…तो क्या लाइक्स व कॉमेंट्स बनेंगे वल्र्डवार का कारण?

व्यंग्य
व्यंग्य
आचार्य ज्योति मित्र

पिछले कई माह से टीवी वाले अपनी स्क्रीन पर भावी थर्ड वल्र्डवार की खबरें दिखा-दिखा कर लोगों को डराने की कोशिशें कर रहे हैं। लेकिन, मुझे तो उनकी ये कोशिश बेकार ही लग रही हैं। मुझे लगता है कि ये ट्रंप व किंग जोंग के बस की भी बात नहीं है। ये दोनों भले ही कोई कितना ही बड़ा परमाणु हथियार बना लें या अपनी मिसाइलों का शक्ति प्रदर्शन कर लें, यह वल्र्ड वार इनके बस की बात ही नहीं है। सही पूछो तो यह श्रेय तो हमारे फेसबुक या व्हाट्सएप यूजर ही लेंगे।

दुनिया कितनी बदल गई है, फेस टू फेस मिलने पर मुंह बिचकाने वाले एक-दूसरे से सोशल साइट पर लाइक्स और कमेंट की आशा करते हैं। देवरानी-जेठानी व सास बहू की सनातन लड़ाई को इस ऐप से नए आयाम मिले हैं। लाइक व कमेंट के चक्कर में सगाई छूटने व तलाक होने जैसे हादसे अक्सर सुने जाने लगे हैं। एक दिन सुबह-सुबह एक शोर सुनकर मेरी नींद खुली। मैं आंखें मलता हुआ आधी नींद में बदहवास सा बाहर निकला। बाहर निकला तो देखा कि मोहल्ले के चाचा चांद, सूरज की तरह मेरे पड़ोसी पर तप रहे हैं- तुम लोग आजकल मोह चोर हो गए हो। कल बेटे की शादी की फोटो पोस्ट की, तुम सब लोग ऑनलाइन थे, लेकिन कमेंट तो क्या किसी ने लाइक तक नहीं किया है। अब मुझे पता चल गया है तुम लोग हमारे से जलते हो। इस पूरे प्रकरण में मैंने देखा कि मेरे पड़ोसी का परिवार अपराध बोध से सिर झुकाए खड़ा है।

बचपन से ‘पर दुखी’ लोगों की एक जमात के बारे में सुना था, जो अपने दुख से दुखी नहीं, वरन पड़ोसी के सुख से दुखी हो जाते थे। बीच मे ये संख्या कम हुई, लेकिन फेसबुक ने एक बार फिर उस महान परंपरा को पुन: जीवित कर दिया है। इसमें व्यक्ति एक बार अपने कम लाइक और कमेंट से शायद इतना दुखी ना हो, जितना दूसरे की पोस्ट पर आ रहे बेशुमार लाइक और कमेंट उसे जीवन की एक असहनीय पीड़ा दे जाते हैं। इसे वे ही बेहतर समझ सकते हैं जिन्होंने यह फेसबुकिया झंझावत झेला हो।

इस लाइक कमेंट के चक्कर में हम एक बार भूखे मरते-मरते बचे। हुआ यूं कि एक दिन पत्नी ने मुझे खाना परोसा और पूछा- यह सब्जी कैसी बनी है? जब पूछ लिया तो कह दिया- इसमें नमक तेज है। अचानक जलजला सा आ गया। वह जोर-जोर से रोने लगी। सुबकते हुए बोली- ‘आपको तो मेरी बनाई हुई चीज पसंद ही नहीं आती। पता है, मैंने यह सब्जी बनाकर इसकी फोटो पोस्ट की थी, सैकड़ों लाइक्स आ गए। मेरी तीन-चार सहेलियों ने तो इसे ‘सो यमी…’ भी बताया और आपके एक-दो दोस्तों ने तो इसकी रेसिपी भी मेरे से पूछी है।’ हमने अपना सिर पीट लिया। यदि हर अच्छे काम की शुरुआत घर से हो सकती है तो लड़ाई की क्यो नहीं? घरों से शुरू हुई लड़ाइयां शहरों? व देश की सीमाओं को पार करते करते कब वैश्विक युद्ध में बदल जाए, यह तो दिख ही रहा है । हाल ही में कैम्ब्रिज एनालिटिका के फेसबुक से डाटा चोरी की खबरों से अमेरिका तक हिल गया तो भइया हम और आप तो पहले से ही हिले हुए हैं।

भविष्य लाइक शेयर कमेंट पर ही आधारित होगा। अपनी लाइक कैसे बढ़ाएं? जैसी किताबें जल्दी ही आएंगी। वेबसाइट तो आने भी लग गई हैं। वह दिन भी दूर नहीं जब लाइक बढ़ाने के लिए कोचिंग क्लासेज भी शुरू हो जाएंगी। सोशल साइटों पर लाइक बढ़ाने के लिए लोग क्या-क्या करने को तैयार नहीं हो जाते। कुछ दिन पहले यमन के शायर सलेम ने अपनी बेटी का हाथ उसी को देने की घोषणा की है जो उनको मेहर की रकम के तौर पर 10 लाख लाइक्स देगा। वही अल्जीरिया में एक बाप ने मल्टी स्टोरी बिल्डिंग के ऊपर चढ़ कर अपने बेटे को खिड़की से नीचे फेंकने वाली ऊोटो लगा कर धमकी दी कि यदि 1000 लाइक्स नहीं आए तो वह उसे नीचे फेंक देगा। इस मामले में हम भारतीय उदारवादी हैं, जब कुछ पार नहीं पड़ती दिखती तो हम वैराग्य का मार्ग अपना लेते हैं।

हमारे एक मित्र हैं, उनको समय-समय पर फेसबुक छोडऩे का वैराग्य उमड़ता है और वे इससे संन्यास लेने की घोषणा कर डालते हैं। वो ये लिखना भी नही भूलते कि अब कुछ अध्ययन करेंगे। गोया कि अब वे साँस ही किताबों के सहारे लेंगे। राज की बात तो यह है कि जब लाइक्स कुछ कम आ रहे हों, मनचाहे कॉमेंट्स नहीं आए, तो एक बार इन सबसे दूर रहना ही सही पॉलिसी है। सारे भारतीय ऐसे नहीं होते कुछ लोग सोशल साइटों पर खुला ऐलान करते हैं कि यदि उनके फोटो को लाइक नहीं किया तो वह अपने फ्रेंड लिस्ट से बाहर कर देंगे। एक जमाने में जब किसी को न्यात बाहर कर हुक्का-पानी बंद किया जाता था तो सालों उसकी चर्चा रहती थी, लेकिन अब तो यह रोजमर्रा की बात हो गई है। कई बार सोशल साइटों पर कुछ क्रांतिवीर (कथित क्रांतिकारी) पोस्ट करते हैं व लोगों से गुहार लगाते हैं कि फलां पोस्ट को शाम से पहले-पहले तक पूरी दुनिया में फैला दो। मुझे लगता है सोशल साइटों का आगाज यदि आजादी से पहले हो गया होता तो नाहक ही भारतीयों को जान देनी पड़ती। लोग बस मैसेज फैलाते व अंग्रेज भारत छोड़ चले जाते।