निजीकरण में नहीं होगी इंसान की कीमत: देवीसिंह भाटी

रेल निजीकरण के खिलाफ बरसे भाटी, देखें वीडियो…

बीकानेरAbhayindia.com पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने कहा है कि निजीकरण में इंसान की कोई कीमत नहीं होगी। सिर्फ पैसे का बोलबाला होगा।

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शनिवार को ऑल इंडिया रेलवे मैन्स फैडरेशन के आह्वान पर नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे एम्पलाइज यूनियन की ओर से निजीकरण के खिलाफ चलाए जा रहे जनजागरण सप्ताह के तहत हुई कार्यशाला में देवीसिंह भाटी ने निजीकरण के खिलाफ एकजुटता के साथ दृढ़ता से लड़ाई लडऩे की बात कही।

उन्होंने साफ तौर पर कहा कि निजीकरण चाहे रेलवे का हो, बिजली का हो, या कोई अन्य विभाग का। कहने को तो कंपनियों के प्रतिनिधि सुविधाएं मुहैया कराने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन एक बार उनके हाथ में कमान आ जाए तो उसके बाद वो आमजन की सुनवाई नहीं करते। भाटी ने रेलवे यूनियन से आह्वान किया कि केवल जागरुकता सप्ताह मनाने से निजीकरण को नहीं रोका जा सकता, इसके लिए कंधे से कंधा मिलाकर कर्मचारी संगठन को मजबूती के साथ अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।

उन्होंने रेलवे यूनियन के पदाधिकारियों को भरोसा दिलाया कि वे उनके आंदोलन में साथ है। भाटी ने नार्थ वेस्टर्न रेलवे एम्पलाईज यूनियन के पदाधिकारियों की सराहना करते हुए संघर्ष जारी रखने की बात कही। उन्होंने कहा जब एकजुटता के साथ आगे बढ़ेंगे तो किसी की हिम्मत नहीं है कि वो रेलवे का निजीकरण कर दें।

कई बार सोचना पड़ेगा…

कार्यशाला में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एडवोकेट अजय पुरोहित ने कहा कि आज सरकार की मंशा रेल को निजी हाथों में देने की है। सरकार निजी कंपनियों को वो स्टेशन, वो ट्रेनें देना चाहती है, तो रुट फायदे में है। लेकिन रेल कर्मचारियों के बूते पर चल रही है। इसके लिए सरकार को सोचना होगा कि यह पटरियां किसी की है, स्टेशन किसके हैं, मगर निजीकरण के खिलाफ लडऩे के लिए अब रेलवे कर्मचारियों को भी चुस्ती और मुस्तैदी के साथ काम करना होगा।

पुरोहित ने कहा कि देशभर में रोजाना 23 हजार ट्रेनें चलती है, जिनके माध्यम से करीब दो करोड़ यात्री रोजाना एक से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं। ऐसी व्यवस्था बनाए रखना निजी कंपनियों के बूते में नहीं है। ऐसे में यूनियन ने लोगों को जागरुक करने का जिम्मा उठाया है, वो सराहनीय कदम है।

सेठों को फायदा पहुंचाने की नियत…

कांग्रेसी नेता अरविन्द मिढ्ढ़ा ने कहा कि केन्द्र सरकार चंद धन्ना सेठों को फायदा पहुंचाने की नियत से रेल को भी निजी हाथों में सौंपने की योजना बना रही है, लेकिन निजीकरण के खिलाफ सभी को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।

महज रेल ही क्यों बंद…

नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे एम्पलाईज यूनियन के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल व्यास ने कहा कि देश में रोजाना 23 हजार ट्रेनें चलती थी, लेकिन अभी चंद गिनती की ट्रेनें ही चलाई जा रही है, ऐसा क्यों? उन्होंने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह रेलवे के साथ जानबूझकर किया जा रहा है।

आज अनलॉक होने के बाद से परिवहन के अन्य साधन तो सुचारु हो गए हैं, एक माह रेलवे को ही रोका गया है। अब थोड़ी-थोड़ी संख्या में ट्रेनें चलाई जा रही है, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के दौरान भी रेल कार्मिकों ने जान जोखिम में डालकर देश में माल गाडिय़ों का संचालन किया था, जिसके जरिए खाद्य सामग्री के साथ ही दवाइयां और अन्य जरुरत की वस्तुएं एक से दूसरे राज्य तक पहुंचाई है।

इसके बावजूद आज सीमित संख्या में ही यात्री ट्रेनें चलाई जा रही है। व्यास ने कहा कि सरकार की मंशा रेलवे को पूरी तरह से निजी हाथों में देने की है, मगर संगठन के स्तर पर यह कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, निजीकण के खिलाफ संघर्ष लगातार जारी रहेगा। कार्यशाला में ब्रजेश ओझा ने कहा कि निजीकरण से किसी को कोई फायदा नहीं हुआ है, अलबत्ता आमजन को नुकसान ही झेलना पड़ रहा है।

फिर चाहे बात रेल की हो, चिकित्सा क्षेत्र, बिजली या अन्य विभाग की। रेलवे संगठन निजीकरण के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

इन्होंने भी रखें विचार

कार्यशाला में पार्षद रमजान कच्छावा, प्रफुल्ल हटीला, मोहम्मद रफीक, दिनेश सिंह, ठेला यूनियन के मोहिदीन चौहान, अब्दुल सत्तार, यूनियन के प्रतापसिंह, मनोज के बिस्सा, विजय श्रीमाली, अमरनाथ, मुस्ताक अली आदि ने भी सुझाव रखें।

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