रिश्ते

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क्यूं जवान कंधे रिश्तों की
लाश ढोकर थक जाया करते है
ताउम्र अभिनय करते-करते
खुद का अस्तित्व भूल जाया करते है
क्यूं क्रूर नियति फूलों को
बेजान हाथों में सौंप दिया करती है
जिनके खिलने से वातावरण खिल उठता है
कुचले जाने पर दस्तक तक नहीं दिया करते
बन जाता है अभिजात्य भी अभिशाप वहां
जो खुलकर सरेआम रोने या हंसने भी नहीं देते
बेजान लाशों को तो दफना दिया जाता है
पर इन मुर्दा रिश्तों को बेजान कहने का
हक भी नहीं दिया करते।
-सीमा पारीक, चित्तौडग़ढ़ (राजस्थान)