








कुछ कपल्स को पेरेंट बनने का सुख बड़ी आसानी से मिल जाता है लेकिन कुछ कपल को नैचुरली कंसीव करने में दिक्कत आती है। कई मामलों में बार-बार गर्भपात जैसी समस्याएं आती है। अगर हमारे आसपास कोई दम्पति इस तरह की परिस्थिति से जूझ रहे हैं, तो उन्हें एक बार अपने घर के वास्तु पर ध्यान देना चाहिए। हो सकता है कोई वास्तु दोष उनके संतान सुख में बाधा डाल रहे हो।
गर्भाधान संस्कार वैदिक परंपरा के सोलह संस्कारों में प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य केवल संतानोत्पत्ति नहीं, बल्कि उत्तम, गुणवान और संस्कारी संतानों की प्राप्ति है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि संतान केवल माता-पिता का जैविक विस्तार नहीं, बल्कि उनके विचारों, संस्कारों और भावनाओं का प्रतिबिंब होती है। इसी कारण गर्भाधान संस्कार को जीवन की शुद्ध और पवित्र शुरुआत माना गया है। परंतु आज के समय में यह गर्भाधान संस्कार सफल ही नहीं हो पा रहा है। देखते ही देखते यह समाज के सामने एक बहुत बड़ी समस्या बन गई है। इसको सफल करने के लिए बड़े शहरों में जाकर इलाज करवाना पड़ता है, चिकित्सकों के हद से ज़्यादा चक्कर काटने पड़ते है और लाखों रुपये का खर्चा उठाना पड़ता हैं जो कि एक आम इंसान के लिए तो बहुत ही मुश्किल है। ऐसे में यदि हम वास्तु शास्त्र का सहारा ले तो हमें कुछ हद तक लाभ मिल सकता हैं। मैं निजी अनुभवों के आधार पर कुछ केस स्टडीज शेयर कर रहा हूँ जिससे आम जन फ़ायदा ले सकते हैं।
केस स्टडी-1
मैंने आलोक के उत्तर मुखी घर का अवलोकन किया। उस घर में वास्तु से संबंधित यह दोष था कि उस घर का वायव्य कोण कटा हुआ था। उस घर में एक महिला के बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ, एक महिला के बच्चा होने के बाद उसकी मृत्यु हो गई, एक महिला के करीब दो मिस्केरेज हो चुके हैं।
केस स्टडी-2
मैंने संजीव कुमार का पूर्व मुखी घर देखा। उनके घर में आग्नेय कोण के नीचे अंडरग्राउंड था तथा जल कुंड भी अनुचित स्थान पर था। वहाँ मुखिया का कमरा भी सही जगह पर नहीं था। इस घर में तो दम्पति को बहुत परेशान होना पड़ा। उनके 2-3 मिसकैरेज हुए।
केस स्टडी-3
मैंने प्रकाश के घर का अवलोकन किया जो पश्चिम मुखी था। उन्होंने अपने घर में मास्टर बेड अटैच लेट-बाथ इस तरह बनवाया हुआ है कि वह एकदम अशुभ है। जिससे कि उनके वित्तीय समस्या तो है ही साथ ही उनके वंशवृद्धि भी नहीं हो रही हैं।
केस स्टडी-4
मैंने महादेव के पूर्व मुखी घर का अवलोकन किया वहाँ जल कुंड सीढ़ियों के नीचे था तथा रसोई अनुचित स्थान पर थी। वहाँ पर तो महिलाओं को बहुत कष्ट उठाना पड़ा, वहाँ उनकी पुत्रवधू के २-३ मिसकैरेज हो चुके हैं।
आज के समय में गर्भाधान संस्कार की आवश्यकता केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है। यह संस्कार हमें याद दिलाता है कि संतानोत्पत्ति केवल जैविक घटना नहीं, बल्कि आने वाले समाज और राष्ट्र का निर्माण है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान epigenetics के माध्यम से यह सिद्ध करता है कि माता-पिता की जीवनशैली, आहार, भावनाएँ और विचार गर्भस्थ शिशु के जीन की सक्रियता और उसके भविष्य को प्रभावित करते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो गर्भाधान संस्कार का वैज्ञानिक पक्ष भी उतना ही मजबूत है जितना धार्मिक। यदि माता-पिता शुद्ध संकल्प, सात्त्विक आचरण और धार्मिक भाव से गर्भाधान करेंगे, तो निश्चय ही भविष्य की पीढ़ियाँ संस्कारी, गुणवान और राष्ट्रनिर्माण में सहायक सिद्ध होंगी। -सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431


