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माड गायिका अल्‍लाह जिलाई की कहानी, उनकी पोती की जुबानी : जिनसे मैंने निडर होकर जीना, सिर उठाकर चलना और अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा

बीकानेर Abhayindia.com कुछ आवाज़ें मनोरंजन करती हैं, कुछ दिल को छू जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो किसी पूरी सरज़मीं की पहचान बन जाती हैं। मेरी परदादी, पद्मश्री अल्लाह जिलाई बाई की आवाज़ ऐसी ही थी। मगर मेरे लिए वे सिर्फ राजस्थान की मशहूर माड गायिका नहीं थीं, जिनके सुरों का जादू देश-विदेश के लोगों पर छाया रहता था। वे मेरी जाई माँ थीं। वह शख्सियत, जिसने मुझे हिमत, आत्मनिर्भरता, इंसानियत, ईमान और बेख़ौफ़ होकर जीने का सलीका सिखाया। मुझे आज भी थार के रेगिस्तान की एक सर्द शाम याद है। आसमान तारों से जगमगा रहा था, चाँद अपनी पूरी रौनक़ में था और रेत के विशाल धोरों के बीच उनकी आवाज़ कुछ इस तरह गूँज रही थी, मानो पूरा रेगिस्तान उनके सुरों के साथ साँस ले रहा हो। गीत ख़त्म होते ही तालियों की गडग़ड़ाहट से माहौल गूँज उठा। सामने सफ़ेद सूती साड़ी, गहरे रंग की किनारी और करीने से बंधे सफ़ेद बालों में एक छोटी-सी क़द-काठी की महिला खड़ी थीं। वह थीं अल्लाह जिलाई बाई। स्थानीय लोग हों, विदेशी सैलानी हों या उनके साथ संगत करने वाले कलाकार, हर कोई उनकी शख्सियत और आवाज़ का मुरीद था। यह तस्वीर आज भी मेरे ज़ेहन में वैसी ही महफ़ूज़ है। वह आवाज़ जिसे माइक की ज़रूरत नहीं थी। अल्लाह जिलाई बाई का जन्म नबी बख्‍श और अलीमीन के घर हुआ। वे उनकी चौथी संतान थीं, मगर जीवित बचने वाली इकलौती संतान। माता-पिता ने उनका नाम अल्लाह जिलाई रखा, यानी जिसे अल्लाह ने जि़ंदगी बख़्शी हो। उन्हें या मालूम था कि यह बच्ची एक दिन राजस्थान की सबसे अज़ीज़ और मशहूर आवाज़ों में शुमार होगी। उनकी गायकी में एक अलौकिक कशिश थी। मुझे हमेशा हैरानी होती थी कि दूसरे गायकों की तरह वे रोज़ाना रियाज़ नहीं करती थीं, फिर भी उनकी आवाज़ में ऐसी गहराई, ऐसी बुलंदी और ऐसा असर था कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता था।

दमदार थी आवाज, लंदन 
में हटाने पड़े माइक्रोफोन

जुलाई 1987, लंदन के मशहूर एलिज़ाबेथ हॉल में उनके कार्यक्रम के कि़स्से आज भी सुनने को मिलते हैं। बताया जाता है कि उनकी आवाज़ इतनी बुलंद और दमदार थी कि तकनीकी टीम को उनके सामने रखे माइक्रोफ़ोन हटाने पड़े। उनकी आवाज़ पूरे सभागार में बिना किसी मदद के गूँज रही थी। वहाँ मौजूद अलग- अलग देशों के लोग उनकी गायकी से इतने प्रभावित हुए कि कई की आँखें नम हो गईं। भाषा कभी उनके और उनके श्रोताओं के बीच दीवार नहीं बनी। लोग राजस्थानी समझें या न समझें, उनके सुर सीधे दिल तक पहुँचते थे। भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्मश्री से समानित किया।

सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक
समान राजस्थान रत्न से नवाज़ा

