भगवान नेमिनाथ व साध्वीश्री सुरप्रिया के जन्मोत्सव पर भक्ति संगीत व नृृत्य

बीकानेर Abhayindia.com जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ की साध्वीश्री मृृगावतीश्रीजी मसा, के सान्निध्य में मंगलवार को रांगड़ी चैक के सुगनजी महाराज के उपासरे में 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ व साध्वीश्री सुरप्रिया का जन्मोत्सव भक्ति संगीत, नृृत्य, जप व तप तथा जीवदया के संकल्प के साथ मनाया गया। छतीसगढ़ जगदलपुर से आए गुरु भक्त व गायक मनोज दुग्गड़ व अनिल बुरड़ व श्रावक श्राविकाओं ने गीतिकाओं के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति दी।

साध्वीश्री मृृगावती ने प्रवचन में कहा कि जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ ने निरीही पशुओं की बली के समय चित्कार सुनकर राजपाठ व शादी का निर्णय छोड़कर संयम मार्ग अपनाकर केवल्य ज्ञान किया। भगवान नेमिनाथ वैराग्य प्रकृृति के थे। नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की पुत्री राजमती से तय हुआ था किन्तु जब बारात नगर सीमा पर पहुंची तो बाड़े में बंद पशुओं की चीत्कार से नेमिनाथ सिहर उठे और संयम मार्ग अंगीकार कर लिया। भगवान नेमिनाथ श्रावण कृृष्ण छठ के दिन सायंकाल के समय तेला का नियम लेकर एक हजार राजाओं के साथ जैनेश्वरी दीक्षा से विभूषित हो गए। बुधवार को उनका दीक्षा कल्याणक मनाया जाएगा।

उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृृृष्ण के चचेरे भाई अंधक वृृष्णि के समुद्र विजय, वासुदेव आदि दस पुत्र और कुंत्रीमाद्री पुत्रियां हुई। समुद्र विजय की रानी शिवा के गर्भ से श्रावण शुल्क पंचमी को शौरीपुर में यदुवंश में भगवान नेमिनाथ का जन्म हुआ। भगवान नेमीनाथ संसार को जीवदया का अनूठा प्रेरणादायक संदेश दिया। भगवान के आदर्शों से प्रेरणा लेकर जीवमात्र की हिंसा से बचे तथा अहिंसा परमोःधर्म को अपनाएं।

उन्होंने कहा कि साध्वीश्री सुरप्रिया ने धर्मधरा बीकानेर में जन्म लेकर संयम मार्ग अंगीकार कर कुल, धर्म तथा भगवान महावीर के शासन की की प्रभावना की है। इन्होंने हजारों किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अपनी गुरुवर्या साध्वीश्री मनोहरश्रीजी का व बीकानेर के नाहटा परिवार का नाम की शोभा में श्रीवृृद्धि की है। अनेक श्रावक-श्राविकाओं को देव, गुरु व धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। झुंझनूं में दीक्षा लेकर 36 वर्षों के बाद छतीसगढ़़ से अपना पहला चातुर्मास करने अपनी जन्म भूमि मरु नगरी में आई है। इनके 56 वें जन्म दिन से प्रेरणा लेकर अंगीकार करते हुए आत्म चिंतन, आत्म निरीक्षण करते हुए संयम मार्ग पर चलें। करीब तीन घंटे चले कार्यक्रम में छतीसगढ़ जगदलपुर से आए गुरु भक्त व गायक मनोज दुग्गड़ व अनिल बुरड़, साध्वीश्री सुरप्रिया के सांसारिक बहनों सोनू भंसाली, मंजू सोनावत, मीनू डागा, विनीता सोनावत, संगीता बच्छावत, साधुमार्गी जैन संघ के सुशील बच्छावत, सुश्री मोक्षा डाकलिया ने राजस्थानी, हिन्दी गीतों की तर्ज पर बधाई गीत ’’ म्हैतो सासरिये कोनी जाऊं म्हारी मां, म्हारो मन लाग्यो संयम में’’, ’’ भंवर प्रेम की राजकुमारी, शासन की श्रृृंगार बनी, धर्म को पाकर किया आत्म उद्धार, छायी खुशियां अपार’’, ’’ नाहटा कुल का मान बढ़ाया, जिन शासन की शान बनी, सेवा, करुणा, दया, विनय और गुरु मां की पहचान बनी’’ और ’’ नेमी प्रभु का जन्मोत्सव आया है, हर दिल में हर्ष मनाया है’’ आदि गीतों के स्वर में स्वर उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने भी मिलाएं। बालिकाओं ने आकर्षक वेशभूषा में भक्ति गीतों के साथ नृृत्य किया।

गुरु भक्त व गायक मनोज दुग्गड़ व अनिल बुरड़ का सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट व चातुर्मास व्यवस्था समिति की ओर से रतन लाल नाहटा, भीखमचंद बरड़िया, आदर्श नाहटा ने श्रीफल, माला आदि से अभिनंदन किया। जगदलपुर के गायकों की ओर से प्रभावना देकर श्रावक-श्राविकाओं का सम्मान किया गया। साध्वीश्री मनोहरश्रीजी की स्मृृति में छतीसगढ़ में संचालिक गौशाला के लिए श्रावक-श्राविकाओं ने जीवदया के तहत धन का विसर्जन किया।