आज डिजिटल युग में यदि हम कुछ साल पीछे लौट कर देखें तो पुस्तकें केवल जानकारी का माध्यम ही नहीं, बल्कि वे सोचने, समझने और कल्पना करने की क्षमता को विकसित करने का साधन भी थीं। घरों में कभी किताबों की अलमारियां ज्ञान, कल्पना और अनुभवों का खजाना हुआ करती थीं। बच्चों के हाथों में कहानी की किताबें, युवाओं के पास उपन्यास और पत्रिकाएं तथा बुजुर्गों के पास साहित्यिक रचनाएं दिखाई देती थीं। लेकिन, इस डिजिटल क्रांति ने हमारे जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और देखा जाये तो पढ़ने की आदत भी इससे अछूती नहीं रही है। आज किताबों के स्थान पर मोबाइल फोन, टैबलेट और कंप्यूटर स्क्रीन ने तेजी से अपनी जगह बना ली है। आज हम हर महीने तीन सौ की किताब नहीं खरीदेंगे, क्यूंकि हम कहेंगे की इतनी महंगी किताब खरीदने की हमारी क्षमता नहीं है। यहाँ तक की हम एक साल में भी एक किताब खरीदना अपनी क्षमता के पार की बात मानेंगे। फिर चाहे हमें हर महीने तीन सौ का रीचार्ज करना हमारी प्राथमिकता ही क्यों न बन गई हो। हमारे पास कई तर्क हैं यह करने के कि जैसे कहीं हम पिछड़ न जाएँ कि आखिर दुनिया में चल क्या रहा है। यह परिवर्तन स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान तक पहुंच को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। कुछ सेकंड में ही दुनिया के किसी भी विषय से संबंधित जानकारी हमारे सामने उपलब्ध हो जाती है। ई-बुक, ऑडियो बुक और ऑनलाइन पुस्तकालयों ने पढ़ने के नए रास्ते खोले हैं। लेकिन, इस सुविधा के साथ एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा हुआ है कि क्या डिजिटल युग में हमारी पढ़ने की गहराई और गुणवत्ता कम हो रही है?
स्क्रीन का बढ़ता प्रभाव और बदलती पढ़ने की आदत
आज की युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा अपना अधिकतर समय स्क्रीन पर बिताता है। मोबाइल फोन मनोरंजन, शिक्षा, संवाद और सूचना का प्रमुख माध्यम बन चुका है। बच्चों की पढ़ाई भी धीरे-धीरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ही निर्भर होती जा रही है। ईमानदारी से आंकलन करें तो ऑनलाइन कक्षाएं, शैक्षणिक ऐप और डिजिटल सामग्री ने शिक्षा को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ ही लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत भी बढ़ी है। पहले बच्चे खाली समय में कहानी की किताबें पढ़ते थे, जिससे उनकी कल्पनाशक्ति और भाषा कौशल विकसित होते थे। अब वही समय वीडियो देखने, सोशल मीडिया चलाने या छोटे-छोटे डिजिटल कंटेंट को देखने में व्यतीत हो रहा है। हमें स्वीकारना होगा कि इंटरनेट पर उपलब्ध त्वरित जानकारी ने धैर्यपूर्वक पढ़ने की आदत को प्रभावित किया है। आज बहुत से विद्यार्थी किसी विषय को गहराई से समझने के बजाय केवल संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करने के आदी हो रहे हैं। वे लंबे लेखों या पुस्तकों को पढ़ने की बजाय छोटे सारांश, वीडियो या त्वरित नोट्स को प्राथमिकता देते हैं। इससे जानकारी तो मिलती है, लेकिन विश्लेषण करने और गहराई से सोचने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित हो सकती है।
डीप रीडिंग की कमी : एक गंभीर चिंता
पढ़ना केवल शब्दों को देखना नहीं है, बल्कि विचारों को समझना, उनका विश्लेषण करना और उनसे जुड़ना भी है। जब कोई व्यक्ति किसी पुस्तक को ध्यानपूर्वक पढ़ता है, तो वह लेखक के विचारों, भावनाओं और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करता है।साथ ही अपना परिपेक्ष्य भी विकसित करता है और इसे ही डीप रीडिंग कहा जा सकता है। लेकिन, डिजिटल युग में लगातार बदलती सूचनाओं और तेज गति वाले कंटेंट ने गहन अध्ययन की आदत को तो चुनौती दी ही है। साथ ही मोबाइल स्क्रीन पर पढ़ते समय व्यक्ति बार-बार नोटिफिकेशन, संदेश और अन्य सूचनाओं से विचलित हो जाता है। परिणामस्वरूप ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कुछ कम हो सकती है। विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में यह समस्या अधिक दिखाई देती है। परीक्षा की तैयारी हो या किसी विषय की समझ, केवल त्वरित जानकारी पर्याप्त नहीं होती। किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए धैर्य, एकाग्रता, गहन अध्ययन और स्वमूल्यांकन भी अत्यंत आवश्यक है। महान वैज्ञानिकों, लेखकों और विचारकों की सफलता के पीछे लंबे समय तक पढ़ने और चिंतन करने की आदत रही है।
