Saturday, June 20, 2026
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भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की मूल अवधारणा पर होना चाहिए चिंतन

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बीकानेर Abhayindia.com हमारी भारतीय परंपराओं में उत्सवोंं, मेलों व आध्यात्मिक उत्सवों अथवा आध्यात्मिक त्योहारों का विशेष महत्व है लेकिन कहीं-कहीं आडंबर इतना प्रभावित हो गया है कि मूल आध्यात्म खो गया। ऐसा ही एक आध्यात्मिक उत्सव आगामी अष्टमी को है जिसे हम भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मानते हैं। लेकिन, माने ना माने मेरा यह व्यक्तिगत विचार है लेकिन समाज चिंतन अवश्य करें। मित्रों, इस धरती पर जैसी हमारी धारणा है जब-जब धर्म की हानि होती है प्रभु अवतरित होते हैं हालांकि अलग-अलग युगों में परमात्मा ने अलग-अलग रूप में अवतार लिया है लेकिन हम सभी का आयोजन नहीं करते।

वह सर्व शक्तिमान चाहे जब चाहे जिस रूप में आता है लेकिन उसके आगमन एवं उसके आगमन के उद्देश्य पर हम चिंतन मनन नहीं करके उसे व्यक्तिगत संपत्ति एवं व्यापार बना लेते हैं और यही समाज में विभेद का कार्य करता है। अब अगर थोड़ा सा चिंतन करें भगवान नरसिंह आए बिल्कुल दिन के समय पूर्ण शक्ति के रूप में प्रभु राम आए अवतरण का समय “मध्य दिवस अतिशीत न धामा”, साथ ही साथ घोषणा भी थी “गो द्विज धेनु देव हितकारी कृपा सिंधु मानुस तन धारी।” असुरों का नाश एवं धर्म की स्थापना। साथ ही साथ तुलसीदास जी लिखते हैं प्रभु श्री राम के अवतरण पर अयोध्या में लंबे समय तक उत्सव चले। तुलसीदासजी तो यहां तक लिखते हैं मास दिवस कर दिवस भा। अर्थात उत्सव इस प्रकार चले की एक महीने तक रात हुई या नहीं पता ही नहीं चला।

अब जन्माष्टमी की चर्चा। भगवान श्रीकृष्ण भी 16 कला पूर्ण सर्वशक्तिमान परमपिता है। लेकिन, जन्म की स्थिति प्रभु लीला में ऐसी बनी कि ढोल नगाड़े शंख आदि तो क्या किसी ने थाली और ताली भी नहीं बजाई। प्रभु के आगमन की सुखद अनुभुति केवल तीन लोगों को हुई यहां तक की माता यशोदा को भी जब तक अक्रूर नहीं आए तब तक यह पता नहीं था की जिसे वह पाल रही है वह देवकीनंदन है अथवा यशोदा नंदन। अर्थात प्रभु का आगमन नितांत गोपनीय मध्य रात्रि चहुंओर अंधेरा और हमारी धारणा के अनुसार मध्य रात्रि में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचना पर किसी को जैसा कहते हैं कानों कान खबर नहीं हुई। यदि हम प्रभु की इस लीला का गहन चिंतन करें तो हमें कुछ और ही संदेश मिलता है प्रभु कहते हैं बिल्कुल एकांत मध्य रात्रि मेरे और तेरे सिवाय कोई नहीं। तू मेरा ध्यान कर, बिल्कुल एकांत यम और नियम का पालन। फिर निवेदन यम और नियम का पालन गीता में कहां है जिस रात्रि में गृहस्थ सोता है योगी उस रात्रि में जागता है/ ज्यादा क्या लिखूं बस इस छोटी सी लाइन पर चिंतन हो जाए तो ही बहुत होगा। प्रभु के नितांत एकांत अंधेरी रात्रि के मध्य में आना बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है। पर पता नहीं क्यों हम आडंबरों के चक्कर में और अगर स्पष्ट कहूं तो वर्तमान में हमारे त्यौहारौ पर उत्सवों पर अध्यात्म पर बाजार इतना प्रभावी हो गया है कि हम यथार्थ का चिंतन ही भूल बैठे हैं। मेरा सभी से निवेदन कि भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की मूल अवधारणा पर चिंतन करें और इसी रूप में यम-नियम का पालन करते हुए प्रभु को हृदय में स्थापित करें। -रमेश रंगा, शिक्षाविद्, मुरलीधर व्‍यास कॉलोनी, बीकानेर

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