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ईशान से नैऋत्य तक पांच वास्तु गलतियां जो कर देती हैं जीवन तबाह

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भारतीय संस्कृति में वास्तु शास्त्र का स्थान किसी मंदिर से कम नहीं। यह सिर्फ ईंट-पत्थर से मकान बनाने का विज्ञान नहीं, बल्कि पंचतत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – के साथ सामंजस्य बिठाकर जीवन को सुखी बनाने का प्राचीन मार्ग है। आज तकनीक ने हमारी जिंदगी बदल दी है। नई-नई चीजें हर रोज बाजार में आ रही हैं। पर इनकी कीमत हम क्या चुका रहे हैं? तनाव, डिप्रेशन, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़, हृदय रोग। मशीनें काम कर रही हैं, फिर भी हमारे पास अपने परिवार के साथ बैठकर दो पल हंसने का समय नहीं। समस्या कहाँ है? घर और दफ्तर में हम प्रकृति के नियमों के खिलाफ जा रहे हैं। समाधान एक ही है – आधुनिक सुविधाओं और वास्तु के प्राचीन नियमों का समझदारी से तालमेल।

वास्तु का मतलब सिर्फ महंगे रंग-पेंट, नए पर्दे-कालीन या फर्नीचर इधर-उधर करना नहीं है। इसका असली मकसद है घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखना। जब घर में वास्तु दोष होता है तो नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। नतीजा? मानसिक तनाव, बीमारियां, पैसों की तंगी और घर में रोज कलह। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 सबसे बड़े वास्तु दोष जो आज हर दूसरे घर में मिल जाते हैं, और जिनसे आपका जीवन सबसे ज्यादा प्रभावित होता है।

1. शौचालय का ग़लत स्थान पर होना 

शौचालय यदि उत्तर-पूर्व या ईशान कोण में बने हों, तो यह गंभीर वास्तु दोष है। ईशान कोण भगवान की आराधना का स्थान है और इसके स्वामी ग्रह बृहस्पति हैं। यह क्षेत्र तालाब, फव्वारे अथवा खुले लॉन हेतु सर्वोत्तम स्थान है। भूखंड के ईशान्य में शुद्धतम जल उपलब्ध रहता है। यह जल स्त्रोत: जैसे नलकूप, कुआँ, भूमिगत जल टंकी अथवा पेयजल हेतु सबसे अच्छी जगह है। भगवान की दैनिक पूजा-अभ्यर्थना हेतु भी ईशान सर्वोत्तम है। यह ध्यान, योग, धार्मिक ग्रंथों के पारायण, आध्यात्मिक ज्ञान के आदान-प्रदान और परमात्मा से अद्वैतता को लक्षित कर किए गए अन्य क्रिया-कलाप हेतु भी सबसे उपयुक्त स्थान है। ईशान स्वागत-कक्ष और अतिथियों के स्वागत हेतु भी आदर्श स्थान है। अतः इस स्थान पर शौचालय होना तो अपने भाग्य पर कुल्हाड़ी चलाना है। इस कोण पर तो भारी भरकम निर्माण भी करवाना नहीं चाहिए।इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ और मानसिक अशांति उत्पन्न होती है। शौचालय का स्थान पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

केस स्टडी : मैंने वरुण जी (परिवर्तित नाम) के घर का वास्तु अवलोकन किया। उनका घर उत्तर मुखी था और बहुत ही अच्छा बना हुआ था। उनके घर में कोई भी कार्य हो वह बिना लड़ाई के पूरा ही नहीं होता था। उनका एक बेटा तो चालीस वर्ष का हो गया लेकिन अभी भी उसे अपने कैरियर के लिए संघर्ष ही करना पड़ रहा है।

2. घर का कोई कोना कटना या बढ़ना

यदि घर का उत्तर-पूर्व कोना कटा हुआ हो, तो यह सबसे बड़ा वास्तु दोष माना जाता है। इससे जीवन में अवसरों की कमी और आर्थिक कठिनाइयाँ आती हैं। ईशान में कटाव का अर्थ है- वास्तु पुरुष का सिर कटा होना। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को चेहरा छिपाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इससे भाइयों के बीच झगड़ा और संवादहीनता जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसके विपरीत अगर ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो उस घर की तरक्की होती हैं।ऐसे घर में व्यक्ति को आर्थिक उन्नति के पर्याप्त अवसर मिलते हैं। वहीं, यदि दक्षिण-पश्चिम कोना बढ़ा हुआ हो, तो यह नकारात्मक प्रभाव डालता है तथा छोटी छोटी बातों पर कलह होना ऐसे घरों में एक आम समस्या होती है। अतः घर के सभी कोनों का संतुलित होना वास्तु के अनुसार आवश्यक है।

केस स्टडी- मैंने नवीन जी (परिवर्तित नाम) के घर का वास्तु अवलोकन किया उनके घर में ईशान कोण कटा हुआ था जिसके कारण से उनके घर के सदस्य का नाम एक घोटाले में आया और उसे अपना जीवन बहुत कष्टप्रद जीना पड़ा।

