Friday, May 15, 2026
Hometrendingसही दिशा में बना मुख्य द्वार कर सकता है मालामाल, जानें- क्‍या...

सही दिशा में बना मुख्य द्वार कर सकता है मालामाल, जानें- क्‍या कहता है वास्तु शास्त्र…

AdAdAdAdAdAdAdAdAd

वास्तु शास्त्र के अनुसार, किसी भी भवन, घर या व्यापारिक स्थल का मुख्य द्वार सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थानों में से एक होता है। यह केवल एक प्रवेशद्वार नहीं होता, बल्कि यहीं से सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश करती है। द्वार की दिशा व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव डालती है। सही दिशा में बना मुख्य द्वार धन, स्वास्थ्य और नाम प्रदान करता है, जबकि गलत दिशा में बना द्वार कलह, रोग और हानि का कारण बन सकता है। वास्तु चक्र में विभिन्न देवताओं के स्थान पर मुख्य द्वार होने से उनके विभिन्न शुभाशुभ परिणाम घर तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में क्या होंगे उसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं।

1. शिखि

इस स्थान पर मुख्य शुभ नहीं माना गया है तथा यहाँ द्वार होने से अग्नि भय रहता है। अग्नि संबंधित दर्घटनाएं गृह स्वामी के लिए कष्ट का कारण बन सकती हैं, जिनमें करण्ट, पटाखों से दुर्घटना, घरों में गैस सिलेण्डर, प्रेशर कुकर आदि फटने से होने वाली दुर्घटनाएं सम्मिलित हैं। गृह स्वामी को इस घटनाओं से कष्ट प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में ही मिलता है। प्रत्यक्ष रूप में तो वह स्वयं घटना का शिकार हो सकता है तथा अप्रत्यक्ष रूप में यदि मकान बनते समय किसी मजदूर, बिजली की फिटिंग करते समय इलैक्ट्रिशियन आदि के साथ घटना हो जाए तो वह भी गृह स्वामी के लिए भी कष्ट का ही विषय है। ऐसा भी देखा जाता है कि जब इस स्थान पर मुख्य द्वार होता है तो मकान मालिक का स्वभाव अपेक्षाकृत क्रोध भरा होता है जिससे कि पारिवारिक कलह बढ़ जाती है और व्यक्ति कभी भी अपने घर में किसी एक निर्णय पर नहीं पहुंचता है।जल्दी क्रोधित हो जाने के कारण व्यक्ति न केवल घर में अपितु कार्य क्षेत्र में भी अपनी साख खो देता है।

2. पर्जन्य

ईशान से पूर्व की ओर दूसरे द्वार का नाम पर्जन्य है। इस द्वार के परिणाम कन्या संतति एवं स्त्री विकास है। कुछ महत्वपूर्ण ज़वास्तु ग्रन्थों में इस द्वार से लक्ष्मी प्राप्ति बताई गई है, परन्तु अन्य ग्रन्थों में मतान्तर है। यह द्वार स्त्रियों को अत्यधिक गुण संपन्न बनाता है। जिन घरों में पर्जन्य नामक द्वार अनजाने में ही खुल जाए, ऐसे घरों की पुत्रियां अत्यधिक प्रतिभाशाली देखी गई हैं। कुछ मामलों में इस स्थान पर द्वार से अधिक कन्या संतति का जन्म होना पाया गया है।

3. जयन्त

ईशान एवं पूर्व दिशा मध्य में जयन्त नामक द्वार है। जयन्त देवराज इन्द्र एवं शची के पुत्र हैं। यह द्वार अत्यधिक धन देने वाला है। जयन्त में देव एवं आसुरी दोनों ही संस्कार हैं क्योंकि शची असुर कन्या थीं। अतः व्यक्ति धन कमाने के लिए अत्याधुनिक तरीके खोजता एवं अपनाता है। इसका तात्पर्य यह है कि धन कमाने की आधुनिक तकनीक इस द्वार से सीखी जा सकती है, जिसे हम आधुनिक शब्दावली में “Marketing Tacticts” कहते हैं। इस प्रकार यह द्वार धन प्रदान करता है।

4. इन्द्र

इन्द्र देवताओं के राजा हैं। यह द्वार राजा की प्रसन्नता लाने वाला द्वार है, आधुनिक समय में हम इसे सत्ताधारी एवं उच्चाधिकारियों की प्रसन्नता या सहयोग मान सकते हैं। इन्द्र का द्वार धन की अपेक्षा सम्मान अधिक देता है। अतः यदि द्वार इन्द्र से जयन्त तक बढ़ा लिया जाए तो सत्ता द्वारा धनार्जन संभव है अथवा सम्मान एवं धन दोनों की प्राप्ति की जा सकती है।

5. रवि

रवि पूर्व दिशा मध्य का द्वार है। इस द्वार का परिणाम क्रोधीपन है। संपूर्ण विकास के लिए सूर्य के समुचित अंश की आवश्यकता होती है। जब अनुपात कम होगा तो ऊर्जा की कमी होगी तथा जब ज्यादा होगा तो ऊर्जा का विस्फोट होगा। रवि की ऊर्जा को यदि नियंत्रित कर लिया जाए तो समुचित विकास संभव है। यह द्वार उद्योगों के लिए प्रशस्त नहीं माना जाता है। जिन कारखानों में यह द्वार होता है, वहाँ मालिक को क्रोध अधिक आता है और क्रोधातिरेक में वह प्रायः अपने महत्वपूर्ण पदाधिकारियों का भी अपमान कर बैठता है, परिणामतः नकारात्मक वातावरण बनने से न केवल उत्पादन पर असर आता है अपितु कार्य करने का वातावरण भी ठीक न होने से कर्मचारी एवं अधिकारी वर्ग आपस में सामंजस्य नहीं बिठा पाते और परिणामतः उत्पादन घटने से कारखानों में घाटे की स्थिति बन जाती है। रवि की अत्यधिक ऊर्जा को सहन करना सबके लिए संभव नहीं है, यह ऊर्जा सिर्फ उन लोगों के लिए प्रशस्त है जिनका संपर्क क्षेत्र बड़ा है तथा उनके पास अधिकार हैं।

