हैप्पी बर्थडे गुरुदत्त : …और प्यासा ही रहा सिनेमा का यह जादूगर

Gurudutt
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मुंबई। भारतीय सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में जब भी स्वर्ण युग की बात चलेगी तो गुरुदत्त का नाम जरूर लिया जाएगा। 9 जुलाई यानी आज इस अभिनेता, लेखक और निर्देशक गुरुदत्त का जन्म दिवस है। ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’ और ‘चौदहवीं का चांद’ सरीखी बेहतरीन फिल्में उनकी प्रतिभा और उनके हुनर का ही कमाल है।

गुरुदत्त के नाम का उल्लेख आते ही सिनेमा के दीवानों को फिल्म ‘प्यासा’ की याद आ जाती है। इस फिल्म के सारे गीत भी कालजयी हैं। वर्ष 2010 में अमेरिका की टाइम पत्रिका ने सर्वकालिक सौ महान फिल्मों का चयन किया गया था, इसमें भारत की एकमात्र फिल्म जो रखी गई, वह ‘प्यासा’ ही थी। यह एक गहन शोध व सर्वेक्षण के बाद जारी की गयी सूची थी। इसी तरह 2010 में सीएनएन ने एशियाई अभिनेताओं की जो एक सूची बनाई उसमें गुरुदत्त एशिया के 25 मुख्य अभिनेताओं में से एक माने गए।

गुरुदत्त का वास्तविक नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। कर्नाटक के बैंगलोर शहर में 9 जुलाई 1925 को जन्में गुरुदत्त के पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो उनके पिता एक स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। बाद में उनकी नौकरी एक बैंक में हो गई। वहीं उनकी मां एक साधारण गृहिणी थी। गुरु दत्त ने अपने बचपन के प्रारंभिक दिन कोलकाता में गुजारे। बंगाल की संस्कृति से उनका बहुत गहरा लगाव था। इस संस्कृति की इतनी गहरी छाप उन पर पड़ी कि उन्होंने अपने बचपन का नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण से बदलकर गुरु दत्त रख लिया।

गुरुदत्त खुद ऊंचे दर्जे के अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थे। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरुदत्त बहुत उच्चकोटि के नर्तक भी थे। जब वह महज 21 साल के थे, उन्होंने प्रभात स्टूडियो की साल 1946 में बनी फिल्म ‘हम एक हैं’ का नृत्य निर्देशन किया था। इस फि़ल्म में दुर्गा खोटे, कमला कोटनिस, अलका अचरेकर, रिहाना और रंजीत कुमारी जैसी सशक्त अभिनेत्रियां काम कर रही थीं।

देवानंद ने दिया पहला ब्रेक

1942 में दसवीं पास करने के बाद पारिवारिक कारणों से गुरुदत्त ने पढ़ाई छोड़ दी। गुरुदत्त 1942 से 1944 तक उदय शंकर के नृत्यग्राम में रहे और वहीं उन्होंने नृत्य सीखी। फिर यहां से 19 साल की उम्र में पूना चले गए। इसके बाद सबसे पहले सहायक निर्देशक के रूप में उन्होंने फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। बाद में छोटे-मोटे रोल भी उन्हें मिलने लगे। इसी समय गुरुदत्त का परिचय देवानंद से हुआ और दोनों एक-दूसरे के गहरे दोस्त बन गए। देवानंद ने ही उन्हें ‘बाजी’ में पहला बड़ा ब्रेक दिया। इसके बाद गुरुदत्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 26 साल की आयु में गुरुदत्त ने ‘बाजी’ का निर्देशन किया। ‘बाज़ी’ की अपार सफलता के बाद गुरुदत्त ने देवानंद को लेकर एक और फि़ल्म का निर्देशन किया- ‘जाल’। यह फिल्म भी सुपरहिट रही।

गीता की आवाज के दीवाने

गुरुदत्त ने बतौर अभिनेता जो फिल्में की उनमें चांद, प्यासा, 12 ओ क्लॉक, कागज के फूल, चौदहवीं का चांद, सौतेला भाई, साहिब बीवी और गुलाम, भरोसा, बहूरानी, सुहागन और सांझ ओर सवेरा थीं। उन्होंने अभिनय से ज्यादा निर्देशन में कमाल किया। ‘बाज़ी’ की शूटिंग के दौरान से ही गुरुदत्त और गीता राय एक-दूसरे के निकट आए। जहां एक ओर दत्त गीता की आवाज के दीवाने हो गए थे, वहीं दूसरी ओर गीता भी दत्त के प्रभावशाली व्यक्तित्व पर मुग्ध थीं। दरअसल, दोनों अंतर्मुखी प्रवृति के थे। कम बोलने वाले, गंभीर, लेकिन आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कह जाने वाले। एक दिन जब रिहर्सल और रिकॉर्डिंग से फुर्सत मिली, तो गुरुदत्त ने गीता को शादी के लिए प्रस्ताव रख दिया। गीता गुरुदत्त को चाहने लगी थीं, लेकिन बिना माता-पिता की मर्जी के वे शादी नहीं कर सकती थीं। ‘बाजीÓ अभी रिलीज नहीं हुई थी। गीता ने कहा, परिवार वालों से कहना होगा। बाद में गीता राय के माता पिता की राजी से दोनों का विवाह साल 1953 में हुआ। लेकिन, गुरुदत्त का वैवाहिक संबंध खुशनुमा नहीं रहा और वहीदा रहमान से उनके प्रेम संबंधों की भी चर्चा खबरों का हिस्सा बनी।

शमा बुझाता नहीं कोई…

बहरहाल, इसके बाद गुरुदत्त को शराब की लत ने जकड़ लिया। शराब की लत से लंबे समय तक जूझने के बाद 10 अक्टूबर 1964 को उनकी मौत की खबर आई और इस प्रकार एक प्रतिभाशाली जीवन का असमय अंत हो गया। उनकी मौत को लेकर भी तब कई तरह की बातें कही गयी। महज 39 साल की उम्र में ही इस दुनिया से विदा लेने वाले गुरुदत्त की मृत्यु पर शायर और गीतकार कैफी आज़मी ने लिखा था- ‘रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई, माना कि उजालों ने तुम्हें दाग दिए थे, बे रात ढले शमा बुझाता नहीं कोई’।