






बीकानेर Abhayindia.com “रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत, जीमो म्हारी चिड़िया भर-भर पेट…”, “बाबा थारी बकरियां बिदाम खावै रै…” सरीखे कालजयी गीत लिखने वाले बीकानेर के सुप्रसिद्ध कवि-गीतकार मोहम्मद सदीक भाटी की 2 जुलाई को 27वीं पुण्यतिथि पर जूम मीटिंग का आयोजन किया जा रहा है। इसका संयोजन जनकवि सदीक की पोती कौसर भुट्टो करेंगी।
जूम मीटिंग में लक्ष्मी शंकर वाजपेई, डॉ. आरती “लोकेश”, प्रहलाद सिंह झोरड़ा, संजय पुरोहित, डॉ. दिनेश जांगिड़, डॉ. सीमा उपाध्ये, डॉ. रामा तक्षक और कौशल अवस्थी शामिल होंगे। इसका समय शाम साढे सात बजे से नौ बजे रहेगा।

मोहम्मद सदीक : संक्षित परिचय
बीकानेर पले बढे हिन्दी व राजस्थानी के कवि और गीतकार मोहम्मद सदीक का जन्म 11 सितम्बर 1937 को नागौर जिले के गोठ गांव में हुआ था। उनके लिखे गीत आम जनमानस की जुबां पर आज भी चढे है। असल में, उनके गीतों में लोक जीवन और संवेदना साफतौर पर परिलक्षित होती है। मोहम्मद सदीक राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर के सदस्य भी रहे थे। उनकी कविताओं का अंतरप्रांतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है और वे राजस्थान शिक्षा बोर्ड की कक्षा 12वीं की राजस्थानी पद्य पुस्तक में भी शामिल हैं। धरती रा लाडेसर, मांयलो अमूजो, गूंग री घून्ट, ऊंग मत, धरती धकेल, गुवाड़ रो जायो, होकड़ा उतार, चौफेर, टिल्लो, मौसमी कूकड़ा उनकी लोकप्रिय रचनाएं हैं।
आज भी सब गुनगुनाते हैं... "थे मजा करौ म्हाराज..."
थे मजा करौ म्हाराज! आज थारी पांचूं घी में है
म्हैं पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब कांई जी में है?
गळी गळगळी होय, गांव री बिलखै साख भरै
भोळा ढाळा जीव, जीण री झूठी आस करै
लुच्चा लूटै माल, मसकरा मीठौ नास करै
कुत्ता खावै खीर, मिनख तौ बोदी घास चरै
गांव में लागण लागी आग, घरां में दीखै भागम भाग
टाबरां गायौ रोटी राग, कमावणियां रै आग्या झाग
पण थे मजा करौ म्हाराज! आज थांरी पांचूं घी में है
म्हैं पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब कांई जी में है?
पीड़ पाळतू कर लेवै, पण मेखां रोज जड़ै
मिनख-मांस रा बिणजारा, बातां रा महल घड़ै
अबळा मांग मिटै दिन धोळै चूड़ी रोज झड़ै
फळसौ खुल्लौ छोड़ दियौ जद डांगर आय बड़े
गांव रै कुवै पड़गी भांग, बांदरा लड़सी सांगोपांग
सराफत झूठौ भरसी सांग, लाज री खुल्ली दीखै जांघ
पण थे मजा करौ म्हाराज! आज थांरी पांचूं घी में है
म्हैं पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब कांई जी में है?
सदा सरीसा दिन बीतै, बिरथा ही जूण गमावै
तिल-तिल जीणौ भारी पड़ग्यौ, सांस काळजौ खावै
लाजां लाज मरै सड़क पर, जणौ-जणौ बतळावै
बादळ बूंद बणै जद बरसै, ओळा क्यूं बरसावै
सूरड़ा दे मिनखां नै मार, चोरटा देवै खुल्ली धार
समय री माया अपरमपार, आपणी बस्ती ठंडी ठार
पण थे मजा करौ म्हाराज! आज थारी पांचूं घी में है
म्हैं पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब कांई जी में है?
सतजुग री बातां रा सपना, अणदेख्या रै जावै
सुख-सपनौ लै घर स्यूं चालै, दुख-दाळद लै आवै
माथै चढग्या भाव बेगड़ा, जिनस जीव नै खावै
कवि करै कुचमाद, मिनख नै मांदा गीत सुणावै
घणा-सा बेरुजगारा लोग, पसरग्या घर-घर में बण रोग
घरां नै घेरयां राखै सोग, जीवता दीखै मरणै जोग
पण थे मजा करौ म्हाराज! आज थारी पांचूं घी में है
म्हैं पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब कांई जी में है?
अणभणिया आखर बूझैला, कुण बांरी बात करै
ऊंचै आसण बैठणियां, नित नूवौ घात करै
बिना साख रा सौदागर, बिन खेल्यां मात करै
बैलां बाळ उजाळौ करलै, दिन में रात करै
आंख रौ देखण सारू काम, जीभ तौ अेक टकै री चाम
टसकता दीखै जाया जाम, काढसी बापूजी रौ नाम
पण थे मजा करौ म्हाराज! आज थांरी पांचूं घी में है
म्है पुरस्यौ सगळौ देस, बता– अब काई जी में है?


