Friday, April 24, 2026
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महाशिवरात्रि पर्व पर बनेंगे दुर्लभ संयोग, जानिये- चारों प्रहर की पूजा के मुहूर्त का समय…

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*शिवस्य प्रिया रात्रिर्यस्मिन् व्रते अंगत्वेन विहिता तद् व्रतं शिवरात्र्याख्यम्। शिवजी को जो प्रिय है ऐसी रात्रि, सुख-शांति-माधुर्य देने वाली, शिव की वह आनंदमयी, प्रिय रात्रि जिसके साथ व्रत का विशेष संबंध है, वह है शिवरात्रि और वह व्रत शिवरात्रि का व्रत कहलाता है। जीवन में अगर कोई-न-कोई व्रत नहीं रखा तो जीवन में दृढ़ता नहीं आयेगी, दक्षता नहीं आयेगी, अपने-आप पर श्रद्धा नहीं बैठेगी और सत्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती है, ‘यजुर्वेद’ में आता है -: व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्। दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते।। यह शिवरात्र जैसा पवित्र व्रत आपके मन को पुष्ट व पवित्र करने के लिए, मजबूत करने के लिए आता है। आपको महान बनने का और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर देता है, इनमें किया गया जप- तप- ध्यान अनंत गुना पुण्य-फल देता है।

महाशिवरात्रि में रात्रि-पूजन
का विधान क्यों?

महाशिवरात्रि की रात्र को चार प्रहर की पूजा का विधान है। प्रथम प्रहर की पूजा दूध से, दूसरी दही से, तीसरी घी से और चौथी शहद से सम्पन्न होती है। इसका भी अपना प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य है। हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक – चारों स्थितियाँ उन्नत हों इसलिए पूजा का ऐसा विधान किया गया।

इस महाशिवरात्रि के व्रत में रात ही पूजन क्यों? यह पूजन रात्रि में इसलिए है क्योंकि एक ऋतु पूरी होती है और दूसरी ऋतु शुरु होती है। जैसे सृष्टिचक्र में सृष्टि की उत्पत्ति के बाद नाश और नाश के बाद उत्पत्ति है, ऐसे ही ऋतुचक्र में भी एक के बाद एक ऋतु आती रहती है। एक ऋतु का जाना और नई ऋतु आरम्भ होना – इसके बीच का काल यह मध्य दशा है। (महाशिवरात्रि शिशिर और वसंत ऋतुओं की मध्य दशा में आती है) इस मध्य दशा में अगर जाग्रत रह जायें तो उत्पत्ति और प्रलय के अधिष्ठान में बैठने की, उस अधिष्ठान में विश्रांति पाने की, आत्मा में विश्रांति पाने की व्यवस्था अच्छी जमती है। इसलिए इस तिथि की रात्र ‘महाशिवरात्र’ कही गई है।

सनातन धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस दिन माता पार्वती व भगवान शिव की विधिवत पूजा करने के साथ व्रत- उपवास रखने का विधान है। मान्यता है कि इस दिन शिवलिंग में मात्र जलाभिषेक करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं और अपने साधकों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

निशिथ काल का समय -: 15-16 फरवरी को निशिथ काल मध्य रात्रि 12 बजकर 9 मिनट से लेकर 01 बजे तक

प्रथम प्रहर के पूजन का समय -: 15 फरवरी को शाम 6 बजकर 01 मिनट से लेकर रात 9 बजकर 09 मिनट तक

दूसरे प्रहर के पूजन का समय –: 15 फरवरी को रात 9 बजकर 09 मिनट से 16 फरवरी को अर्धरात्रि 12 बजकर 17 मिनट तक

तीसरे प्रहर के पूजन का समय -: 15-16 फरवरी को अर्धरात्रि 12 बजकर 17 मिनट से तड़के सुबह 3 बजकर 25 मिनट तक

चौथे प्रहर के पूजन का समय –: 16 फरवरी को सुबह 3 बजकर 25 मिनट से सुबह 6 बजकर 15 मिनट तक

महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक का मुहूर्त -: महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग का जलाभिषेक करने का विशेष महत्व है। इस साल महाशिवरात्रि के दिन जलाभिषेक सुबह के समय से ही कर सकते हैं और संपूर्ण दिन कर सकते हैं। यदि आप कुछ विशेष मुहूर्त में जलाभिषेक करना चाहते हैं तो निम्न प्रकार कर सकते हैं-:

सुबह के शुभ मुहूर्त

चर – सुबह 8.24 – सुबह 9.48

लाभ – सुबह 9.48 – सुबह 11.11

अमृत – सुबह 11.11 – दोपहर 12.35

शाम का शुभ मुहूर्त

शुभ – शाम 6.11 – रात 7.47

अमृत – शाम 7.47 – रात 9.23

चर – रात 9.23 – रात 10.59

शिव साधना के दिन दुर्लभ संयोग : महाशिवरात्रि इस बार बहुत ही विशेष मानी जा रही है। दरअसल, इस दिन शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग, व्यतिपात पुण्य काल और वरियान योग का प्रभाव रहेगा।

शिवपूजा का तात्त्विक रहस्य

ऋषियों ने, संतों ने बताया है कि बिल्वपत्र का गुण है कि वह वायु की बीमारियों को हटाता है और बिल्वपत्र चढ़ाने के साथ रजोगुण, तमोगुण व सत्त्वगुण का अहं अर्पण करते हैं। पंचामृत मतलब पाँच भूतों से जो कुछ मिला है वह आत्मा परमात्मा के प्रसाद से है, उसको प्रसादरूप में ग्रहण करना। और महादेव की आरती करते हैं अर्थात् प्रकाश में जीना। धूप-दीप करते हैं अर्थात् अपने सुंदर स्वभाव सुवास फैलाना।

कल्याण का देव महादेव

शिव का अर्थ है कल्याणकारी। शिव ने सृष्टि के कल्याण के लिए ही समुद्रमंथन से उत्पन्न विष को अपने कंठ में उतारा और नीलकंठ बन गए। शिव का जो कल्याण करने का भाव है, वही शिवत्व कहलाता है। शिवोहम् का उद्घोष वही व्यक्ति कर सकता है, जो अपने भीतर इस शिवत्व को धारण कर लेता है। उसे अपने आचार-व्यवहार में उतार लेता है।

महाशिवरात्रि पर शिव की उपासना तभी सार्थक होती है, जब हम दूसरों के कल्याण के लिए विष पीने को तैयार रहें अर्थात दूसरे के कष्टों के निवारण व सहयोग के लिए तत्पर रहें, इसी तरह हम शिवतत्व प्राप्त कर सकते हैं और शिव के आशीर्वाद के हकदार बन सकते हैं। महाशिवरात्रि में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, अतः रात्रि जागरण करना चाहिए शिव का ध्यान करना चाहिए और भगवान शिव की स्तुति व मंत्रों का जाप करना चाहिए। –मोहित बिस्सा, ज्योतिषाचार्य

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