मथुरा के गिरिराजजी में बह रही भक्ति की रसधार

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गिरिराज जी में कथा के दौरान आरती करते श्रद्धालु।
गिरिराज जी में कथा के दौरान आरती करते श्रद्धालु।

मथुरा (अभय इंडिया न्यूज)। उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) में इन दिनों धार्मिक आयोजनों की धूम मची हुई है। भक्ति की मानो रसधार बह रही है। खासतौर से बीकानेर वाले पं. मुरली मनोहर व्यास के सान्निध्य में यहां श्रीमद्भागवत कथा का कार्यक्रम आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बीकानेर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचे हैं। सुबह से शाम तक होने वाले कथा के आयोजन में श्रद्धालु पूर्ण श्रद्धा के साथ शिरकत कर रहे हैं।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र गिरिराजजी एक नगर पंचायत है। गोवर्धन व इसके आसपास के क्षेत्र को ब्रज भूमि भी कहा जाता है। यह भगवान श्री कृष्ण की लीलास्थली है। यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने द्वापर युग में ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाने के लिये गोवर्धन पर्वत अपनी तर्जनी अंगुली पर उठाया था। गोवर्धन पर्वत को भक्तजन गिरिराज जी भी कहते हैं।

सदियों से यहाँ दूर-दूर से भक्तजन गिरिराज जी की परिक्रमा करने आते रहे हैं। यह 7 कोस की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की है। मार्ग में पडऩे वाले प्रमुख स्थल आन्यौर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूंछरी का लोटा, दानघाटी इत्यादि हैं।

परिक्रमा जहाँ से शुरु होती है वहीं एक प्रसिद्ध मंदिर भी है जिसे दानघाटी मंदिर कहा जाता है। यहां राधाकुंड से तीन किलोमीटर दूर गोवद्र्धन पर्वत है। पहले यह गिरिराज 7 कोस (21 किलोमीटर) में फैले हुए थे, पर अब आप धरती में समा गए हैं। यहीं कुसुम सरोवर है, जो बहुत सुंदर बना हुआ है। यहाँ वज्रनाभ के पधराए हरिदेवजी थे पर औरंगजेबी काल में वह यहाँ से चले गए। पीछे से उनके स्थान पर दूसरी मूर्ति प्रतिष्ठित की गई। यह मंदिर बहुत सुंदर है। यहाँ श्री वज्रनाभ के ही पधराए हुए एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है। गिरिराज के ऊपर और आसपास गोवद्र्धनगाम बसा है तथा एक मनसादेवी का मंदिर है। मानसीगंगा पर गिरिराज का मुखारविन्द है, जहाँ उनका पूजन होता है तथा आषाढ़ी पूर्णिमा तथा कार्तिक की अमावस्या को मेला लगता है।

बताया जाता है कि गोवद्र्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान का चरणचिह्न है। मानसी गंगा पर जिसे भगवान ने अपने मन से उत्पन्न किया था, दीवाली के दिन जो दीपमालिका होती है, उसमें मनों घी खर्च किया जाता है, शोभा दर्शनीय होती है। यहाँ लोग दण्डौती परिक्रमा करते हैं। दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर जमीन पर लेट जाते हैं और जहाँ तक हाथ फैलते हैं, वहाँ तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।

इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत करते-करते परिक्रमा करते हैं जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है। यहाँ गोरोचन, धर्मरोचन, पापमोचन और ऋणमोचन- ये चार कुण्ड हैं तथा भरतपुर नरेश की बनवाई हुई छतिरयां तथा अन्य सुंदर इमारतें हैं।

मथुरा से दीघ को जाने वाली सड़क गोवद्र्धन पार करके जहाँ पर निकलती है, वह स्थान दानघाटी कहलाता है। यहाँ भगवान दान लिया करते थे। यहाँ दानरायजी का मंदिर है। इसी गोवद्र्धन के पास 20 कोस के बीच में सारस्वतकल्प में वृंदावन था तथा इसी के आसपास यमुना बहती थी।