जब-जब इस पृथ्वी पर पाप का आधिक्य हुआ है। तब-तब देवी शक्तियां राक्षसी प्रवर्तियों का नाश करने के लिए मानव देह के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित होती रही है। 615 वर्ष पहले ऐसे ही कठिन काल मे अनादि शक्ति के रूप में मां दुर्गा श्री करणी जी के रूप में मारवाड़ की भूमि पर अवतरित हुई। पापियों का दमन किया तथा दो शक्तिशाली राज्यों बीकानेर व जोधपुर की स्थापना की जो आज भी विशाल भारत की सीमाओं के जागरूक प्रहरी है। दिव्य शक्ति अनादि काल से विश्व में अवतरित हुई। स्वयं श्री रामचन्द्र जी भगवान ने रावण से युद्ध करने से पहले महाशक्ति का पूजन किया था। शक्ति की उपासना मानव को मानसिक शांति एवम जीवनयापन की संसिद्धिया प्रदान करती है।
बीकानेर जिले का देशनोक किसी समय जांगल देश की नाक अर्थात नासिका थी व आज भी है। महाभारत काल से ही द्वारिका से दिल्ली जाने के मार्ग का यह प्रसिद्ध पड़ाव रह चुका है। जांगल देश के पंवार शासको ने 6 वर्ग मील में पशुओं के विशेष रूप से घोड़ो के लिए चारागाह बनवाया था। घास कस काफी अधिक मात्रा में पैदा होना इस क्षेत्र का एक मात्र कारण था। यहां पर श्री करणी मां ने घोर तपस्या कर इस स्थान को गरिमा प्रदान कर पूरे विश्व पटल पर ख्याति प्रदान की। बीकानेर के तत्कालीन राज्य के महाराजा श्री गंगा सिंह जी के द्वारा निर्मित मंदिर, केवल मंदिर का बाहरी आवरण के अतिरिक्त अन्य सभी ऐतिहासिक अवशेष काल के साथ ही विलुप्त हो चुके है।
बीकानेर जिले के देशनोक में स्थित श्री करणी जी माताजी का मंदिर आदिशक्ति जगदम्बा मां हिंगलाज का अवतार एवं शक्ति व विजय की देवी मानी जाने वाली मां करणी का पवित्र व विश्वप्रसिद्ध धाम है। आज देशनोक की आबादी करीब 20000 -25000 है एवं इसमे मूल जन देपावत शाखा के बीठू चारण है। ये ही लोग श्री करणी माताजी के अधिकृत पुजारी है। शुरू से ही कुछ जातियों के यहां बसने पर रोक लगा दी गई थी व यदि वे बसे भी तो उनके दैनिक जातिगत कार्यों के करने पर पाबंदियां थी।माताजी का भी एक घोषित क्षेत्र है जिसे ओरण कहते है। इस क्षेत्र में हल चलाना, लकड़ी काटना एवं अन्य हिंसक कार्यों पर रोक है जिसका पूर्णतया पालन आज भी होता है। इस ओरण का क्षेत्रफल मंदिर से 4 वर्गमील में माना जाता है। नवरात्रा में इस ओरण की लाखों भक्तगण परिक्रमा करते है। देशनोक का विश्व प्रसिद्ध मंदिर जिसकी ख्याति संगमरमर की अनुपम कलाकृति के कारण विदेशों में भी है। मंदिर देशनोक रेल्वे स्टेशन से करीब 100 गज की दूरी पर बना हुआ है। देशनोक रेलवे स्टेशन बीकानेर जंक्शन से 20 मील दूर दक्षिण में बीकानेर जोधपुर रेल व बस से आवागमन के लिए अति सुलभ है।