ई-बुक और ऑडियो बुक : पढ़ने के नए विकल्प
चलिये देखते हैं कि डिजिटल युग को केवल चुनौती के रूप में देखना बिलकुल उचित नहीं होगा। तकनीक ने पढ़ने के नए अवसर भी तो प्रदान किए हैं। ई-बुक ने पुस्तकों को अधिक सुलभ बना दिया है। अब हजारों पुस्तकें एक छोटे से उपकरण में संग्रहित की जा सकती हैं। विद्यार्थी, शोधकर्ता और पाठक कहीं भी और कभी भी अपनी पसंद की पुस्तक पढ़ सकते हैं। और इसी प्रकार ऑडियो बुक का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। व्यस्त जीवनशैली में जब लोगों के पास बैठकर पढ़ने का समय कम होता है, तब वे यात्रा करते समय या अन्य कार्यों के दौरान ऑडियो बुक सुन सकते हैं। यह उन लोगों के लिए भी उपयोगी है जिन्हें पढ़ने में कठिनाई होती है। डिजिटल माध्यमों ने साहित्य को नए पाठकों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज अनेक भाषाओं की पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध हैं। युवा लेखक भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपनी रचनाओं को पाठकों तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए आवश्यकता डिजिटल माध्यमों को नकारने की नहीं, बल्कि उनके संतुलित उपयोग करने की है।
पढ़ने की संस्कृति बचाने की आवश्यकता
यदि हम अंकलन करें तो किसी भी समाज की बौद्धिक समृद्धि उसकी पढ़ने की संस्कृति से जुड़ी होती है। पुस्तकें केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम भी हैं। वे हमें नए विचारों से परिचित कराती हैं, हमारी कल्पना को विस्तार देती हैं और हमें बेहतर निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करती हैं। आज आवश्यकता है कि परिवार और शिक्षण संस्थान बच्चों में पढ़ने की आदत को फिर से मजबूत करें। घर में पुस्तकों का वातावरण बनाया जाना उचित है। माता-पिता यदि स्वयं पढ़ने की आदत विकसित करेंगे तो बच्चे भी उससे प्रेरित होंगे। बच्चों को केवल पाठ्य पुस्तकों तक सीमित न रखकर कहानी, जीवनी, विज्ञान, इतिहास और साहित्य की पुस्तकों से जोड़ना चाहिए। विद्यालयों में पुस्तकालयों को सक्रिय बनाना भी अतिआवश्यक है। केवल किताबों से भरी अलमारियां पर्याप्त नहीं हैं; छात्रों को नियमित रूप से पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। इसके लिए पुस्तक चर्चा, लेखन प्रतियोगिता, रीडिंग कॉम्पटिशन समय सीमा के अंतर्गत करना इत्यादि और यही साहित्यिक गतिविधियां शायद बच्चों में पढ़ने के प्रति रुझान विकसित कर सकती हैं।
संतुलन ही समाधान है...
देखा जाये तो डिजिटल और पारंपरिक पढ़ने के बीच संघर्ष की कोई आवश्यकता नहीं है। दोनों के अपने-अपने लाभ हैं। जहां मुद्रित पुस्तकें गहन अध्ययन और एकाग्रता में सहायता करती हैं, वहीं डिजिटल माध्यम सुविधा और व्यापक पहुंच हमें प्रदान करते हैं। हमें यह समझना होगा कि समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग में है। यदि बच्चे और युवा डिजिटल संसाधनों का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए करते हैं और साथ ही नियमित रूप से पुस्तकों का अध्ययन भी करते हैं, तो यह संतुलन उनके विकास के लिए लाभदायक होगा। आज के समय में जरूरत है कि हम स्क्रीन के युग में पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को नए रूप में विकसित करें। पुस्तकें हमारे विचारों की गहराई बढ़ाती हैं, जबकि तकनीक हमारी पहुंच को तेजी से विस्तार देती है। दोनों का संतुलित मेल ही भावी पढ़ने वाली पीढ़ी तैयार कर सकता है। अंततः यही कहना चाहूंगी कि स्क्रीन बदल सकती है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी। पुस्तकें मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं और रहंगी उनकी प्रासंगिकता साबित करने कि लिए ऐसे लेखों कि जरूरत नहीं पड़ेगी। उन्हें जीवित रखना केवल शिक्षकों या पुस्तक प्रेमियों की ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। -डॉ. अंशु राज पुरोहित, असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेज़ी), शिक्षाविद्, शोधकर्ता और लेखिका हैं। आपकी रुचि शिक्षा, समाज, साहित्य, संप्रेषण कौशल और व्यक्तित्व विकास (Personality development) पर विश्लेषणात्मक लेखन में है।