वर्ष 1988 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला और 2012 में राजस्थान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक समान राजस्थान रत्न से नवाज़ा। ये समान उस महान गायिका की उपलधियों का प्रमाण हैं, लेकिन उन्हें कऱीब से जानने वालों के लिए वे इससे कहीं बढ़कर थीं। मेरी जाई माँ, मेरे बचपन की हमसफऱ मेरे पिता डॉ. अज़ीज़ अहमद सुलेमानी उनके सबसे चहेते नवासे थे और मैं उनकी पहली परपोती। मेरा बचपन उनके प्यार और दुलार के साये में गुजऱा। मुझे याद है, जैसलमेर के मरु महोत्सव में जब वे गाती थीं, तो मैं उनकी गोद में सो जाया करती थी। बीकानेर में दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में भी मैं उनके साथ थी। वे मुझे स्कूल बस के स्टॉप तक छोडऩे जातीं और बस के कंडक्‍टर को ख़ास हिदायत देतीं कि बच्ची का खय़ाल रखना। जब मैं दसवीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रही थी, तब सर्दियों की सुबह पाँच बजे मुझे गणित की ट्यूशन के लिए जगाना भी उन्हीं का काम था। मेरे पुरुष शिक्षक पढ़ाते और वे पास बैठकर निगरानी करतीं। मेरी पढ़ाई, मेरे नतीजे और मेरी कामयाबी की फि़क्र उन्हें हमेशा रहती थी। जयपुर आकाशवाणी में उनकी रिकॉर्डिंग होती तो हम अक्‍सर ट्रेन से सफऱ करते। उन यात्राओं की यादें आज भी मेरे दिल के बेहद कऱीब हैं। बिस्तर, पानी के लिए सुराही और सफऱ का सामान साथ लेकर चलना एक अलग ही अनुभव था। वे अपनी बिछावन ट्रेन की सीटों के बीच फ़र्श पर लगा लेतीं, ताकि मैं पूरी बर्थ पर आराम से सो सकूँ। वापसी में सूडसर स्टेशन पर पकौड़े और रबड़ी खऱीदना जैसे हमारी यात्रा का एक ज़रूरी हिस्सा था। आज सोचती हूँ तो दिल में एक कसक उठती है कि काश, मैं कुछ साल पहले पैदा हुई होती और उनके साथ दुनिया के और भी शहरों का सफऱ कर पाती।

जाई माँ से मिला नारीवाद का पहला सबक

नारीवाद का पहला सबक़ मुझे अपनी जाई माँ से मिला आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस होता है कि नारीवाद और महिला सशक्तीकरण के मेरे शुरुआती सबक़ मुझे किसी किताब या कक्षा से नहीं, बल्कि अपनी जाई माँ के जीवन से मिले थे। वे अक्‍सर बड़े फख्र से कहती थीं, ‘मैं अपनी कमाई खाती हूँ। किसी पर निर्भर नहीं हूँ। मेरी जि़ंदगी के फ़ैसले कोई दूसरा यों करे?’ उनका मानना था कि औरत का आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद ज़रूरी है। वे समझती थीं कि निर्भरता सिर्फ पैसों की नहीं होती, बल्कि अपने छोटे-बड़े फ़ैसलों, ज़रूरतों और इच्छाओं के लिए दूसरों का मोहताज होना भी एक तरह की बेबसी है। मेरे जन्म का एक कि़स्सा आज भी हमारे परिवार में बड़े गर्व से सुनाया जाता है।

डरना है तो सिर्फ ग़लत
काम करने से डरो

सत्‍तर के दशक की शुरुआत में जब मेरा जन्म हुआ, तो परिवार में बेटे की उमीद की जा रही थी। लेकिन दाई ने जब बताया कि लड़की हुई है, तो जाई माँ ने नारियल, मिठाइयाँ और चाँदी का सिक्का बाँटकर ख़ुशी मनाई। उन्होंने मेरे जन्म को उसी तरह जश्न में बदला, जैसे उस दौर में बेटे के जन्म पर मनाया जाता था। मैंने उन्हें अपनी माँ के साथ भी मज़बूती से खड़े देखा। जब घर में कोई मेरी माँ पर नाराज़ होता, तो वे उनका भावनात्मक सहारा बनतीं और बीच-बचाव करतीं। वे बेहद बेख़ौफ़ थीं। किसी को ग़लत करते देखतीं तो टोकने से पीछे नहीं हटती थीं। बड़े-बड़े सरकारी अफ़सर भी उनकी साफग़ोई से अछूते नहीं थे। मैं कभी पूछती कि माँ, अगर कोई आप पर चिल्ला दे तो? वे पूरे आत्मविश्वास से कहतीं, ‘ यों चिल्लाएगा? मेरी मजाल है कि कोई ऐसा कर सके! मैं अल्लाह जिलाई हूँ, कोई आम औरत नहीं।’ उनका जीवन-दर्शन बहुत सीधा था- सच्चाई से जीओ, ग़लत काम मत करो और किसी से डरो मत। वे कहती थीं, ‘अल्लाह के सिवा किसी से डरने की ज़रूरत नहीं। डरना है तो सिर्फ ग़लत काम करने से डरो।’ उनका दिया हुआ एक सबक़ आज भी मेरे साथ है- निर्भय रहो, मान रखो और सिर ऊँचा करके जियो। अपनी मिट्टी से मोहब्‍बत और अपने रब पर यक़ीन जाई माँ बेहद मज़हबी थीं। पाँचों वक्‍त की नमाज़ अदा करतीं, रमज़ान के रोज़े रखतीं और अस्र से मग़रिब के बीच ख़ामोशी इख्तियार करतीं। उनका अपने रब से गहरा रिश्ता था।

