





18 जून को विश्व भर में ऑटिस्टिक प्राइड डे मनाया जाता है। यह दिन ऑटिज़्म को ‘बीमारी’ या ‘कमी’ के चश्मे से नहीं, बल्कि न्यूरोडाइवर्सिटी यानी मस्तिष्क की विविधता के उत्सव के रूप में देखता है। एक बाल रोग विशेषज्ञ होने के नाते, मैं हर रोज़ उन अभिभावकों से मिलता हूँ जो अपने बच्चे के ‘अलग’ होने पर चिंतित, भ्रमित और कभी-कभी अपराधबोध से भरे होते हैं। आज मैं उनसे और समाज से यही कहना चाहता हूँ : ऑटिज़्म कोई दीवार नहीं, एक अलग तरह का दरवाज़ा है।
1. ऑटिज़्म क्या है, और क्या नहीं?
ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है। इसका अर्थ है कि बच्चा दुनिया को महसूस, समझ और प्रतिक्रिया देने का अपना एक अलग तरीका रखता है। ये बच्चे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाते, या भीड़-भाड़ में परेशान हो जाते हैं, या किसी एक विषय – जैसे ट्रेन, डायनासोर, या नंबर में असाधारण रुचि दिखाते हैं। पर ये ‘कमी’ नहीं है। ये ‘भिन्नता’ है। हम सबकी फिंगरप्रिंट अलग होती है, तो सोचने का तरीका क्यों एक जैसा हो?
2. ‘प्राइड’ शब्द क्यों ज़रूरी है?
सालों तक हमने ऑटिस्टिक बच्चों को ‘सामान्य बनाने’ की कोशिश की। स्पीच थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी ये सब ज़रूरी हैं, पर इनका लक्ष्य बच्चे को ‘ठीक करना’ नहीं, बल्कि उसे अपनी ताकत पहचानने में मदद करना होना चाहिए। ‘ऑटिस्टिक प्राइड’ का अर्थ है – बच्चे से ये न कहना कि “तुम दूसरों जैसे कब बनोगे?” बल्कि ये कहना कि “तुम जैसे हो, वैसे ही पूर्ण हो। आओ, देखें तुम्हारी दुनिया कैसी है।”
3. एक बाल रोग विशेषज्ञ की अपील : स्वीकृति से स्वायत्तता तक
इस साल की थीम ‘Acceptance and Autonomy’ है – स्वीकृति और स्वायत्तता।
स्वीकृति का मतलब : क्लास में टीचर का ये समझना कि बच्चा शरारत नहीं कर रहा, उसे तेज़ आवाज़ से तकलीफ हो रही है। पड़ोसी का ये समझना कि बच्चा ‘बदतमीज़’ नहीं है, वो सिर्फ़ अपनी भावना शब्दों में नहीं कह पा रहा।
स्वायत्तता का मतलब : 16 साल के ऑटिस्टिक किशोर से पूछना कि “तुम्हें क्या पढ़ना है?” न कि उसके लिए पहले से तय कर देना। उसे छोटे-छोटे फैसले लेने देना आज कौन सी शर्ट पहननी है, लंच में क्या खाना है। क्योंकि आत्मनिर्णय का अधिकार हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है।
4. अभिभावकों के लिए 3 बातें जो मैं क्लिनिक में रोज़ कहता हूँ
1. तुलना बंद करें : शर्मा जी का बेटा 2 साल में कविता बोलता है, आपका नहीं बोलता — तो क्या? आपका बच्चा शायद 5 साल में रोबोट बना देगा। हर फूल अपने मौसम में खिलता है।
2. ‘लेबल’ से डरें नहीं : ऑटिज़्म का डायग्नोसिस ‘ठप्पा’ नहीं, ‘चाबी’ है। इससे आपको समझ आता है कि बच्चे को किस तरह की मदद चाहिए। जल्दी पहचान = जल्दी हस्तक्षेप = बेहतर परिणाम।
3. खुद को दोष न दें : टीका, फ्रिज-मदर, या मोबाइल – ऑटिज़्म इनसे नहीं होता। विज्ञान ये साफ़ कर चुका है। अपराधबोध छोड़िए, ऊर्जा को बच्चे के विकास में लगाइए।
5. समाज से एक विनती
अगली बार जब किसी पार्क में कोई बच्चा कतार में न लगे, या अजीब आवाज़ें निकाले, तो उसे घूरें नहीं। हो सकता है वो ऑटिस्टिक हो। उसे ‘बिगड़ा हुआ’ कहने की जगह, उसकी माँ को एक मुस्कान दे दीजिए। यकीन मानिए, उस एक मुस्कान से उसका पूरा हफ्ता आसान हो जाएगा। स्कूलों को ‘इन्क्लूसिव’ बनाइए। ऑफिस में न्यूरोडाइवर्स लोगों के लिए जगह बनाइए। क्योंकि टेस्ला, न्यूटन, मोज़ार्ट – कई जीनियस में ऑटिस्टिक लक्षण थे। कौन जाने, आपके बगल वाला ‘चुपचाप’ बच्चा कल दुनिया बदल दे।
अंत में...
एक डॉक्टर के तौर पर मेरा काम बीमारी ठीक करना है। पर ऑटिज़्म बीमारी नहीं है। मेरा काम है अभिभावकों का डर ठीक करना, और समाज की नज़र ठीक करना। ऑटिस्टिक प्राइड डे हमें याद दिलाता है कि इंद्रधनुष सिर्फ सात रंगों से नहीं बनता। कुछ रंग हमें दिखते नहीं, पर वो होते ज़रूर हैं। आइए, इस विविधता का उत्सव मनाएँ। क्योंकि हर बच्चा ‘नॉर्मल’ हो, ये ज़रूरी नहीं। हर बच्चा खुश हो, ये ज़रूरी है। सभी ऑटिस्टिक बच्चों, किशोरों, वयस्कों और उनके परिवारों को ऑटिस्टिक प्राइड डे की हार्दिक शुभकामनाएँ। आप अकेले नहीं हैं। हम साथ हैं_💙 -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल रोग विशेषज्ञ, बीकानेर








