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बीकानेर : चुनाव आते ही फिर पुराने राग, नहीं बदले तो बस हालात

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बीकानेर abhayindia.com नगर निगम चुनाव के लिए बिगुल बजने के साथ ही राजनीतिक दल फिर मैदान में उतरने की तैयारी में है। तलाश फिर उन मुद्दों की हो रही जिन्हें सीढ़ी बना सत्ता तक पहुंचा जा सके। भाजपा हो या कांग्रेस दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दल उन्हीं मामलों को फिर मुद्दा बनाए जाने की तैयारी है जिनका राग वे वर्ष 2014 के चुनाव में भी अलापते रहे।

अवैध निर्माण, अतिक्रमण, क्षतिग्रस्त सड़के, गदंगी, आवरा मवेशी जैसे वो मुद्दे ही फिर उठाने की तैयारी है। येे मुद्दें पांच वर्ष पूरा होने के बाद भी बसस्तूर कायम है और इनका समाधान नहीं होने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराना ही राजनीतिक दलों का कार्य हो गया है। सत्तापक्ष हो या प्रतिपक्ष दोनेां ही इस तरह के मामलों में गंभीर नहीं लगते। मतदाता अब मुद्दों का जिक्र नहीं उनका समाधान मांग रहे है जिनका राजनीतिक दल जवाब तलाश रहे है।

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सड़कों पर आवारा मवेशी

शहर की सड़कों पर आवरा मवेशियों की समस्या का समाधान नहीं होने से हर पल हादसे की आशंका बनी रहेती है। हाल ही नगर निगम ने शहर की सड़कों पर घूम रहे मवेशियों को गोशाला पहुंचाने का दावा किया था लेकिन फिर भी शहर के अधिकतर प्रमुख मार्गो पर मवेशी स्वच्छन्द विचरण करते नजर आते है।

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अतिक्रमण की भरमार

शहर में मुख्य मार्ग हो या अन्दरूनी गलियां हर तरफ अतिक्रमण की भरमार है। अतिक्रमण हटाने के नाम पर ठेलो व फुटपाथों तक कार्रवाई सीमित रखने से अतिक्रमियों के हौंसले बुलंद हो रहे है। लोगों ने फुटपाथ के नाम पर भी अतिक्रमण कर लिया है। अधिकतर फुटपाथ व्यवसाईयों के कब्जे में होने से राहगीरों को मुख्य सड़क पर ही चलना पड़ता है।

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अवैध निर्माण पर भी नहीं ध्यान

शहर में अवैध निर्माण भी हर चुनाव में मुद्दा बनता है ओर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते है लेकिन समस्या का समाधान नहीं होता। गंभीरी नदी के डूब क्षेत्र में बिना अनुमति निर्माण हो चुके है तो कई कॉम्पलेक्स में बेसमेंट में पार्किंग की जगह व्यवसाय फलफूल रहा है।

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शहर मे फैली गदंगी

गदंगी मुक्त शहर के लिए नारे तो खूब दिए जाते है लेकिन सफाई व्यवस्था अब भी बदहाल है। शहर में मुख्य मार्गो पर भी गदंगी फैली नजर आती है। ऑटो टिपर व्यवस्था होने के बावजूद सड़कों पर गदंगी के ढेर मिलने से शहर की छवि भी प्रभावित हो रही है।

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सड़कों की बार-बार बिगड़ जाती सूरत
चुनाव में सड़कों की दशा भी मुद्दा बनता आया है। हर वर्ष मानसून के बाद सड़कों की दशा सुधारी जाती है और बेहतर गुणवत्ता होने का दावा भी किया जाता है। गुणवत्ता के इन दावों की कलाई मानसून की मूसलाधार बारिश होते ही खुल जाती है। इसके बाद मानसून की विदाई नहीं होने तक लोगों को गड्ढो में समाई सड़कों पर चलने को मजबूर होना पड़ता है।
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