बीकानेर छोड़ने से कर दिया था इनकार

वे मानती थीं कि सच्चे दिल से माँगी गई दुआ और नेक नीयत में बड़ी ताक़त होती है। लेकिन उनका अपनी मिट्टी से रिश्ता भी उतना ही गहरा था। बँटवारे के समय जब उनके कई रिश्तेदार सरहद पार चले गए, तब उन्होंने बीकानेर छोडऩे से इनकार कर दिया। वे उसी ज़मीन पर रहना चाहती थीं जहाँ उनके पुरखों की क़ब्रें थीं, जहाँ उनकी यादें और उनकी पहचान बसी थीं। वे कहा करती थीं, ‘अपना घर छोड़कर कहाँ जाते बेटा? अपनी मिट्टी, अपना वजूद, सब यहीं है।’ महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से वे बेहद प्रभावित थीं। मुझे याद है, जब इंदिरा गांधी की हत्या की ख़बर आई, तो वे टेलीविजऩ के सामने फूट-फूटकर रोई थीं। कई दिनों तक सदमे से खाना तक नहीं खा पाईं। उनकी देशभक्ति किसी बड़े भाषण में नहीं, बल्कि अपने मुल्क और उसकी मिट्टी से गहरे जुड़ाव में दिखाई देती थी। वे एक जिज्ञासु और जागरूक महिला भी थीं। दोपहर में हिंदी अख़बार को शद-दर-शद पढऩा उनका रोज़ का मामूल था। रेडियो पर सिंधी समाचार, धीमी गति के समाचार और यहाँ तक कि अंग्रेज़ी में क्रिकेट की कमेंट्री सुनना भी उन्हें पसंद था। उम्र के साथ उनकी जानने-समझने की ललक कभी कम नहीं हुई।

आर्थिक तंगी से गुजरा बचपन,
नवासे को बनाया डॉक्‍टर

एक ऐसी परदादी, जिन्होंने अगली पीढ़ी के सपनों को पंख दिए उनके व्यक्तित्व का एक और पहलू मेरे पिता से जुड़ी एक घटना में दिखाई देता है। मेरे पिता का बचपन आर्थिक तंगी में गुजऱा। घर में कभी-कभी अनाज तक की कमी हो जाती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद जाई माँ ने उनकी पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। वे चाहती थीं कि उनका नवासा पढ़- लिखकर ऐसा डॉक्‍टर बने जो लोगों का इलाज कर सके। 1959 में जब मेरे पिता ने मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेडिकल कॉलेज में अध्यापन का काम करने का फ़ैसला किया, तो जाई माँ ख़ुश नहीं हुईं। उनका मानना था कि उन्होंने उन्हें डॉक्‍टर बनाने के लिए पढ़ाया है, ताकि वे मरीज़ों का इलाज कर सकें, न कि केवल कक्षा में पढ़ाएँ। उन्होंने तुरंत ताँगा बुलवाया, पिता को साथ बिठाया और मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल के.डी. गुप्ता के कमरे में जा पहुँचीं। हाथ जोड़कर, मगर पूरे आत्मविश्वास के साथ उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने नवासे को मेडिकल कॉलेज में इसलिए दाखि़ल करवाया था कि वह लोगों का इलाज करने वाला डॉक्‍टर बने। वे नहीं चाहती थीं कि वह केवल पढ़ाने तक सीमित रह जाए। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मेरे पिता की मेहनत रंग लाई। पिता ने एमडी की डिग्री हासिल की, गोल्ड मैडल प्राप्त किया और आगे चलकर प्रोफ़ेसर ऑफ़ मेडिसिन के पद से सेवानिवृत्‍त हुए। वे एक जाने-माने चिकित्सक भी बने।