इस मंदिर की एक खास बात यह है कि यहां मंदिर परिसर में हजारों की तादाद में चूहे निडर घूमते रहते है जिन्हें स्थानीय बोली में काबा कहते है। इनमे सफेद काबे के दर्शन हेतु यहां आने वाले दर्शनार्थी घंटों इंतजार करते रहते है क्योंकि यह अटूट धारणा है कि भाग्यशाली व्यक्ति को ही इस पवित्र सफेद काबे के दर्शन होते है। और वास्तव में इसके दर्शन बहुत ही दुर्लभ है। इस मंदिर के अतिरिक्त यहां दर्शनीय स्थल नैहड़ी जी है जो मंदिर के पश्चिम दिशा मे एक मील की दूरी पर स्थित है। यहां पर श्री करणी माता ने सदैव निवास किया व घोर तपस्या की एवं अनेक चमत्कार कर लोगों को जीवन दान भी दिया।। कहते है कि यहीं दही बिलोने की लकड़ी को आपने हरे भरे व्रक्ष में बदल दिया।
दूसरा स्थान श्री त्तेमडे जी का मंदिर है जिसमे एक डेढ़ फीट चौड़ी पेटी रखी हुई है जिसमे श्री करणी जी अपने आराध्य देव की पूजा का सामान रखते थे। समय बहुत बदल गया है व इसके साथ ही देश के भूखंडों में सभ्यता दूषित होती चली गई, किन्तु देशनोक प्राचीन परम्पराओं एवं आदर्शों का अपरिवर्तित स्थान है। जहां अभी तक दूषित वातावरण नजर नही आता। विक्रम संवत 1444 भी ऐसा ही वर्ष था जब श्री करणी जी ने चारण जाति में सुवाप ग्राम में शक्ति के रूप में अवतार लिया जो फलोदी के पास है। सुवाप ग्राम का प्राचीन नाम ब्राह्मण की ढाणी था।
श्री करणी जी के जन्म के बारे में एक दोहा भी प्रचलित है- चौदह सौ चम्मालवे सातम सुकरवार, असोजमास ऊजालपक्ष, आई लियो अवतार, सुवाजी एक धनिक ब्राह्मण थे व उन्होंने ही यह ग्राम बसाया था।
श्री करणी जी के पिता का नाम मेहाजी व माता का नाम देवल बाई था। श्री करणी जी का बचपन का नाम रिद्धि बाई था। ये अपने पिता की छठी संतान थी। इससे पहले ही पांच संताने कन्याएं ही थी। जब वे चार वर्ष की थी तो इनके पिता मेहाजी को जंगल मे सर्प ने काट लिया। श्री करणी जी ने पिता के सर्पदंश अंग पर हाथ रख कर सारा जहर हर लिया व उन्हें जीवन दान दिया।
श्री पीठ घुगेड़ा के निवासी थे जो जाति द्वेष वश जांगलू देश मे बस गए थे। इनका सम्बद्ध भगवान बुद्ध की 11वी पीढ़ी से है। ऐसा इतिहासकारों का मत है। इनके पुत्र प्रपौत्रों की पीढ़ी में केलूजी नाम के दार्शनिक थे, जिनके पुत्र देपाजी से श्री करणी जी का सम्बंध तय हुआ। इतिहास के अनुसार, श्री करणी जी का विवाह विक्रम संवत 1473 में सम्पन्न हुआ। जब इनकी बारात सुवाप ग्राम से 15 किलोमीटर दूर निकल आई तो बारातियों व पशुओं को प्यास महसूस हुई। साथ लाये पानी के सभी घड़ों को खाली पाकर बाराती लोग हैरान हुए। जब यह बात श्री करणी जी ने सुनी तो उन्होंने डोली वाले से कहा पानी के तालाब से पानी भरवा लो। इस पर देपाजी ने आश्चर्यचकित होकर कहा कि मार्ग में आगे दूर दूर तक तालाब का चिन्ह भी नजर नहीं आ रहा तो श्री करणी जी ने कहा कि पीछे मुड़कर देखिए आपको तालाब नजर आएगा। जब देपाजी पीछे मुड़े तो वहां एक स्वच्छ जल का तालाब दिखाई दिया तो उनकी बुद्धि चकरा गयी और सबसे विस्मय का क्षण तब आया जब वे करणी जी से पानी के लिए पूछने हेतु डोली के निकट गए और पर्दा उठाकर देखा तो उनको हाथ मे त्रिशूल लिए साक्षात देवी के दर्शन हुए व निकट में ही एक सिंह बैठा हुआ था। थोड़ी देर इस नयनाभिराम दृश्य के बाद करणी जी उनको पुनः मानव देह में दिखाई दी।
