आज विश्व अंगदान दिवस है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य सिर्फ जागरूकता फैलाना नहीं है, बल्कि लोगों को दूसरों की जान बचाने के लिए प्रेरित करना है। एक बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर मैंने बहुत करीब से देखा है कि जब एक बच्चे का अंग फेल हो जाता है तो पूरे परिवार पर क्या बीतती है। डायलिसिस पर लगा बच्चा, वेंटिलेटर पर संघर्ष करता नवजात, या लिवर ट्रांसप्लांट का इंतजार करता 8 साल का मासूम। उनके लिए अंगदान किसी चमत्कार से कम नहीं होता।
अंगदान क्यों जरूरी है?
भारत में हर साल हजारों बच्चे और बड़े अंगों की कमी के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। एक व्यक्ति के अंगदान से 8 लोगों की जान बचाई जा सकती है और 50 से ज्यादा लोगों को नई दृष्टि मिल सकती है। दिल, किडनी, लिवर, फेफड़े, आंत – एक दान, कई जीवन।
ये 3 जरूरी बातें जो हर अभिभावक को पता होनी चाहिए...
1. अंगदान उम्र नहीं देखता
नवजात से लेकर बुजुर्ग तक कोई भी अंगदाता बन सकता है। ब्रेन डेड होने की स्थिति में भी अंगदान संभव है। बच्चों के माता-पिता अपने बच्चे की सहमति से भी अंगदान का संकल्प ले सकते हैं।
2. जीवित रहते हुए भी दान संभव है
एक किडनी के साथ स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है। लिवर का एक हिस्सा भी दान किया जा सकता है। कई माता-पिता अपने बच्चों को नई जिंदगी देने के लिए आगे आते हैं।
3. मिथक तोड़ना जरूरी है
“शरीर अधूरा रह जाएगा”, “अंग बिक जाएंगे”, “अस्पताल ठीक से इलाज नहीं करेंगे” – ये सभी भ्रांतियां हैं। अंगदान पूरी तरह कानूनी, सुरक्षित और सम्मानजनक प्रक्रिया है। इसे NOTTO और SOTTO जैसी सरकारी संस्थाएं नियंत्रित करती हैं।
हम क्या कर सकते हैं?
1. अंगदान का संकल्प पत्र भरें और परिवार को इस बारे में बताएं।
2. बच्चों को बचपन से ही “दूसरों की मदद” का संस्कार दें।
3. सोशल मीडिया पर अंगदान के बारे में सही जानकारी साझा करें।
डॉक्टर के तौर पर मेरी अपील
मैंने देखा है कि एक अंग प्रत्यारोपण के बाद बच्चा फिर से स्कूल जाता है, दौड़ता है, हंसता है। उस एक “हां” से किसी मां की गोद नहीं उजड़ती, किसी पिता का सहारा नहीं टूटता। इस विश्व अंगदान दिवस* पर हम सब संकल्प लें- “जीवन रहते हुए दूसरों की मदद करें, और जाने के बाद भी जीवन देते जाएं।” क्योंकि असली विरासत पैसा नहीं, किसी को दिया गया जीवन है। -डॉ. श्याम अग्रवाल, नवजात, शिशु एवं किशोर रोग विशेषज्ञ, बीकानेर













