साहित्य में सुपारी वाद

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-आचार्य ज्योति मित्र

लद गए माफिया व दबंगों के दिन अब सुपारी लेने पर उनका एकाधिकार नहीं रहा। साहित्य में भी सुपारी लेने और देने का चलन शुरु हो गया है। दबंग तो अब बेचारे लगने लगे हैं। यह बात अलग है कि यहां सुपारी लेकर किसी व्यक्ति का नहीं, वरन साहित्य का ही काम तमाम करने का प्रयास किया जाता है। साहित्य जगत में आजकल सुपारी ली जाती है किसी को रातों-रात कवि, लेखक व पत्रकार बनाने की। धीरे-धीरे समाज में स्टेट्स सिंबल के मायने बदल रहे हैं। अच्छी नौकरी, पैसा, गाड़ी एक दौर में इसके सिंबल हुआ करते थे। अब बदलते बाजार में कवि व लेखक होना स्टेट्स सिंबल बन गया है। लोगों को जरूरत है तो पेशेवर लिखाड़ तो फायदा लेंगे ही।

एक जमाना था जब कोई बेरोजगार या कुंवारा रह जाता तो लोग उसे सब हिकारत से देखते थे। अब तो साहब जिस घर में यदि लेखक-कवि नहीं हुए तो उन्हें लोगों के उपहास का सामना करना पड़ सकता है। परंपरागत पंडितों का स्थान साहित्यिक पंडों ने ले लिया है जिस तरह पंडे अपने यजमानों के कष्ट दूर करने के लिए उनके लिए पूजा-पाठ करते हैं। उसी प्रकार यह हमारे साहित्यिक पंडे अपने यजमानों को खुश करने के लिए उनके नाम से साहित्यिक लेखन करते हैं। इन दिनों साहित्य में आई सुनामी उफान पर है। इस सुनामी में तार सप्तक तार-तार हो गया है! एक जमाने में युवा फिल्म हीरो बनने के लिए घर से भागा करते थे। पैसे चुराया करते थे। भाग आज भी रहे हैं, लेकिन मेहनत से, अध्ययन से। पैसे आज भी चुराए जा रहे हैं, लेकिन मायानगरी के लिए नहीं, बल्कि साहित्य नगरी के पंडों को दक्षिणा देने के लिए।

साहित्य सरिता की इस भयानक बाढ़ में मास्टर से लेकर बस चालक, नल-बिजली के मिस्त्री भी आ गए हैं। कुछ लोग अफसरों को राजी करने के लिए उनके बीबी बच्चों व जंवाइयों के नाम से कहानियां लिख रहे हैं तो कोई नए सिरे से पुस्तकालय जाकर नामी लेखकों की रचनाओं का पोस्टमार्टम कर अपने लेखक बनने का जुगाड़ बिठा रहे हैं। स्कूलों में हिंदी के मास्टरों की शामत आ गई है। अभिभावक अपने बच्चों को रातों-रात अकादमी पुरस्कार मिल जाए, इसके लिए तैयारी कराते दिखते हैं। हमने भी एक दिन बातों ही बातों में अपने एक मित्र से पूछ लिया भाई यह क्या दौर आया है। उसने कहा कुछ नहीं यह हमारे साहित्य में सुपारीवाद का दौर है। इस तरह अपनी ही सुपारी देकर कवि लेखक बने लोगों की रचनाएं भविष्य में सुपारी वाद के नाम से जानी जाएगी। मेरे ये मित्र वर्तमान साहित्य की गहरी समझ रखते हैं। उन्होंने कहा भविष्य में जब इतिहास लिखा जाएगा तो कुछ इस तरह होगा कि- मिस्त्री मंगतुराम ने हिंदी साहित्य की बहुत सेवा की, उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई अपने परिवार के लिए ना बचा कर उस जमाने के महान साहित्यकार श्री कहानी लाल जी को मोटी सुपारी देकर साहित्य-सृजन करवाया। मुझे तो अब भविष्य में साहित्य के प्रतिमान भी अलग होते लग रहे हैं। भविष्य में किसने कितनी मोटी सुपारी देकर सृजन करवाया यह प्रतिष्ठा का आधार हो जाएगा।

खैर, वह तो जब होगा तब देखा जाएगा, लेकिन साहित्य सागर में सुपारी वाद के ज्वार ने प्रगतिशील लेखकों की प्रगति को विराम लगा दिया है। यह भी भविष्य में होने वाले शोध से ही पता चलेगा कि साहित्य में सुपारी वाद के प्रणेता कौन थे? यह क्यों शुरू हुआ? कहां से हुआ? व सुपारीवाद की धारा से निकले साहित्य को किसने व कैसी मजबूरी में पढ़ा? साहब क्रांति तो आई है। सुपारी वाद की चपेट में वे सोशलाइट भी आ गई है जो कभी अखबारों के पेज तीन की शान हुआ करती थी। वो शान आज भी बरकरार है, लेकिन साहित्य के पेज की। किट्टी पार्टियों में चर्चाओं के विषय बदल गए हैं। सोशल साइट पर अपने फोटो देकर खुशफहमी पालने वाले लोग अब सोशल मीडिया पर अपनी प्रकाशित रचनाएं परोस रहे हैं। कितने लाइक्स व कॉमेंट्स आए, इसकी बाकायदा मॉनिटरिंग भी की जा रही है।

-आचार्य ज्योति मित्र, उस्ता बारी के अंदर, बीकानेर