इन चमत्कारी घटनाओं से देपाजी के सोचने की शक्ति ग़ुम हो गई। इस स्थिति को श्री करणी जी ने समझते हुए स्वयं ही स्पष्ट किया कि यह मेरी काली एवं कुरूप दिखने वाली देह मानव है। इन सब चमत्कारों से देपाजी को विश्वास हो गया कि श्री करणी जी एक दिव्य शक्ति का अवतार है। श्री करणी जी द्वारा सैंकड़ों चमत्कारिक घटनाओं को अंजाम दिया जो आज भी इतिहास के पन्नो में विद्यमान है। श्री करणी जी के श्वसुर केलुजी प्रसिद्ध शिव भक्त थे। जब उन्हें पता चला कि श्री करणी जी एक देवी शक्ति अवतार है तो उन्होंने पुत्र वधु का स्वागत देवताओं की भांति किया।
श्री करणी जी का साठीका निवास इतिहास के अनुसार केवल दो सालों का था। संवत 1475 में उन्होंने ससुराल का परित्याग कर दिया। साठीका ग्राम में पानी का एक कुआं था जिसमे ग्रामवासीयों की आवश्यकता मुश्किल से पूरी होती थी। श्री करणी जी अपने साथ 200 गाये लायी थी जो पहले ही ग्रामवासियों के साथ और बहुत सारा पशुधन साठीका ग्राम पहुंच गया। इस कारण ग्रामवासियों में पीने के पानी को लेकर विरोध उत्पन्न हो गया। इससे करणी जी रूष्ट हो गयी। उन्होंने कहा कि इस कुएं का पानी खारा हो जाएगा और अब हम सभी वही पर निवास करेंगे जहां पर गौ धन की प्यास बुझेगी। दूसरे दिन जब ग्रामवासियों को खारे पानी का अहसास हुआ तो उनमें भय व्याप्त हो गया। तब सभी ने श्री करणी जी से पानी मे सुधार करने की प्रार्थना की। उन्होंने अपने गौधन के साथ यह कह कर प्रस्थान किया कि जहां भी सूर्यास्त होगा वहीं मेरा निवास स्थान होगा। ग्रामवासियों ने श्री करणी जी से बहुत मिन्नते की किन्तु वे किसी प्रकार वहां पर रुकने को तैयार नही हुई और अपने चुने हुए सेवकों को पशु हांकने का आदेश देकर विक्रम संवत 1475 की ज्येष्ठ शुक्ल 9 वी को दोपहर बाद श्वसुर,सास,पति एवम अन्य संबधियों को साथ लेकर दूसरे दिन आगे की यात्रा करने के लिए ग्राम की सीमा से बाहर आ गई।
देशनोक के लिए प्रस्थान- दूसरे दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में ज्येष्ठ शुक्ला 10 विक्रम संवत को नया निवास बनाने के लिए जिसका निर्णय सूर्यास्त तक कि गई यात्रा द्वारा होना था,के लिए श्री करणी जी ने पूरे परिवार सहित प्रस्थान किया। इस यात्रा में श्री करणी जी दोपहर को जांगलू ग्राम पहुंची, जहां उस दिन जांगलू के राव कान्हा के साथ चांडासर के राव रिडमलसर ठहरे हुए थे। राव रिड़मल जी देवीजी के भक्त थे और देवीजी के दर्शन करने के लिए साठीका जाते थे। रिड़मल ने देवीजी को देखते ही उनकी स्तुति में लीन हो गए व बाद में उनकी कुशलक्षेम पूछी। माताजी ने रिड़मल को आशीर्वाद देकर आगे की यात्रा के लिए चलदी व सूर्यास्त तक देशनोक के समीप जालों के जंगल मे आकर उनकी यह यात्रा समाप्त हुई। यह जंगल राव कान्हा के घोड़ों के चरने के लिए सुरक्षित था। राव कान्हा ने श्री करणी जी से तुरंत यह जंगल खाली