Friday, May 15, 2026
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मेरी दो कविताएं …. प्रभा प्रकास कोचर

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(1)

खुद को खोकर
खुद को ढूंढ़ती
खुद को पाना पाती
खुद के ही भीतर
खुद से ही बेजार हो जाती
गहराई में खींचती
लहरों को परे धकेलती
खुद को पाना कितना मुसकिल
खुद पर कितनी परत चढ़ाई
खुद के लिए ही
कोन परत उधाड़ू मैं
खुद में ही पालु
खुद को मैं।

(2)

ये जीवन संध्या है
कब ढल जाये
पता नहीं
कुछ ना जाना तेरे साथ
सब यही रह जाना है
देजा कुछ मीठी यादें, मीठी बातें
और कुछ मीठे प्यार भरे
स्पर्शो का अहसास
ये जीवन संध्या है
कब ……..
देख भगत सिंह
अपने कर्मो से जाना जाता है
न उस के पूत था न सूद
कर कुछ काम ऐसा
दुनिया तेरे को तेरे नाम
से ही जानेगी
ये जीवन …।

-प्रभा प्रकास कोचर, स्टेशन रोड, झुंझुनूं
(मूल निवासी-बीकानेर)

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