मोतीलाल वोरा से जानिये अटलजी से जुड़े ये दिलचस्प किस्से…

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से समूचा देश शोकमग्न है। अटलजी के साथ वक्त गुजारने वालों से उनके बारे में दिलचस्प किस्से भी सुनने को मिल रहे हैं। इस बीच पूर्व राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री रहे तथा वर्तमान में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा की कलम से जानते हैं कैसे थे अटलजी?

[मोतीलाल वोरा]। अटल बिहारी वाजपेयी का जाना एक युग की समाप्ति जैसा है। वह जीवन पर्यंत ऐसे अजातशत्रु रहे जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचते थे। चूंकि वह ग्वालियर के रहने वाले थे इसलिए मेरी अक्सर ही उनसे मुलाकात हो जाती थी। हमारी बातचीत राजनीति ही नहीं, सामाजिक चिंतन पर भी होती थी। उनके नजरिये में कभी दलीय सीमा आड़े नहीं आती थी। जब मैं उत्तर प्रदेश का राज्यपाल था और वह लखनऊ के सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता थे तो एक शनिवार लखनऊ पहुंच कर उन्होंने मुझे फोन किया और कहा, वोरा जी, मैं आपसे मिलना चाहता हूं। मैने कहा, जब आपकी इच्छा हो, आइए। इसके बाद मैंने सुझाव दिया कि यदि कल सुबह साढ़े आठ बजे आ जाएं तो हम साथ नाश्ता भी कर लेंगे और बातचीत भी इत्मीनान से हो जाएगी।

अगले दिन वह राजभवन आए और कहने लगे, वोरा जी, मेरी यहां कोई नहीं सुनता। सांसद निधि से मैंने काफी पैसा दिया है और उसे कहां कैसे खर्च किया गया, इसकी कोई जानकारी नहीं देता। मैंने उनसे कहा, आगे से आपको कोई शिकायत नहीं होगी। आप सीधे मेरे संपर्क में रहें। इसके बाद अटलजी ने बताया कि लखनऊ का एक गांव है इंटौजा। वहां की सड़क बहुत खराब हैै। इस सड़क को बनवाने की मेरी मांग मुख्यमंत्रियों से लेकर अन्य सबने सुनी तो, परंतु आज तक वह सड़क बन नहीं पाई। मैं चाहता हूं कि राष्ट्रपति शासन में तो यह सड़क बन ही जाए। इससे मेरे क्षेत्र का एक बड़ा काम हो जाएगा।

बातों ही बातों में उन्होंने यह किस्सा भी सुनाया कि एक नौजवान की नई-नई शादी हुई थी और वह स्कूटर से अपनी पत्नी के साथ जा रहा था। चूंकि सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे थे इसलिए वह बार-बार मुड़कर पीछे देखता कि कहीं वह गिर तो नहीं गई? एक गड्ढे को पार करते वक्त उसकी पत्नी सचमुच गिर गई। यह किस्सा सुनाकर उन्होंने कहा, वोरा जी इतना बुरा हाल है इंटौजा की सड़क का। मैंने एक हफ्ते के अंदर सड़क निर्माण सामग्री वहां पहुंचाने का आदेश जारी किया और उनसे कहा, अगले सप्ताहांत इस सड़क निर्माण का भूमिपूजन आपके साथ चलकर मैं खुद करूंगा। एक हफ्ते बाद अटलजी लखनऊ आए और हम एक साथ कार में राजनीतिक चर्चा करते हुए वहां पहुंचे तो वाकई सड़क पर एक बड़ा गढ्ढा देख स्कूटर वाले नौजवान का किस्सा याद आ गया।

सड़क निर्माण का शुभारंभ करने के दौरान गांव में एक सभा रखी गई। अटलजी ने कहा कि इस गांव में बड़े लंबे समय से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और एक हायर सेकेंडरी स्कूल की मांग हो रही है। अगर यह हो जाए तो बड़ी बात होगी। मैंने कहा, यह आपके लिए बहुत छोटा काम है। गांव में इन दोनों का निर्माण अवश्य होगा। मैैंने इसका ऐलान उनकी ही मौजूदगी में किया। गांव में जहां सभा होनी थी वहां भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के करीब चार हजार लोग मौजूद रहे होंगे। दोनों दलों के स्थानीय नेताओं के भाषण हो रहे थे और वे सब वाजपेयी जी से कह रहे थे कि राष्ट्रपति शासन अभी कुछ समय और रहना चाहिए, क्योंकि राजभवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो लोगों की बात सुन रहा है।