करने को कहा इस पर माताजी ने राव कान्हा से कहा कि मैं मेरी आराध्य देवी आवड़ माताजी के आदेश से ही यहां आयी हूं उनकी मूर्ति व सेवा का सामान मेरे साथ रखी हुई इस लकड़ी की संदूक में रखा है जो आज भी श्री त्तेमडेजी के मंदिर में रखी हुई है, तूँ इसको उठाकर मेरे रथ पर रख दे तो मै यहां से चली जाउंगी। राव कान्हा के साथ आये हुए सभी लोगों ने इस संदूक को उठाने की बहुत कोशिश की परन्तु संदूक को नही उठा सके। राव कान्हा ने अपने हाथी से नीचे उतरकर जंजीरों से इस संदूक को उठाने की कोशिश की लेकिन तब भी संदूक नही उठा सके। राव कान्हा की मौत देशनोक के जंगलों में हुई ऐसा इतिहास बताता है।
राव कान्हा की मौत के बाद करणी जी ने राव रिड़मल को चूंडासर से बुलवाया एवम उनका राज्याभिषेक जांगलू के राजा के रूप में किया। प्राचीन बनाये हुए निवास अभी भी श्री नैडीजी के प्राचीन मंदिर के पास श्री करणी जी की ढाणी के नाम से विख्यात है।
नैडी जी का अर्थ दही बिलोने वाली लकड़ी से है। राव रिड़मल जी ने श्री करणी जी के समक्ष मंडोर राज्य पर अधिकार करने की इच्छा प्रकट की। इस पर माताजी ने कहा कि राज्य तो मैं तुम्हे दे चुकी हूं अभी नही,दो माह बाद मंडोर। लेकिन रिड़मल ने फ़ौज के साथ मंडोवर पर चढ़ाई करदी। परन्तु मुसलमान शाशक व पड़ोसी रावों ने मिलकर इस सेना का मुकाबला किया और राव रिड़मल ने देशनोक आकर माताजी से शिकायत की तो माँ ने कहा कि मैंने तुझे दो माह के लिए ठहरने के लिए कहा था परंतु तूं उस बात को भूलकर पहले ही आक्रमण कर बैठा।इस कारण तुजे पराजय का मुहँ देखना पड़ा। बाद में श्री करणी जी ने ऐसी व्यूह रचना की की राव रिड़मल का मंडोर पर आसानी से अधिकार हो गया।
विक्रम संवत 1500 के लगभग श्री करणी जी के श्वसुर केलुजी का स्वर्गवास हो गया। विक्रम संवत 1511 में ज्येष्ठ शुक्ला 13 को श्री करणी जी के पति श्री देपाजी का भी स्वर्गवास हो गया। श्री करणी जी ने विधवा का भेष धारण कर लिया। इसके पश्चात करणी जी ने देपासर ,तन्ढसर में कुए खुदवाये । विक्रम संवत 1515 में जोधपुर दुर्ग का शिलान्यास किया। यह कार्य करने के बाद उन्होंने सुंधा पर्वत की यात्रा की और वापिस चली आई। यह समय संवत 1516 का था।
बीकानेर राज्य की स्थापना
कुंवर बीका बीकानेर राज्य के संस्थापक थे एवम इस राज्य की स्थापना में पग पग पर श्री करणी जी का सहयोग उन्हें प्राप्त था। ये राव जोधा के पुत्र थे ये श्री भैरव व श्री करणी जी के उपासक थे। नवीन राज्य की स्थापना की इच्छा लिए इन्होंने विक्रम संवत 1522 में दशहरे की पूजा की और भैरूजी की मूर्ति साथ लेकर उसी दिन अपने चाचा कांधल के साथ उन्होंने जोधपुर छोड़ दिया। राज्य स्थापना के प्रयास करने से पहले वे देशनोक आये। बीकाजी ने कोडमदेसर में भैरूजी की मूर्ति स्थापित की व श्री करणी जी का वहाँ पर नए राज्य की स्थापना का आशीर्वाद लेकर निवास करने लगे। राती घाटी वह स्थान है जहां नागौर, अजमेर व मुल्तान के प्राचीन मार्ग मिलते है इसी स्थान को श्री करणी जी ने बीकानेर राज्य का गढ़ बनाने के लिए चुना व विक्रम संवत 1542 में नगर की नींव का पत्थर रखा गया ।बैशाख शुक्ल पक्ष दूज शनिवार के दिन विक्रम संवत 1545 का वह महत्वपूर्ण दिन था जिस दिन नए राज्य बीकानेर के गढ़ की प्रतिष्ठा हुई।
