Friday, May 15, 2026
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पं. दिवाकर की कविताओं और गीतों की महक आज भी है कायम, मृत्यु को भी उत्सव की तरह जिया

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बीकानेर Abhayindia.com बीकानेर के मूल निवासी पण्डित बल्लभेष दिवाकर साहित्य जगत मे दिवाकर की तरह ही आलोकित रहे। पण्डित दिवाकर राजस्थानी और हिन्‍दी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार थे। पण्डित दिवाकर ने राजस्थानी भाषा के संवर्धन एवं विकास के लिये उल्लेखनीय कार्य किये। उन्होंने राजस्थानी भाषा की साधना की। उन्‍होंने अपने जीवन में दर्जनों राजस्थानी फिल्मों में गीत संवाद लिखें। उनके गीतों में मिट्टी की महक और अपनेपन की मिठास होती थी।राजस्थानी फिल्म थारी म्हारी में राजस्थान की वंदना गीत जय-जय राजस्थान लिखा जो राजस्थान सरकार का मुख्य गीत है। पं दिवाकर का उक्त गीत आमजन में बहुत ही लोकप्रय है। राजस्थान के लोक कलाकारों ने उस गीत को अपने-अपने तरीके से रिक्रियेट किया है।

पंं. दिवाकर ने कोलकता से प्रकाशित विश्वामित्र अखबार में बतौर पत्रकार काम किया। पं दिवाकर के हिन्दी में दो कविता संग्रह मैं एकांकी नहीं चलूंगा और धरती प्यासी है, प्रकाशित हुये जो कि जनता के बीच बहुत ही लोकप्रिय हुये। उनके गीत लोग आज भी गुनगुनाते हैंं। दिवाकर के गीत राष्ट्रीय स्तर के होते थे। राष्ट्र कवि प्रदीप भी पं दिवाकर के गीतों के प्रशंसक थे। पं दिवाकर ने अपनी कर्मभूमि बम्बई को बनाया। उन्होंने फिल्मी दुनिया में काम करके भी अपने व्यक्तित्व को बेदाग बनाया। उन्‍होंने जीवन को अपने मूल्यों और संस्कारों के साथ जीया जो आज भी हम सबके लिये प्रेरणादावी है। उन्‍होंने स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया और पैसो को अपने जीवन में कभी भी अहमियत नहीं दी। पं दिवाकर विपरीत से विपरीत परिस्थिति को सहर्ष रूप से स्वीकार करते थे।

उन्‍होंने वेद की ऋचाओं कां हिन्दी अनुवाद किया और लोक देवता रामदेवजी के जीवन पर रामदेव चालीसा लिखी।सालासर बालाजी के साथ-साथ जैन धर्म कालू घणी और आचार्य तुलसी पर गीतों की रचना की। पं दिवाकर राजस्थानी भाषा के साहित्यकार पं मुरलीघर व्यास राजस्थानी को अपना प्रेरणा सोत मानते थे। भैरव उपासक पण्डित दिवाकर ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान थे। वे लोगों की समस्याओं का निदान ज्योतिष के द्वारा करते थे लेकिन उन्होंने अपनी पहचान कवि गीतकार की ही बनाई। उन्हें कविता और गीतों की बात करना ही पसन्द था। उन्होंने स्वयं की मृत्यु की तिथि ज्योतिषिय गणना के आधार पर घोषित कर दी थी और उस दिवस को ही उनका देहान्त हुआ। उन्होंने अपनी मृत्यु को भी उत्सव की तरह जिया। उन्‍होंने उस दिवस को सुबह नये कपड़े पहनकर अपने परिचितो से मिलकर आये और रात को साहित्य साधना के समय ही अपने प्राण त्याग दिए। पं दिवाकर एक प्रेरणादायी व्यक्ति थे जो भी उनसे मिला उनका ही होकर रह गया। उन्होंने बहुत ही शानदार जीवन जीया जो हम सबके लिये प्रेरणादायक है। पं दिवाकर को पुण्यतिथि के अवसर पर सादर श्रदांजलि अर्पित करता हूँ। प्रस्‍तुति : जी. एस. व्‍यास, एडवोकेट

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