Monday, May 25, 2026
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राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता माह : डॉ. श्‍याम अग्रवाल ने कहा- मन के बुखार को मत टालिये, किशोरों का मन भी सुनिए

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बीकानेर Abhayindia.com मई का महीना ‘राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता माह’ के रूप में मनाया जाता है। अक्सर हम बच्चों के बुखार, खांसी, वजन पर तो ध्यान देते हैं, पर उनके मन के बुखार को ‘नाटक’ या ‘उम्र का तकाजा’ कहकर टाल देते हैं। भारतीय संदर्भ में किशोरावस्था यानी 10 से 19 साल की उम्र, शरीर के साथ-साथ मन के तूफानों की भी उम्र है। और ये तूफान अगर समय पर न संभले तो जिंदगी भर का नुकसान कर सकते हैं।

1. आंकड़े क्या कहते हैं? भारत 
में किशोरों के मन की सच्चाई

WHO के अनुसार, दुनिया में हर 7 में से 1 किशोर किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहा है। भारत में NIMHANS के 2016 के सर्वे में 13-17 साल के 7.3% बच्चे मानसिक रोगों से ग्रस्त पाए गए। सबसे कॉमन हैं – एंग्जायटी, डिप्रेशन, परीक्षा का तनाव, इंटरनेट एडिक्शन और व्यवहार संबंधी समस्याएं। NCRB 2022 की रिपोर्ट दिल दहला देती है – भारत में हर रोज 35 से ज्यादा किशोर आत्महत्या कर रहे हैं। कारण? पढ़ाई का दबाव, रिलेशनशिप, अकेलापन, बुलिंग।

2. भारतीय परिवार में 'मन 
की बात' क्यों दब जाती है?

हमारे यहाँ ‘लड़के रोते नहीं’ और ‘लड़कियाँ ज्यादा सवाल नहीं करती’ जैसे जुमले आम हैं। ‘शर्मा जी का बेटा’ का प्रेशर, बोर्ड एग्जाम को ‘जीवन-मरण का प्रश्न’ बना देना, करियर में सिर्फ डॉक्टर-इंजीनियर का विकल्प दिखाना – ये सब किशोर के मन पर अदृश्य हथौड़े चलाते हैं। ऊपर से सोशल मीडिया की ‘परफेक्ट लाइफ’ की होड़। रील में सब खुश, और हकीकत में बच्चा टूटा हुआ। माता-पिता को लगता है ‘मोबाइल ले लो, सब ठीक हो जाएगा’, पर असल में बच्चे को ‘मोबाइल नहीं, महफूज माहौल’ चाहिए।

3. लाल झंडियाँ : कब समझें 
कि किशोर को मदद चाहिए?

बाल रोग विशेषज्ञ होने के नाते मैं माता-पिता से कहता हूँ – ये संकेत दिखें तो नजरअंदाज न करें…
1. व्यवहार में अचानक बदलाव : पहले हंसमुख बच्चा चिड़चिड़ा/चुप हो जाए।
2. नींद-भूख का पैटर्न बिगड़ना : रात-रात भर जागना या दिनभर सोना, वजन घटना/बढ़ना।
3. पढ़ाई से अरुचि : अच्छे नंबर लाने वाला बच्चा फेल होने लगे।
4. खुद को नुकसान पहुँचाना : हाथ पर ब्लेड के निशान, बाल नोचना।
5. ‘सब बेकार है’ जैसे जुमले : मरने-मारने की बात करना।
6. स्क्रीन से चिपकना : 6-8 घंटे फोन, गेम, रील – ये पलायन है, मनोरंजन नहीं।

4. इलाज से पहले परहेज : घर 
से शुरू हो मानसिक टीकाकरण

1. सुनना सीखिए, लेक्चर नहीं : दिन में 15 मिनट बिना फोन, बिना जज किए बच्चे की बात सुनें। ‘तू गलत है’ की जगह ‘तुझे कैसा लग रहा है’ पूछिए।
2. नंबर से पहले नीयत देखिए : 95% नहीं आए तो दुनिया खत्म नहीं होती। बच्चे का एफर्ट देखिए।
3. तुलना जहर है : ‘देख पड़ोस के गुप्ता जी का बेटा’ – ये वाक्य आत्मविश्वास की हत्या करते हैं।
4. स्क्रीन टाइम नहीं, ‘ग्रीन टाइम’ दीजिए : रोज 1 घंटा पार्क, खेल, दादा-दादी से बात।
5. नींद पूरी, मन हरा : किशोर को 8-10 घंटे नींद चाहिए। रात 11 बजे के बाद फोन ‘स्विच ऑफ’ का नियम बनाइए।

5. मदद मांगना कमजोरी 
नहीं, समझदारी है

अगर लक्षण 2 हफ्ते से ज्यादा रहें तो बाल रोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से मिलें। भारत सरकार की टेली-मानस हेल्पलाइन 14416 या 1800-891-4416 पर 24×7 मुफ्त सलाह मिलती है। स्कूलों में काउंसलर से मिलना शर्म की बात नहीं। याद रखिए, टूटी हड्डी का प्लास्टर कराते हैं तो टूटे मन का इलाज क्यों नहीं?

अंत में एक बात...

हम पोलियो मिटा सकते हैं, कुपोषण हरा सकते हैं, तो किशोरों के मन का अंधेरा क्यों नहीं? उन्हें वैक्सीन नहीं, ‘वक्त’ चाहिए। डांट नहीं, ‘दोस्ताना हाथ’ चाहिए। मई का महीना निकल जाएगा, पर मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा 12 महीने का है।आइए, इस बार बच्चे से पूछें – ‘बेटा, तेरे नंबर कैसे हैं’ के साथ-साथ ‘बेटा, तेरा मन कैसा है?’ क्योंकि तंदुरुस्त बच्चा वही है जिसका शरीर के साथ मन भी स्वस्थ हो। -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल एवं नवजात रोग विशेषज्ञ, बीकानेर

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