Saturday, May 16, 2026
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अधिकरण का आदेश हाईकोर्ट ने किया अपास्‍त, माध्‍यमिक शिक्षा विभाग के प्रधानाध्‍यापक का मामला

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जोधपुर Abhayindia.com राजस्थान उच्च न्यायालय की एकलपीठ के न्यायाधीश फरजन अली ने माध्यमिक शिक्षा विभाग श्रीगंगानगर में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हरविन्द्रसिंह के पदस्थापन की प्रतीक्षा में करने का आदेश दिनांक 02.06.2017 एवं राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण द्वारा उसकी अपील को खारिज करते हुए उस पर लगाई गई शास्ति का आदेश दिनांक 14.06.2017 को अपास्त करते हुए उसके द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को स्वीकार किया।

सनद् रहे माध्यमिक शिक्षा विभाग की राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय टिब्बी में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हरविन्द्रसिंह को निदेशक माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा दिनांक 02.06.2017 को पदस्थापन आदेशों की प्रतीक्षा में किया गया था। इस आदेश से व्यथित होकर उसने एक अपील राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत की। अधिकरण ने उसकी अपील को खारिज करते हुए उस पर 10 हजार रुपये की शास्ति का दण्ड का आदेश दिनांक 14.06.2017 को पारित किया। अधिकरण द्वारा शास्ति का आदेश व उसके पदस्थापन की प्रतिक्षा में किये गये आदेश दिनांक 14.06.2017 से व्यथित होकर अपने अधिवक्ता प्रमेन्द्र बोहरा के माध्यम से एक रिट याचिका वर्ष 2017 में पेश की। उक्त रिट याचिका को प्रथमतया उच्च न्यायालय में स्थगन आदेश पारित किया व माध्यमिक शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया।

उच्च न्यायालय के समक्ष अधिवक्ता का यह तर्क था कि प्रार्थी को पदस्थापन आदेश जो पारित किया गया है वह राजस्थान सेवा नियम 25(ए) के विरूद्ध पारित किया गया है। राजस्थान सेवा नियम में जो प्रावधान दिये गये है उसमें उसका आदेश कहीं पर लागू नहीं होता है। दूसरा अधिकरण ने प्रार्थी पर जो शास्ति लगाई गई है वो अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर लगायी है। अधिकरण ने आदेश दिनांक 14.06. 2017 से प्रार्थी की अपील को खारिज करते हुए उसके ऊपर 10 हजार रुपये की शास्ति लगाई व यह शास्ति राशि उसके आगामी माह के वेतन में से काटने का आदेश पारित किया।

प्रार्थी के अधिवक्ता का यह तर्क था कि किसी के वेतन में से किसी प्रकार की कटौती करना दण्ड की परिभाषा में आता है व किसी राज्य कर्मचारी को दण्ड देने से पहले राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) सेवा नियम 1958 की पालना करना आवश्‍यक है एवं सजा सक्षम अधिकारी/ नियुक्ति अधिकारी या अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा ही नियमों की पालनानुसार एवं सुनवाई का अवसर दिये जाने पश्‍चात् दी जा सकती है। वर्तमान प्रकरण में अधिकरण न तो याचिकाकर्ता का न तो नियुक्ति अधिकारी है न ही अनुशासनात्मक अधिकारी है, इसके बावजूद भी उसके अधिकरण द्वारा शास्ति राशि का दण्ड जो दिया गया है व नियम विरूद्ध एवं राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) सेवा नियम 1958 के विरूद्ध है।

प्रार्थी के अधिवक्ता के तर्कों से सहमत होते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पदस्थापन आदेश की प्रतिक्षा के आदेश दिनांक 02.06.2017 को राजस्थान सेवा नियम के नियम 25(ए) के विरूद्ध माना व अधिकरण के द्वारा 10 हजार रुपये की शास्ति के आदेश दिनांक 14.06.2017 को अधिकरण के अधिकार क्षेत्र से परे मानते हुए निरस्त करते हुए उसके द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को स्वीकार किया।

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