आवाज़ ख़ामोश हुई, मगर 
सबक़ आज भी जि़ंदा हैं

जाई माँ ने शायद ख़ुद औपचारिक शिक्षा के अधिक अवसर नहीं पाए, लेकिन वे शिक्षा की ताक़त को बख़ूबी समझती थीं। वे जानती थीं कि अगली पीढ़ी के सपनों को पूरा करने के लिए हौसला और मौक़ा देना कितना ज़रूरी है। कुछ छोटी-छोटी बातें, जो उन्हें और अपना बनाती थीं जाई माँ को घर का खाना खाते-खाते कभी- कभी ऊब हो जाती थी। फिर वे किसी न किसी बहाने मेरी दादी माँ से नोकझोंक कर लेतीं और घर का खाना खाने से इनकार कर देतीं। इसके बाद बीकानेर रेलवे स्टेशन के पास मशहूर छोटू-मोटू जोशी की दुकान से पूरी-आलू और मेथी की सज़ी मँगवाई जाती। उन्हें कोका-कोला भी बेहद पसंद थी। उनकी संगत करने वाले कलाकार भी उनकी संगीत यात्रा का अहम हिस्सा थे। उस्ताद हनीफ़ ख़ान, दयाम अली क़ादरी, सितार पर मुंशी जी, हारमोनियम पर नजऱ मोहमद और सारंगी पर उस्ताद फख़़रुद्दीन जैसे कलाकारों की यादें आज भी परिवार में बड़े समान से साझा की जाती हैं। आवाज़ ख़ामोश हुई, मगर सबक़ आज भी जि़ंदा हैं, 3 नवबर 1992 को दुनिया ने उनकी उस जादुई आवाज़ को आखिऱी बार सुना।

माड गायकी बन गई राजस्थान की 
सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा

उनकी 34वीं पुण्यतिथि पर मैं उस महान गायिका को याद कर रही हूँ, जिसकी माड गायकी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गई। लेकिन मैं सिर्फ उस गायिका को याद नहीं कर रही, जिसने दुनिया भर में अपनी आवाज़ से लोगों का दिल जीता। मैं उस औरत को याद कर रही हूँ, जिसने अपने परिवार की पीढिय़ों को हिमत, आत्मसमान और इंसानियत की विरासत सौंपी। मैं आज एक विकास क्षेत्र की पेशेवर हूँ और लड़कियों की शिक्षा, महिलाओं के नेतृत्व और लैंगिक समानता के मुद्दों पर काम करती हूँ। जब अपने काम और जीवन को पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो महसूस होता है कि जिन मूल्यों की बात मैं आज पेशेवर तौर पर करती हूँ, उनकी पहली झलक मुझे अपनी जाई माँ के जीवन में ही मिली थी।

उन्होंने नारीवाद, लैंगिक समानता या सशक्तीकरण जैसे शदों का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने इन मूल्यों को जिया। पद्मश्री और राजस्थान रत्न के समान एक महान कलाकार की उपलधियों को दर्शाते हैं, लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी पहचान वह महिला है, जिसने बेटी के जन्म पर जश्न मनाया, अपनी कमाई पर फख्र किया, ग़लत के सामने आवाज़ उठाई और मुझे सिर उठाकर जीना सिखाया। उनकी आवाज़ भले ही ख़ामोश हो गई हो, मगर उनके दिए हुए सबक़ आज भी मेरे भीतर गूँजते हैं। जाई माँ, आपका संगीत राजस्थान की अमानत है। आपका हौसला हर उस औरत की ताक़त है, जो अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है। और आपका प्यार हमेशा मेरे दिल में जि़ंदा रहेगा। -शबनम अज़ीज़, पहल प्रमुख, सेंटर फॉर केटेलाइजिंग चेंज (सी-3) शिक्षा, नई दिल्ली (लेखिका अल्‍लाह जिलाई बाई की पोती हैं)

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