्करी निरोधक दिवस”* मनाया जाता है। एक बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर, आज मैं आपसे बच्चों को नशे से बचाने पर बात करना चाहता हूँ।
क्यों ज़रूरी है बात?
भारत में नशे की शुरुआत की औसत उम्र घटकर 13-15 साल हो गई है। व्हेपिंग, तंबाकू, शराब, भांग, कफ सिरप और अब सिंथेटिक ड्रग्स – बच्चों तक पहुँच आसान हो गई है। नशा सिर्फ लीवर या फेफड़े नहीं, बढ़ते दिमाग को स्थायी नुकसान देता है। याददाश्त, एकाग्रता, पढ़ाई, व्यवहार – सब प्रभावित होते हैं।
शुरुआती चेतावनी संकेत
– अचानक चिड़चिड़ापन, गुस्सा या बहुत ज़्यादा शांत हो जाना
– नींद-अपेटाइट में बदलाव, आँखें लाल रहना, वजन घटना
– दोस्त बदलना, पैसे/सामान गायब होना, स्कूल से शिकायत
– पेन, बॉटल, पन्नी, जले हुए कागज़, अजीब मीठी/केमिकल गंध
अभिभावक क्या करें?
* बात करें, लेक्चर नहीं : 8-9 साल की उम्र से ही शरीर, दिमाग और नशे के नुकसान पर उम्र-अनुसार बात शुरू करें।
* ‘ना’ कहना सिखाएँ : पीयर प्रेशर सबसे बड़ा कारण है। रोल-प्ले से बच्चे को मना करना सिखाएँ – “नो थैंक्स, मुझे क्रिकेट खेलना है”।
* निगरानी + भरोसा : बच्चे के दोस्त, ऑनलाइन एक्टिविटी, जेब खर्च पर नज़र रखें, पर जासूसी नहीं। भरोसा टूटा तो बच्चा छुपाएगा।
* खुद उदाहरण बनें : घर में शराब-सिगरेट का खुला इस्तेमाल बच्चों को ‘नॉर्मल’ लगता है।
* व्यस्त रखें, जुड़े रहें : खेल, संगीत, आर्ट, फैमिली टाइम – खाली दिमाग नशे का घर है। रोज़ 15 मिनट बिना मोबाइल बच्चे की बात सुनें।
मदद कब लें?
अगर शक हो तो डाँटें नहीं। बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से मिलें। नशा बीमारी है, अपराध नहीं- सही काउंसलिंग और इलाज से 100% रिकवरी संभव है। भारत सरकार की 24×7 हेल्पलाइन : 14446 (टोल फ्री)।
हमारा संकल्प
आज के दिन हम सब प्रण लें – अपने घर, स्कूल, मोहल्ले को नशा-मुक्त बनाएँगे। क्योंकि नशा एक पल का मज़ा और पूरी उम्र की सज़ा है। बच्चे देश का भविष्य हैं। आइए, उन्हें सुरक्षित, स्वस्थ और नशा-मुक्त बचपन दें। -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य विशेषज्ञ






