गाजे-बाजे से निकली शोभायात्रा में नवंकार महामंत्र की गूंज

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बीकानेर (अभय इंडिया न्यूज)। शोभायात्रा में पंचरंगी जैन ध्वज, भगवान महावीर की सवारी, गुरुजनों के आदमकद चित्र, सजे-संवेरे घोड़े, ऊंट, बग्गी, चांदी का सिंहासन, चांदी की भगवान की पालकी तथा बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं। नवंकार महामंत्र के साथ भक्ति गीतों की धुनें। और देव, गुरु व धर्म के जयकारे लगा रहीं महिलाएं। यह दृश्य है रविवार को यहां रेलदादाबाड़ी से निकली भगवान महावीर के दीक्षा कल्याणक की शोभायात्रा का।

यह शोभायात्रा जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय गुरु मनोज्ञ सागरजी म.सा. मुनि नयज्ञ सागर साध्वी संयमपूर्णा, श्रद्धानिधि, जैन श्वेताम्बर पाश्र्वचन्द्र गच्छ की साध्वी सुव्रता, पद्मप्रभा व मरुत प्रभा तथा जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवक परिषद बीकानेर इकाई, विचक्षण, खरतरगच्छ महिला मंडल तथा समस्त सकलश्री संघ की सक्रिय भागीदारी से निकली।

गंगाशहर मार्ग की रेल दादाबाड़ी में भगवान महावीर स्वामी जिनालय के भव्य अंजनशलाका प्रतिष्ठा के तहत पांच दिवसीय महोत्सव के तहत निकली शोभायात्रा गंगाशहर के आदिनाथ मंदिर, विभिन्न बाजार व चौकों से होते हुए वापस आरंभिक स्थल पहुंच कर धर्म सभा में बदल गई।

मंदिर बनवाने का कार्य बड़े पुण्य से होता है

धर्म सभा में उपाध्याय गुरु मनोज्ञ सागरजी म. सा. ने प्रवचन में कहा कि खरतरगच्छीय परम्परा में हमारे पूर्वजों ने अपने कठोर परिश्रम चरित्रता और प्रामाणिकता से उपार्जित धन को केवल व्यक्तिगत कार्यों के लिए ही नहीं खर्च किया अपितु सामाजिक सरोकारों में भी उसका समुचित उपयोग सर्वजन हिताय के लिए किया। गंगाशहर के सेठिया परिवार के धर्मनिष्ठ सुश्राविका स्वर्गीय बरजी देवी धर्म पत्नी नेमचंद सेठिया की स्मृति में उनके पुत्र केशरीचंद सेठिया, रतनी देवी, झंवर लाल, कस्तुरी देवी, पौत्र मनोज व मधु देवी सेठिया परिवार ने आचार्यश्री जिन मणिप्रभ सूरिश्वरजी की प्रेरणा व आशीर्वाद से भगवान महावीर के मंदिर निर्माण का लाभ लेकर अनेक पुण्यकर्मों का अर्जन किया है। मंदिर बनवाने का कार्य बड़े पुण्य से होता है। सेठिया परिवार का नाम हमेशा बीकानेर के इतिहास में हमेशा रहेगा।

उन्होंने कहा कि रेलदादाबाड़ी मंदिर देव, गुरु व धर्म के प्रति निष्ठा व भावना का प्रतिबिम्ब है। करीब चार सौ वर्ष पूर्व विक्रम संवत् 1670 को अकबर प्रतिबोधक युग प्रधान दादा गुरुदेव जिनचन्द्र सूरि महाराज का बिलाड़ा में स्वर्गवास होने के उपरांत बीकानेर श्रीसंघ ने अपनी निष्ठा एवं गुरुभक्ति का प्रकटीकरण संवत् 1673 को वैशाख सुदि 3 को स्तूप एवं चरण पदुकाओं की प्रतिष्ठा करवाकर किया। इसके बाद विक्रम संवत् 1674 में स्वर्गस्थ दादा गुरुदेव का स्तूप बनाकर उसमें 1976 मेंं चरण स्थापित किए।

मुनि नयज्ञ सागर ने कहा कि इस पवित्र भूमि के पास ही विभिन्न चारित्रात्माओं साधु-साध्वियों के देवलोक पर अग्नि संस्कार हुए। इसी स्थान पर विशेष कर प्रत्येक सोमवार को सैकड़ों भक्त दर्शनार्थ आते हैं। विक्रम संवत् 1986 में मोतीलाल बांठिया ने रेलदादाबाड़ी मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। खरतरगच्छाचार्य दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरि की मूर्ति की प्रतिष्ठा रविवार विक्रम संवत् 1987 को हुई। इसके साथ ही चारों दादा गुरुदेव जिन दत्त सूरिश्वरजी, जिन चन्द्र सूरि, जिन कुशलसूरि व जिनचन्द्र सूरि की चरणपदुकाओं की प्रतिष्ठा करवाई गई।

साध्वीश्री संयमपूर्णा ने कहा कि चार शताब्दी प्राचीन यह दादाबाड़ी मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके मध्य चौक में संगमरमर का एक विशाल चबूतरा, आदर्श साध्वीश्रेष्ठ, स्वर्णश्रीजी की चरण पादुकाएं है। विचक्षण ज्योति प्रवर्तनी गुरुवया चन्द्र प्रभाजी म.सा. की प्रेरणा से दादाबाड़ी में हॉल, 20 कमरों युक्त यात्री निवास का निर्माण हुआ है। अब उपाध्याय गुरु मनोज्ञ सागर जी. म. सा. की प्रेरणा से भोजनशाला बनने से यह स्थान धार्मिक के साथ सामाजिक कार्यों के लिए श्रेष्ठ व उपयोगी होगा।