





बीकानेर Abhayindia.com बीकानेर नगर निगम के चुनाव के नतीजे आने में अब बस कुछ ही घंटे बाकी हैं। कल 14 सितंबर को ईवीएम का पिटारा खुलेगा और तय होगा कि शहर का सरताज कौन होगा। इससे पहले ही भाजपा और कांग्रेस की बाड़ेबंदी में हलचल तेज हो गई है।
खबर है कि केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल आज अचानक जोधपुर पहुंचे हैं। जोधपुर के रिसॉर्ट में जहां भाजपा ने अपने प्रत्याशियों को “प्रशिक्षण” के नाम पर रखा है, वहां पहुंचकर उन्होंने प्रत्याशियों से सीधे संवाद किया। सूत्रों के मुताबिक मेघवाल की मौजूदगी में एक अहम बैठक भी हुई, जिसमें चुनावी नतीजों को लेकर मंथन किया गया। बैठक में बीकानेर पश्चिम विधायक जेठानंद व्यास, संभाग प्रभारी राजेंद्र गहलोत, महावीर सैनी सहित कई पदाधिकारी मौजूद रहे। मतदान के बाद भी आत्मविश्वास में नजर आए थे अर्जुन मेघवाल, अब खुद बाड़ेबंदी में पहुंचकर उन्होंने साफ संकेत दे दिया है कि भाजपा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।
दो जगह से चल रहा 'ऑपरेशन बोर्ड'
- भाजपा का प्लान : एक तरफ मेघवाल जोधपुर में प्रत्याशियों को संभाले हुए हैं, तो दूसरी तरफ बीकानेर में वरिष्ठ नेता गोपाल गहलोत डेरा डाले हुए हैं। उनकी नजर पार्टी के बागी और प्रभावी निर्दलीयों पर टिकी है, जो कल किंगमेकर बन सकते हैं।
- कांग्रेस का दावा : इधर बीकानेर में कांग्रेस की बाड़ेबंदी में पूर्व मंत्री डॉ. बीडी कल्ला, शहर अध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल और यशपाल गहलोत प्रत्याशियों को एकजुटता का मंत्र पढ़ा रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि उनके सारे प्रत्याशी प्रशिक्षण में आ गए हैं, जबकि पहले खबर थी कि कुछ प्रत्याशी बाहर हैं।
असली बाड़ेबंदी कल के बाद
बहरहाल, पार्टी हो या प्रत्याशी, कार्यकर्ता हो या आम मतदाता, सबके जेहन में एक ही सवाल है – शहर का सरताज कौन? राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दोनों ही पार्टियों की सबसे बड़ी बाड़ेबंदी तो कल नतीजों के बाद ही होगी। अगर किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो बागी और निर्दलीयों की डिमांड बढ़ जाएगी। जो पार्टी इन्हें साधने में सफल होगी, वही शहर के सरताज का फैसला करेगी।
क्यों आई बाड़ेबंदी की नौबत? 5 बड़े कारण, जो बना रहे हैं निर्दलीयों को किंगमेकर
1. कांटे का मुकाबला, स्पष्ट बहुमत पर संशय
इस बार बीकानेर में 80 वार्डों पर 373 प्रत्याशी मैदान में हैं। भाजपा जहां हैट्रिक का दावा कर रही है, वहीं कांग्रेस वापसी की हुंकार भर रही है। अंदरूनी रिपोर्ट कह रही है कि कई वार्डों में जीत का अंतर 50 से 200 वोटों का ही है। ऐसे में किसी भी दल को 41 के जादुई आंकड़े पर भरोसा नहीं है।
2. बागी और निर्दलीय बिगाड़ रहे हैं गणित
दोनों ही दलों में टिकट बंटवारे के बाद भारी बगावत हुई। 60 से ज्यादा बागी निर्दलीय के रूप में मैदान में हैं। ये वो चेहरे हैं जो अपने वार्ड में मजबूत पकड़ रखते हैं। यही वजह है कि भाजपा-कांग्रेस दोनों को डर है कि नतीजों के बाद ये निर्दलीय पाला बदल सकते हैं।
3. मेयर का चुनाव है असली खेल
पार्षद का चुनाव सीधा है, लेकिन मेयर का चुनाव अप्रत्यक्ष है। मेयर बनने के लिए पार्षदों के वोट चाहिए। इसलिए बोर्ड बनाने के लिए सिर्फ जीतना काफी नहीं, जीते हुए पार्षदों को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती है। इसी डर से दोनों दलों ने पहले ही बाड़ेबंदी कर दी है।
4. पुराना अनुभव, हुआ था खेला
पिछले चुनावों का इतिहास देखें तो यह पता चलता है कि चुनाव के बाद कई निर्दलीयों ने आखिरी वक्त में पाला बदल दिया था। उसी अनुभव से सबक लेते हुए इस बार दोनों दल कोई रिस्क नहीं लेना चाहते।
5. मतदान प्रतिशत कम होना
इस बार कई वार्डों में मतदान प्रतिशत उम्मीद से कम रहा है। इससे सत्ता विरोधी लहर या समर्थकों की नाराजगी का अंदेशा है। कम वोटिंग ने दोनों दलों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं, इसलिए ‘ऑपरेशन बोर्ड’ पहले ही शुरू करना पड़ा। यही कारण है कि नतीजे आने से पहले ही बीकानेर में ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ शुरू हो गई है और असली लड़ाई अब 14 सितंबर के बाद निर्दलीयों को साधने की होगी। -सुरेश बोड़ा, संपादक, अभय इंडिया