इसके बाद वाजपेयी जी का भाषण शुरू हुआ और उन्होंने कहा कि मैं वोरा जी को वर्षों से जानता हूं और इस बात से सहमत हूं कि राजभवन में वह अपना काम बखूबी कर रहे हैं, लेकिन मेरी मान्यता है कि राष्ट्रपति शासन की जगह प्रदेश में चुनी हुई सरकार होनी चाहिए। उनकी यह बात यही जाहिर कर रही थी कि राजनीतिक मूल्यों और लोकतंत्र में उनकी कितनी गहरी आस्था थी।

कार्यक्रम के बाद जब हम एक साथ ही लौट रहे थे तो चिनहट में रुके। वहां उन्होंने कहा, वोरा जी लखनऊ में वाटर वक्र्स बहुत पुराना हो चुका है। लखनऊ की जरूरत को देखते हुए यह अपर्याप्त है। मेरा सुझाव है कि चिनहट में वाटर वक्र्स शुरू किया जाए तो यहां के लोगों की पीने के पानी की कठिनाई दूर हो जाएगी। मैंने कहा, आपका यह काम भी हो जाएगा। मैैंने लखनऊ आकर वाटर वक्र्स के लिए किसानों की जमीन अधिग्रहण के खर्च का आकलन कराया तो 98 लाख रुपये की लागत आंकी गई। हमने भूमि अधिग्रहण की राशि जारी कर इसकी प्रक्रिया शुरू करा दी, लेकिन भूमि पूजन से पहले राष्ट्रपति शासन खत्म हो गया और मैं वापस भोपाल लौट आया। कुछ अर्से बाद जब मैं एक कार्यक्रम में लखनऊ आया तब तक वहां भाजपा सरकार में आ चुकी थी। मैंने संबंधित मंत्री से चिनहट के वाटर वक्र्स का काम पूरा होने के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि इसके लिए पैसा कहां है?

इतनी बड़ी राजनीतिक शख्सियत होने के बाद भी मैंने अटल जी को अपने निर्वाचन क्षेत्र-लखनऊ की समस्याओं को लेकर हमेशा व्यग्र देखा। लखनऊ में जब निशातगंज का पुल बनकर तैयार हो गया तो मैंने अटलजी से अनुरोध किया कि इसका उद्घाटन मैं करूंगा और आप विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहेंगे। उन्होंने हामी भर दी और उद्घाटन की तारीख भी तय हो गई। इसी बीच नगर निगम चुनावों की घोषणा हो गई। अटलजी ने मुझे फोन किया कि चुनाव की घोषणा होने के बाद पुल का उद्घाटन करना ठीक नहीं होगा। इससे अच्छा संदेश नहीं जाएगा। मैंने भी उनसे सहमति जताते हुए कार्यक्रम स्थगित कर दिया। यह वाकया जाहिर करता है कि राजनीति में नैतिक मूल्यों को लेकर उनकी निष्ठा कितनी गहरी थी।

मुझे याद है कि अटलजी ने तब यह भी कहा था कि पुल तो बहुत आधुनिक बना है, परंतु पुल के नीचे जो दुकानदार हैं उनका भी ख्याल रखना जरूरी है ताकि उनकी रोजी-रोटी में कोई दिक्कत न आए। मैंने वैसा ही किया जैसा अटलजी चाहते थे।

हमारे निजी संबंधों में दलगत राजनीति कभी आड़े नहीं आई। 1998 में चुनाव जीतकर जब मैं लोकसभा पहुंचा तब अटलजी प्रधानमंत्री बन चुके थे और अक्सर संसद में हमारी भेंट हो जाती थी। वह हमेशा बड़े प्रेम से मिलते और हाल-चाल पूछते। प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी निजी रिश्तों की गर्माहट और आत्मीयता को उन्होंने कभी कम नहीं होने दिया। [लेखक कांग्रेस के कोषाध्यक्ष हैैं और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री एवं उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रह चुके हैं]

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