गुदगुदाती हैं ‘फुकरे रिटर्न्स’

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अभय इंडिया डेस्क. किसी सफल फिल्म के सीक्वल के साथ एक अच्छी बात यह होती है कि उसे लेकर लोगों में उत्सुकता बनी रहती है। इस तरह उसे एक शुरुआती लाभ मिल जाता है। लेकिन इसके साथ साथ एक जोखिम भी जुड़ा रहता है कि लोग उसकी तुलना पिछली फिल्म से करते हैं। और फिल्म उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती तो नकार दी जाती है।

‘फुकरे रिटर्न्स’ सही मायनों में ‘फुकरेÓ का सीक्वल है। कहानी पिछली बार जहां छूटी थी, उसी के एक साल बाद से शुरू होती है। किरदार भी सारे वही हैं। चूचा (वरुण शर्मा) को सपने आते हैं और हनी (पुलकित सम्राट) उनका मतलब निकाल कर लॉटरी के नंबर बनाता है। इस बार चूचा को सपने के साथ-साथ भविष्य को देखने की शक्ति भी मिल गई है। इधर हनी अपनी प्रेमिका प्रिया शर्मा (प्रिया आनंद) से शादी करने के लिए उसके पिता को मनाने की कोशिश में भी लगा है। लाली (मनजोत सिंह) की अभी तक कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनी है। जफर भाई (अली फजल) अपनी प्रेमिका नीतू रैना (विशाखा सिंह) से शादी करने वाले हैं। पंडितजी (पंकज त्रिपाठी) पहले की तरह ही कॉलेज में अपने तीन-तेरह के धंधे में लगे हुए हैं। भोली पंजाबन (ऋचा चड्डा) एक साल से जेल में बंद है, उसके सारे धंधे बर्बाद हो चुके हैं। वह बाहर आने को बेताब है और इसके लिए वह नेता बाबू लाल गुलाटी (राजीव गुप्ता) से मदद मांगती है।

बाबू लाल उससे 11 करोड़ रुपये मांगता है। भोली जेल से बाहर आकर चारों फुकरों- हनी, चूचा, लाली, जफर भाई और पंडितजी को अपने अड्डे पर उठवा कर लाती है और उनसे लॉटरी के जरिये करोड़ों रुपये उगाहने की स्कीम बनाती है। दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में लॉटरी का धंधा बाबू लाल चलवाता है। उसको इनकी स्कीम का पता चल जाता है और गेम कर देता है। भोली की स्कीम फेल हो जाती है और दिल्ली के लोग पुुकरों की जान के पीछे पड़ जाते हैं। फिर शुरू होता है चूहे-बिल्ली का खेल और खजाने की खोज का किस्सा… फिल्म की स्क्रिप्ट उतनी कसी हुई नहीं है, कहानी पिछली बार के मुकाबले थोड़ी जटिल और कमजोर है। लेकिन निर्देशक मृगदीप लाम्बा इसके बावजूद कहानी को रोचक ढंग से पेश करने में सफल रहे हैं। वह कहीं भी बोरियत नहीं होने देते।

फिल्म की दो सबसे बड़ी खासियत हैं। पहला कलाकारों का अभिनय और दूसरा संवाद। इन मामलों में यह फिल्म अपने पहले भाग से कहीं भी कमतर नहीं है। संवाद बहुत मजेदार हैं, उनमें बहुत पंच और हास्य है। कहीं-कहीं थोड़े ‘एडल्टÓ भी हैं, लेकिन दिल्ली वालों के दिल्लीपने का एहसास कराने में कामयाब हैं। फिल्म की सिनमेटोग्राफी अच्छी है। आंद्र मेनेजेस ने दिल्ली को उसकी स्वाभाविकता के साथ कैमरे में कैद किया है। पुलकित सम्राट, मनजोत सिंह, अली फजल का अभिनय सधा हुआ है। ऋचा चढ्ढा भी हमेशा की तरह अच्छी हैं। बाबू लाल गुलाटी के रूप में राजीव गुप्ता असर छोड़ते हैं। विशाखा सिंह का रोल इस बार कम हो गया है।
लेकिन अगर फिल्म को किसी ने अपने कंधों पर ढोने का काम किया है तो वह हैं वरुण शर्मा। अगर ‘फुकरोंÓ में से चूचा को हटा दिया जाए तो वे फूंके हुए नजर आएंगे। वरुण ने अपनी मासूमियत, संवाद अदायगी, एक्सप्रेशन और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से एक बड़ी लकीर खिंची है। बाकी कलाकारों का अभिनय भी अच्छा है।
फिल्म का गीत-संगीत भी ठीक है। यह जरूर है कि ‘फुकरे रिटन्र्सÓ उस ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाती, जहां ‘फुकरेÓ पहुंची थी, लेकिन इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यह काफी मजेदार फिल्म है। आप देखेंगे तो समय और पैसे की बर्बादी नहीं होगी।

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