आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर WHO ने बहुत खूबसूरत बात कही है- “उनकी आवाज़ सुनो जिनने इसे जिया है।” इसे कहते हैं – Lived Experience. हम बड़ों के लिए तो ये बात सही है, पर क्या हमने कभी अपने बच्चों और किशोरों की Lived Experience सुनी है? हम OPD में बच्चे को देखते हैं – 14 साल का बच्चा, आँखें झुकी हुईं, माँ कहती है – “डॉक्टर साहब, पढ़ता नहीं है, बदतमीज़ हो गया है, मोबाइल में घुसा रहता है।” पर क्या हमने कभी उस बच्चे से पूछा – बेटा, तुम क्या महसूस कर रहे हो?
उसका Lived Experience कुछ और ही होता है –
“मुझे कोई समझता ही नहीं, सब सिर्फ मार्क्स मांगते हैं।”
“मुझे रात भर नींद नहीं आती, एंग्जायटी होती है।”
“मेरे दोस्तों ने मुझे ग्रुप से निकाल दिया, मैं अकेला हूँ।”
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य में Lived Experience का मतलब क्या है?
इसका मतलब है कि बच्चे को सिर्फ ‘सुनना’ नहीं, बल्कि उसे ‘शामिल’ करना। अक्सर हम बच्चों को बोलने के लिए कहते हैं, पर फैसले हम खुद ले लेते हैं। हम तय कर देते हैं कि उसे कौन सी कोचिंग करनी है, कौन सा करियर चुनना है, कितनी देर मोबाइल देखना है।
सच्चा जुड़ाव तभी होगा जब-
1. हम उन्हें फैसले लेने में शामिल करें।
2. स्कूल और घर के नियम उनके साथ मिलकर बनाएं (Co-design)।
3. Peer Support को बढ़ावा दें – बच्चे बच्चों की बात ज्यादा समझते हैं।
4. Stigma को खत्म करें – “ये तो नाटक कर रहा है, कमजोर दिमाग का है” – ये कहना बंद करें।
बच्चों को बड़े संस्थानों में नहीं, समुदाय और परिवार में ही बेहतर माहौल चाहिए।
WHO इस बार कह रहा है कि बड़ी मानसिक संस्थाओं (Institutions) से बाहर निकलकर समुदाय आधारित देखभाल की ओर जाना है। बच्चों के लिए तो ये और भी सच है। किसी किशोर को डराकर, होस्टल में बंद करके, या सिर्फ दवाइयों से उसका मन ठीक नहीं होगा। उसे चाहिए-
– परिवार में एक सुरक्षित माहौल जहाँ बिना डर के अपनी बात कह सके।
– स्कूल में एक ऐसा शिक्षक जो जज न करे, सुने।
– समुदाय में सही काउंसलिंग और दोस्तों का साथ।
Deinstitutionalization का मतलब बच्चों के लिए है – बच्चे को लेबल मत करो, उसे अलग-थलग मत करो, उसे उसके ही घर, स्कूल और दोस्तों के बीच ही ठीक करो।
इस World Mental Health Day पर मेरा सभी माता-पिता से निवेदन-
सुनने से आगे बढ़िए, Action लीजिए।
आज रात अपने Teenager से सिर्फ एक सवाल पूछिए, बिना किसी ज्ञान के –
“बेटा, आज तुम्हारा मन सच में कैसा है? मैं सिर्फ सुनूंगा, जज नहीं करूंगा।”
यही पहला कदम है। बच्चों के लिए मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था उनके साथ मिलकर बनानी है, सिर्फ उनके लिए नहीं। -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल एवं किशोर स्वास्थ्य विशेषज्ञ



















