जब वे विदेश गए (आचार्य ज्योति मित्र का व्यंग्य)

अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में अगुआ रहे काका कर्मदास के कर्मो का फल था या ये कहे कि हमारे कुकर्मो का, काका अंग्रेजों के देश चले गए। होनी को कौन टाल सकता है। उम्र भर फिरंगियों के खिलाफ फतवे जारी करने वाले काका के बेटे की सर्विस लंदन में लग गई। यहां तक तो हमें कुछ भी तकलीफ नही हुई। बस, वे एक बार विदेश क्या गए हमारे देशी काका पूरे विदेशी हो गए।

हमारी तकलीफ की शुरुआत तो उस दिन हुई जब काका फिर अंग्रेजों से दो-दो हाथ करने के मूड में या किसी और वजह से काकी के साथ बेटे के पास लंदन चले गए। वो गए वहां तक तो गनीमत थी। संकट तो उनके वापिस आने के बाद शुरू हुआ। उनके आने के बाद जो ह्रदयविदारक हादसे हमारे साथ हुए वो ना कहे जा सकते है और ना सहे जा सकते है। आप सोचते होंगे कि मारे जलन के ये बकवास कर रहे हैं। खैर, आप कोई दूसरे थोड़ी है आप को तो बता ही सकते है। भाईजी हम तो शुरू से अखबार में कलम घिसाई का काम करते रहे है।

एक दिन काका सुबह-सुबह लाल-पीले होते हुए आए बोले- अब तुम्हारे अखबार में दम नही रहा। मैंने कहा- आपने जोर से खींच लिया होगा तो फट गया आखिर कागज ही तो है। बस यहीं तो तुम्हारा इंडिया मात खा गया। इतना बड़ा देश इंग्लैंड और अखबार में कोई खबर नहीं। मैंने कहा- अपने काम की खबर नही होगी तो नही छपी होगी। वे बोले- बस सभी इंडियन्स में ये बीमारी है कि वे भाग्यविधाता बन बैठते है। अब हमारे क्या जरूरी है या गैरजरूरी ये तुम तय करोगे। क्या करता मौन रहने में भलाई समझी।

अगले दिन काका और हम घर पर भारत-इंग्लैंड के बीच क्रिकेट मैच टीवी पर देख रहे थे। अचानक कमेंट्रेटर ने कहा बरसात होने के कारण मैच रुक गया है व वातावरण थोड़ा ठंडा हो गया है। काका उठकर चले गए। थोड़ी देर में काका का सप्तम स्वर सुनाई दिया। बरसात आने वाली है और इस घर में छाता नहीं मिल रहा है। कल मौसम की भविष्यवाणी मैंने ही ली थी किसी ने मुझे नही बताया कि बारिश होगी, फिर काका को कौनसा देवदूत बता गया बारिश का। मैंने उत्सुकतावश बाहर देखा तो काका भरी गर्मी में गर्म कपड़े पहने छाता ढूंढ रहे थे। इंग्लैंड से काका का तन तो स्वदेश पहुंच गया लेकिन मन अभी डायना के देश में भटक रहा था। किसी जमाने में विदेशी वस्तुओं के विरोध में सबसे आगे नाचने वाले काका की आत्मा भी अब तो विदेशी रंग में रंग चुकी है।

हद हो गई उस दिन जब बेचारी काकी ने अपने भाई के द्वारा भेजे गए घाघरा-चोली पहने तो काका को यह आउटफिट कुछ कम जचा। बोले-लंदन से गाउन क्या मैं अलमारी में सजाने के लिए लाया हूं। पतिव्रत का धर्म पालन करने की गरज से आखिर काकी ने गाउन पहन लिया, लेकिन मारे शर्म के एक जगह बैठी रही। इंग्लैंड विजिट से पहले आसन लगाकर हाथ से भोजन करने वाले काका ने अब खाती से डायनिंग टेबल बनवाई है। पैसों के लिए चक्कर काट रहे खाती उस दिन से नर्वस ब्रेकडाउन में है जब से काका ने उससे कहा- तुम इंडियंस थोड़े से पैसों के लिए लोगों की पर्सनल लाइफ डिस्टर्ब करते हो।

काका हमें इंग्लैंड के बारे में इतनी जानकारी दे चुके है कि यदि वे उसे सिलसिलेवार लिखते तो अच्छा खासा संदर्भ ग्रंथ बन जाता। एक दिन तो मैं गश खाकर गिरते-गिरते बचा। मैंने देखा काका एक मोटी पोथी उठाएं मेरी ओर ही चले आ रहे हैं। मैं सिहर गया। मुझे लगा काका ने अपने संस्मरणों की कोई किताब ना लिख मारी है। मेरी आशंका गलत थी। काका के हाथ में फोटो का एलबम था। काका मेरे पास आकर बैठ गए व सिलसिलेवार अपनी विदेश यात्रा के फोटो दिखाते व उनका वर्णन करते। उनकी उम्र का लिहाज कर बोल तो कुछ नही सका, लेकिन अंदर ही अंदर कुढ़ता रहा। उस दिन नहाने-धोने से लेकर ऑफिस की भी छुट्टी हो गई। उनसे निपटा तो श्रीमतीजी ने पकड़ लिया बोली- पिछले कई दिनों से देख रही हूँ, आपका ध्यान हमारी और कम है। अब आपको गोरी मैम देखने से फुर्सत मिल गई हो तो कुछ गृहस्थी का सामान बाजार से ले आवो।

ऐसे हालात में मौन ही सुखी गृहस्थी का आधार है। मैंने चुपचाप थैला उठाया व ार से बाहर निकला। बाहर एक बार फिर काका से मुठभेड़ हो गई। शिकार को सामने देख चीते की फुर्ती से काका मेरे पर मानों झपटे। बोले-बाजार जा रहे हो अब कुछ बोलने की हिम्मत मेरी नही बची थी। मैंने मुंडी हिला दी। सही मौका जान काका फिर शुरू हो गए बोले- लंदन में कोई झंझट ही नहीं है। इंडियन्स टाइम की वैल्यू ही नही समझते, बाजार जाएंगे मोल-भाव कर देश के व्यापारियों का व अपना समय बर्बाद करेंगे। काका की जगह कोई उम्र में छोटा होता तो मैं शायद कानून तोड़ बैठता, लेकिन लाचार, बेबस था। कई बार सोचता हूं कि मेरा क्या दोष था जो इस देश मे पैदा हो गया। मैं लंदन में पैदा होता तो शायद ऐसे अत्याचार से तो बच जाता। मैंने मन बना लिया है आप सोच रहे होंगे लंदन जाने का, नहीं अपना ट्रांसफर ऐसी जगह करवाने का जहां कोई अंकल फॉरेन रिटर्न न हो।

डिजिटल लव (आचार्य ज्योति मित्र का बदलते जमाने पर व्यंग्य)

साहित्य में सुपारी वाद

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