6. सत्य

इस द्वार का परिणाम असत्य वाचन कहा गया है। जिस घर में यह द्वार होता है वहाँ किसी न किसी कारण से घर का कोई कोई सदस्य झूठ बोलता है। अंततः कोई बड़ा एवं खतरनाक परिणाम लाता है। झूठ के पीछे अवश्य ही कोई बड़ा कारण होता है जो परिवार के सदस्यों को राह से भटका देता है। जिसका नकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार को झेलना पडता है।

7. भ्रंश

भ्रंश नामक द्वार का परिणाम क्रूरता है। यह द्वार देवता की प्रकृति के अनुरूप इच्छाओं को बढ़ाता है और उनको पूर्ति के लिए व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो जाता है। इच्छाएं इतनी प्रबल हो जाती हैं कि व्यक्ति, स्वार्थ की पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। एक पिता का, अपने बच्चों का भूख एवं अभाव में होते हुए भी शराब पीना, पत्नी का पति की आय से अधिक खर्च करके, उससे कम कमाने की लगातार शिकायत करना आदि इस प्रकार की क्रूरता के उदाहरण हैं। यदि व्यावसायिक परिसर या कार्यालय में यह द्वार हो तो प्रायः उच्चाधिकारी अपने अधीनस्थ के प्रति क्रूर व्यवहार करते हुए पाए जाते हैं।

8. अंतरिक्ष

इस द्वार के दुष्परिणामों के रूप में या तो घर में चोरी आती है अथवा परिवार के किसी न किसी सदस्य में चौरवृत्ति जन्म लेने लगती है। वैवाहिक संबंधों में दरार आ जाती है। व्यावसायिक स्थानों में कर चोरी देखने को मिलती है। कर्मचारी भी चोरी करने लगते हैं। गलत ढंग से कमाने लगते हैं।

9. अनिल

इस द्वार का परिणाम अल्प पुत्रता है। अल्पपुत्रता के दो अर्थ हो सकते हैं या तो पुत्र का जन्म न हो या पुत्र तो हों परन्तु किसी न किसी कारणवश घर से दूर रह रहे हो चाहे नौकरी के कारण यह परिवार में बडे पुत्र के लिए घातक हो सकता है।

10. पूषा

इस द्वार का परिणाम दासत्व बताया गया है। दासत्व का आज के संदर्भ में तात्पर्य है कि व्यवसाय करने वाला व्यक्ति, नौकरी करने पर परिस्थितिवश विवश हो जाए। यह द्वार संपदा का विनाश करता है। अर्थात् धन-धान्य का नाश करता है। गलत निर्णय या किसी भी कारण से व्यवसाय में निरंतर हानि होती रहती है और धीरे-धीरे जीवन स्तर गिरता जाता है। एक उद्योगपति को नौकरी करने पर विवश कर देने की प्रवृत्ति इस द्वार में होती है।

11. वितथ

वितथ नामक द्वार का परिणाम है नीचपन। यह द्वार आपराधिक एवं धोखा-फरेब की प्रवृत्ति देता है। इन प्रवृत्तियों के कारण व्यक्ति में षडयंत्र से दूसरों का धन छीनने तथा धन प्राप्ति के लिए गैर कानूनी रास्ते अपनाने की प्रवृत्ति होती है। ऐसी स्थिति में गृह स्वामी में सत्य एवं तथ्यों को छिपाने की इच्छा जन्म लेती है। ऐसी घटनाएं जहाँ धन के लिए भाई- भाई की हत्या कर दे, पुत्री अपने पति के साथ मिलकर पिता की संपत्ति हड़पने का प्रयास करे आदि। व्यावसायिक परिसरों में यह द्वार विनाश का कारण बनता है।

12. बृहत्क्षत

इस द्वार के परिणाम हैं खान-पान और पुत्र की वृद्धि। यह द्वार व्यवसाय करने वालों के लिए अच्छे परिणाम लाता है क्योंकि यह अच्छे निर्णय लेने की प्रेरणा देता है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह द्वार वंशानुगत व्यवसाय को अपनाने के लिए बाध्य करता है जिससे परिवार को पनपने में भी मदद मिलती है।

13. पूषा

इस द्वार का परिणाम दासत्व बताया गया है। दासत्व का आज के संदर्भ में तात्पर्य है कि व्यवसाय करने वाला व्यक्ति, नौकरी करने पर परिस्थितिवश विवश हो जाए। यह द्वार संपदा का विनाश करता है। अर्थात् धन-धान्य का नाश करता है। गलत निर्णय या किसी भी कारण से व्यवसाय में निरंतर हानि होती रहती है और धीरे-धीरे जीवन स्तर गिरता जाता है। एक उद्योगपति को नौकरी करने पर विवश कर देने की प्रवृत्ति इस द्वार में होती है। -सुमित व्यास, एम.ए (हिंदू स्टडीज़), काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी, मोबाइल – 6376188431

- Advertisment -

Most Popular

error: Content is protected !!