





जयपुर Abhayindia.com राजस्थान में 309 नगरीय निकायों के लिए दो चरणों में मतदान पूर्ण होने के साथ ही अब प्रदेश की सियासत थम गई है और सबकी नजरें 14 सितंबर को होने वाली मतगणना पर टिक गई हैं। ये चुनाव सिर्फ पार्षद और सभापति बनाने की लड़ाई नहीं है, ये भजनलाल सरकार के पौने तीन साल के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड और 2028 विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल है।
भाजपा के लिए परीक्षा, कांग्रेस के लिए संजीवनी
सूत्रों की मानें तो यह चुनाव भाजपा सरकार के लिए लिटमस टेस्ट है। अगर भाजपा 10 नगर निगमों समेत ज्यादातर निकायों में बोर्ड बनाने में कामयाब रही तो 2028 की राह आसान हो जाएगी। वहीं अगर प्रदर्शन कमजोर रहा तो यह सरकार के लिए सबक होगा कि उसे और मजबूती से काम करना होगा। कांग्रेस के लिए यह चुनाव संजीवनी से कम नहीं है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को शहरी क्षेत्रों में वापसी का मौका मिला है। ये चुनाव सिर्फ भाजपा को रोकने का नहीं, बल्कि ये साबित करने का मौका है कि कांग्रेस शहरी वोट बैंक में फिर से अपनी जमीन बना रही है।
क्यों बढ़ी भाजपा की चिंता? तीन शहरों में कांटे की टक्कर
दोनों चरणों के बाद शहरी मतदाताओं का व्यवहार मौन है, लेकिन दोनों ही दल इसे अपने पक्ष में बता रहे हैं। इसी बीच अंदरखाने से खबर है कि कई निकायों में मतदान प्रतिशत उम्मीद के मुताबिक नहीं रहने से भाजपा की चिंता बढ़ गई है। पहले जिन 10 नगर निगमों में भाजपा एकतरफा बढ़त और आसानी से बोर्ड बनाने का दावा कर रही थी, अब वहां मुकाबला कांटे का हो सकता है। सूत्रों के अनुसार बीकानेर, अजमेर और भरतपुर में पार्टी को बोर्ड बनाने के लिए तगड़ी जोर आजमाइश करनी पड़ सकती है। यहां कम वोटिंग और बागियों के कारण समीकरण बिगड़ गए हैं।
क्या कहते हैं सियासी पंडित?
सियासी पंडितों का मानना है कि 14 सितंबर के नतीजे यह संकेत देंगे कि 2028 की विधानसभा के लिए शहरी वोट बैंक किसके पक्ष में जा रहा है। अगर कांग्रेस ने इन तीन शहरों समेत 30-40% निकायों में भी सेंध लगा दी, तो वह आने वाले विधानसभा चुनाव में और जोश के साथ हुंकार भर सकेगी। फिलहाल ईवीएम में बंद है 309 निकायों का भविष्य और दोनों दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।







