आत्मकथा में नहीं चलता झूठ

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बीकानेर (अभय इंडिया न्यूज)। ‘आत्मकथा ईमानदार लेखन है। इसमें झूठ नहीं चलता। आत्मकथा में लेखक को खुद को खंगालना पड़ता है और डॉ. केवलिया ने अपनी आत्मकथा में इस पक्ष का निवर्हन पूरी जिम्मेदारी के साथ किया है। बारह वर्ष का बच्चा अपनी स्मृति पटल पर इतनी बातें सहेज कर रख सकता है, यह अविश्वसनीय है।Ó
वरिष्ठ साहित्यकार भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’ ने नरेन्द्र सिंह ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में ये उद्गार व्यक्त किए। अवसर था वरिष्ठ लेखक, कवि एवं चिंतक डॉ. मदन केवलिया के व्यंग्य संग्रह ‘संन्यास : फस्र्ट क्लास लेखन सेÓ तथा आत्मकथा ‘सिंध दरिया से रेत के समंदर तकÓ के विमोचन का। प्रतिमान संस्थान की ओर से आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मकथा में डॉ. केवलिया की बचपन की मस्ती है। विभाजन का दर्द है। बीकानेर और डेरा इस्माइल खां का इतिहास इस पुस्तक में देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि डॉ. केवलिया की व्यंग्य यात्रा 60 वर्ष पूर्ण करने की ओर अग्रसर है। इस दौरान उन्होंने आलोचना के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है।
इतिहासकार डॉ. गिरिजाशंकर शर्मा ने कहा कि डॉ. केवलिया की आत्मकथा इतिहास के शोधार्थियों के लिए महत्त्वपूर्ण दस्तावेज सिद्घ होगा। उन्होंने आत्मकथा लेखन को साहित्य की कठिनतम विधा बताया तथा कहा कि इसमें लेखक को अपनी भूमिका का सही-सही मूल्यांकन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि डॉ. केवलिया की आत्मकथा दो निष्क्रमण के मध्य लिखी आत्मकथा है। इसे लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।
व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि डॉ. केवलिया की कलम में ऐसी ताकत है कि उनका व्यंग्य हंसाता है तो उनकी आत्मकथा के अंश करूणा से ओतप्रोत कर देते हैं। डॉ. केवलिया उन चुनिंदा साहित्यकारों में से एक हैं, जो स्वयं को ईमानदारी से तोल सकते हैं। साहित्य का कोई भी पक्ष इनकी लेखनी से अछूता नहीं रहा है। वे ंिहंदी में राष्ट्रीय स्तर के स्थापित व्यंग्यकार हैं। इनके व्यंग्य में फिल्मी गीत एवं शेरो-शायरी मिलते हैं, वहीं सूर-कबीर-तुलसी और गालिब को भी इनमें स्थान मिलता है।
कथाकार प्रमोद चमोली ने डॉ. केवलिया के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डॉ. केवलिया का समूचा जीवन साहित्य एवं लेखन को समर्पित रहा। उन्होंने हिंदी के अलावा उर्दू, राजस्थानी, सिंधी व पंजाबी में भी लेखन को नए आयाम स्थापित किए। उन्होंने डॉ. केवलिया को अपने शोध पत्र की प्रथम प्रति भेंट की। कवि-कथाकार संजय पुरोहित ने डॉ. केवलिया के व्यंग्य संग्रह ‘संन्यास : फस्र्ट क्लास लेखन सेÓ तथा हरीश बी. शर्मा ने आत्मकथा ‘सिंध दरिया से रेत के समंदर तकÓ का अंश वाचन किया।
अपने उद््बोधन में डॉ. मदन केवलिया ने कहा कि हास्य एवं व्यंग्य की जुगलबंदी होती है। व्यंग्य हमारी जिंदगी से ही सहज रूप से निकलकर आता है। उन्होंने कहा कि घनीभूत पीड़ा को वही जानता है, जिसने दर्द झेला है, इसलिए यह दर्द उनके साहित्य में मिलता है। उन्होंने विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से व्यंग्य के बारे में बताया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए कवि राजेन्द्र जोशी ने डॉ. केवलिया के लेखन कर्म के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। कथाकार शरद केवलिया ने स्वा”त उद्बोधन दिया, जाह्नवी केवलिया ने आभार जताया। इस अवसर पर डॉ. केवलिया का अनेक साहित्यकारों, शिक्षाविदों ने सम्मान किया। इससे पहले अतिथियों ने डॉ. केवलिया की दो पुस्तकों का लोकार्पण किया।
समारोह में सरल विशारद, नन्दकिशोर सोलंकी, दीपचंद सांखला, शिशिर चतुर्वेदी, दिनेश चंद्र सक्सेना, अमरसिंह चौहान, हरिशंकर आचार्य, डॉ. उमाकान्त गुप्त, आनन्द वि आचार्य, विकास पारीक, शीला व्यास, डॉ. सोमनारायण पुरोहित, कमल रंगा, नवनीत पांडे, नरपत सांखला, डॉ. रचना शेखावत, असद अली, डॉ. जिया उल हसन, नदीम अहमद, रमेश महर्षि, उदयशंकर व्यास, अशोक परिहार, मदन सैनी, मेघराज शर्मा, आत्माराम भाटी, कासिम बीकानेरी, राजू कादरी, मोहन थानवी, मनीष जोशी, डॉ. मिर्जा अहमद बेग, डॉ. अजाज अहमद, डॉ. हरिशंकर मारू, वेदप्रकाश अग्रवाल, मनोज कल्ला, मुकेश व्यास, रीता आहूजा, डॉ. मोहम्मद फारूक, अरविन्द, सुधीर, गौतम केवलिया, ज्योतिमित्र आचार्र्य, चंद्रशेखर जोशी, योगेन्द्र पुरोहित सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शिक्षाविद्, पत्रकार मौजूद थे।