विक्रम संवत 1594 के अश्विन माह में श्री करणी जी ने 151 वर्ष की आयु प्राप्त की व अपनी बहिनों से मिलने खारड़ा नामक स्थान पर गयी। विक्रम संवत 1595 की चैत्र शुक्ल चौदहस को फाल्गुनी नक्षत्र के योग में माताजी की बनाई हुई गुफा में मूर्ति स्थापित की गई।मूर्ति का मुंह लंबा है बांये हाथ मे नरमुंड माला पहने हुए है। दोनों हाथों में चुडिया बनाई हुई है। पूरी मूर्ति सिंदूर से ढकी रहती है। मूर्ति धरती से चार अंगुल ऊंची है व इसके चारों और चूहे/काबे अठखेलिया करते रहते है। पवित्र सफेद काबा माताजी की ज्योति के पास ही रहता है। वही छोटे छोटे सफेद काबे और भी है जिनके दर्शन मंदिर परिसर में भाग्यशाली लोगों को ही होते है।
यात्रा से लौटकर माताजी ने गढ़ यात्रा और गिरझार नाम के गांव के बीच स्थित धनेरू तलाई की और अपने पुत्र पुष्यराज सहित विक्रम संवत 1595 की चैत्र शुक्ल एकम को देशनोक से प्रस्थान किया और नवम के दिन वे तलाई के किनारे पहुंच गई। तलाई से कुछ ही दूर पर उन्होंने रथ को रोक दिया व अपने पुत्र पुष्यराज से स्नान करने की इच्छा प्रगट की। पुष्यराज ने साथ लाये हुए मटकों में पानी नही होना पाया तो श्री करणी जी ने पुष्यराज को तलाई की और पानी लेने के लिए भेज दिया। पुष्यराज पानी लेने गया तो उन्होंने एक सेवक से पूछा कि क्या घड़े में कुछ बूंद पानी है। तो सेवक ने कहा कि एक घड़े में कुछ बूंद पानी है। उन्होंने सेवक को पानी अपने सिर पर डालने की आज्ञा दी,।उस समय माताजी पद्मासन लगाकर बैठी हुई थी एवम सूर्य भगवान की तरफ देख रही थी। सिर पर पानी की दो बूंद गिरते ही एक दिव्य ज्योति प्रगट हुई व उनका शरीर ज्योति में विलीन हो गया। जब पुष्यराज पानी लेकर लौटा तो सेवक से सारी घटना मालूम हुई। उसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम लोग देशनोक चले जावो वहां पर एक अंधा खाती मेरी मूर्ति लिए गुफा के बाहर सोता हुआ मिलेगा तुम उस मूर्ति को उसी गुफा में स्थापित कर देना।
प्रति वर्ष नवरात्रा में श्री करणी जी के देशनोक मंदिर में मां के दर्शनार्थ लाखों की तादाद में बीकानेर, जोधपुर व देश के सभी हिस्सों से भक्तगण आते है। वैसे तो प्रतिदिन हजारों की तादाद में भक्तगण यहां मां करणी जी दर्शन करने आते हैं। माँ करणी जी का बीकानेर व आस पास की पावन धरा पर आशीर्वाद है आज इस मंदिर को पूरे देश व विश्व मे चूहों/काबों वाली माताजी के नाम से जाना जाता है। मंदिर हर समय खुला रहता है। हर समय यहां हजारों लोग दर्शन करने आते है। जय माँ श्री करणी जी की। -चौरू लाल सुथार, सामाजिक कार्यकर्ता, सोनगिरि वेल, नया शहर, बीकानेर



