3. रसोई घर का ग़लत स्थान पर होना

रसोई घर अग्नि तत्व से जुड़ा है और आग्नेय कोण के स्वामी ग्रह शुक्र हैं। मैंने अपने वास्तु अवलोकन में देखा है कि आजकल एक ट्रेंड ही चल पड़ा है कि रसोई आग्नेय कोण में नहीं बनाते हैं और आग्नेय कोण की जगह शौचालय बनाते हैं। इसके पीछे उनका यह तर्क होता है कि रसोई यदि आग्नेय कोण में होगी तो पीछे चली जाएगी (प्रायः पशिममुखी घर में) जिससे उनके प्रदर्शन में कमी आती है परंतु ऐसे लोग यह इतनी बड़ी गलती करते हैं जिसका उन्हें अंदाज़ा भी नहीं होता।यदि रसोई उत्तर-पूर्व दिशा में बनाई जाए तो यह गंभीर वास्तु दोष माना जाता है क्योंकि यह तो जल का स्थान है यहाँ अग्नि होना तो अस्वाभाविक ही है। ऐसी स्थिति परिवार में महिलाओं को बहुत ज़्यादा परेशानी देती है। रसोई का सबसे शुभ स्थान दक्षिण-पूर्व दिशा है, जिसे आग्नेय कोण कहा जाता है।

4. अंडरग्राउंड का बढ़ता शौक

आजकल लोग घर के नक्शे में अंडरग्राउंड को तो प्रायः बनाते हैं। जमाने को देखते हुए ऐसा करना भी उचित है क्योंकि जगह का इस्तेमाल व्यक्ति ज़्यादा कर पाता है। ऐसा करते हुए व्यक्ति यह भूल जाता है कि उसे किस जगह पर अंडरग्राउंड बनाना चाहिए कई बार बार व्यक्ति ऐसी जगह पर अंडरग्राउंड बना लेता है जिससे व्यक्ति कर्ज़ के बोझ में डूब जाता है।

केस स्टडी: मैंने एक पश्चिममुखी मकान का अवलोकन किया जो मकान बहूत ही भव्य बना हुआ था। वह घर एक धनाढ्य व्यक्ति का था।उसका काम इतना अच्छा चलता था कि जैसे पैसों की बारिश हो रही हो। उसने अपना मकान बहुत ही अच्छा बनाया लेकिन सोने की थाली में एक छेद वाली गलती यह कर दी कि उसने नैऋत्य कोण में अंडरग्राउण्ड बना लिया। उसके बाद से धीरे धीरे उनका काम-धंधा कम हो गया और आज तो वह अपने पारिवारिक विवादों से ग्रस्त है और आर्थिक स्थिति भी पहले से खराब है।उसका एक बेटा नशे की लत से जूझ रहा है।

5. फ्लैट्स पर भी वास्तु लागू होता है

संचार के इतने ज़्यादा साधन हो गए हैं कि व्यक्ति निर्णय ही नहीं कर पाता कि कौनसी सूचना सही है। फिर आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बिना सोचे समझे प्रयोग। यह एक आमधारणा बनती जा रही है कि फ्लैट पर किसी भी तरह का वास्तु दोष नहीं लगता। ऐसी धारणा पूर्णतया निराधार है। हमें असामान्य आकार के फ्लैट को खरीदने से बचना चाहिए।वर्गाकार या आयताकार फ्लैटों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। वर्गाकार भवन शुभ रहते हैं। ऐसा न होने पर अपार्टमेंट का प्रत्येक कक्ष लगभग वर्गाकार हो। ब्लॉक के उत्तर, पूर्व और ईशान की ओर वाले फ्लैट सर्वोत्तम हैं। इधर से प्रातःकाल के समय शुभ ऊर्जाओं का प्रवेश होता है। इन फ्लैटों में नकारात्मक ऊर्जाएँ प्रवेश नहीं कर पातीं। ब्लॉक अन्य अपार्टमेंटों के भवनों के बहुत समीप न हो और चारों ओर से खुला हो। खुले क्षेत्र होने से संपूर्ण ब्लॉक में शुद्ध वायु का आवागमन बना रहता है। प्राकृतिक रोशनी और ताजी वायु का कमरों में निर्बाध प्रवाह बना रहता है। ऐसे अपार्टमेंट न चुनें जिन पर पड़ोस की ऊँची इमारतों के कारण सदा छाया रहती हो। फ्लैट का मुख पूर्व या उत्तर की ओर हो, या फिर इन दिशाओं में बड़ी खुली बालकनी हों। ऐसे फ्लैट को न ख़रीदें जिसमें बालकनी केवल दक्षिण या पश्चिम में हो।

वास्तु शास्त्र केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और सुखमय बनाने का व्यावहारिक मार्ग है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही हम स्वास्थ्य, समृद्धि और शांति प्राप्त कर सकते हैं। आधुनिक जीवन में भी यदि हम वास्तु के मूल सिद्धांतों को अपनाएँ, तो जीवन अधिक सकारात्मक और सफल हो सकता है। वास्तु शास्त्र पंचतत्वों के आधार पर घर में सकारात्मक ऊर्जा लाने का विज्ञान है, जिसके दोष से तनाव, बीमारी और कलह बढ़ती है। आधुनिक सुविधाओं के साथ वास्तु के प्राचीन नियमों का तालमेल ही सुखी जीवन का समाधान है। -सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी मोबाइल – 6376188431

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