ओपीडी में रोज़ एक माँ बहुत चिंता से पूछती है- “डॉक्टर साहब, बच्चा तो अब बड़ा हो गया, 4 साल का हो गया, 5 साल का हो गया, पर ये अंगूठा चूसना अभी तक क्यों नहीं छोड़ रहा?” मैं मुस्कुराकर कहता हूँ – घबराइए मत, आप अकेली नहीं हैं। बच्चों का अंगूठा चूसना कोई बीमारी नहीं है, ये तो प्रकृति का दिया हुआ पहला खुद को शांत करने का तरीका है। माँ के गर्भ में 29वें हफ्ते से ही बच्चा अंगूठा चूसना सीख जाता है। ये उसके लिए सुरक्षा है, माँ की गोद जैसा सुकून है। तो फिर चिंता कब करनी है, इसे समझना जरूरी है।
उम्र के हिसाब से विज्ञान क्या कहता है?
0 से 3 साल तक – बिल्कुल सामान्य :
इस उम्र में अंगूठा चूसना उसके भावनात्मक दिमाग का सहारा है। नींद, भूख, डर में वो खुद को इसी से शांत करता है।
2 से 4 साल के बीच – छोड़ने की उम्र :
90% बच्चे खुद-ब-खुद, बिना किसी डांट के, इस आदत को अलविदा कह देते हैं।
4-5 साल के बाद – ध्यान देने की जरूरत :
अब ये आदत सिर्फ आदत नहीं रहती। अब ये उसके नन्हें दांतों, जबड़े और बोली पर असर डालने लगती है। यहाँ हमें प्यार से हस्तक्षेप करना होगा।
अगर 5 साल के बाद भी आदत बनी रही तो क्या नुकसान हो सकता है?
1. दांतों और मुस्कान पर असर : ऊपरी दांतों का बाहर निकलना और मुंह की ऊपरी छत का आकार बदल जाना।
2. बोली में तुतलाहट : ट, ड, स जैसे शब्दों को बोलने में दिक्कत आना।
3. बार-बार बीमार पड़ना : अंगूठे के साथ कीटाणु और कीड़े सीधे पेट में जाना – और फिर पेट दर्द और दस्त का चक्र।
एक डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशियन के तौर पर मेरा अनुभव – डांट से नहीं, प्यार से छूटेगी ये आदत :
1. कारण पकड़िए, आदत नहीं : बच्चा कब चूसता है? बोर होने पर? टीवी देखते हुए? डांट खाने के बाद? कारण पर काम कीजिए। गले लगाइए, उसकी बोरियत खत्म कीजिए।
2. सकारात्मक परवरिश : डांटिए मत, शर्मिंदा मत कीजिए। जब वो न चूसे, तभी उसकी तारीफ कीजिए। एक स्टार चार्ट बनाइए – “आज अंगूठा नहीं चूसा, एक स्टार पक्का।” ये जादू की तरह काम करता है।
3. हाथों को काम दीजिए : खाली हाथ ही अंगूठे की तरफ जाता है। हाथ में मिट्टी, रंग भरने की किताब, सॉफ्ट बॉल दे दीजिए।
4. मीठी सी बातचीत : 5 साल के बच्चे को समझाइए – “बेटा, इससे तुम्हारे सुंदर वाले दांत टेढ़े हो जाएंगे, फिर आपकी प्यारी मुस्कान कैसी लगेगी?”
मुझसे कब मिलने आएं?
– 5 साल के बाद भी दिन-रात, जोर-जोर से अंगूठा चूसना
– दांतों में स्पष्ट बदलाव दिखना
– अंगूठे पर छाले, खून या संक्रमण होना
याद रखिए, अंगूठा चूसना बच्चे की जिद नहीं, उसकी जरूरत है। उस जरूरत को समझ कर, प्यार से बदलना ही हमारी जीत है। जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे हर माता-पिता तक पहुँचाइए। -डॉ. श्याम अग्रवाल, बाल विकास एवं व्यवहार विशेषज्ञ, बीकानेर



















